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नागर सर : वो बॉस, जिसके सामने आप गुस्सा दिखा सकते थे

Saturday, 14 April, 2018

सिंधुवासिनी त्रिपाठी

मुझे याद है जब मैं गुस्से में दनदनाते हुए नागर सर के कैबिन में गई थी। बतौर संपादकसर की यही ख़ासियत थी कि एक कॉपी एडिटर भी उनके सामने आपना गुस्सा ज़ाहिर कर सकता था।

गुस्सा इसलिए क्योंकि सर ने मेरा पक्ष जाने बिना मुझे डांटा था। उस दिन मैं लाइव ब्लॉग पर थीजिसमें आपको पल-पल के अपडेट पर नज़र रखनी होती है। सुबह साढ़े सात बजे से काम में लगी हुई थी, क्योंकि नीतीश कुमार का शपथ ग्रहण समारोह था और न्यूज़रूम में काफी व्यस्तता थी। शपथग्रहण 12:30 बजे के लगभग तय था। इससे ठीक डेढ़ घंटे पहले यानी 11 बजे मैं ब्रेकफ़स्ट के लिए नीचे गई और वापस आने में मुझे लगभग आधा घंटा लग गया।

जाने से पहले मैं एक कॉलीग से लाइव अपडेट देखने की गुज़ारिश कर गई थी और वो बाक़ायदा लगातार अपडेट्स पोस्ट भी कर रहा था। इसी बीच नागर सर वहां आए और मेरी सीट खाली देखकर पूछा कि मैं कहां हूं। बताया गया कि मैं नीचे गई हूं। सर ने पूछा, कितनी देर से। जवाब मिला लगभग आधे घंटे से। लाइव ब्लॉग देखने वाले की सीट आधे घंटे से खाली हैयानी आधे घंटे से कोई अपडेट पोस्ट नहीं हुई है। सर ने ये अनुमान लगाया और फिर उनका ग़ुस्सा होना लाज़मी था।

जैसे ही मैं डेस्क पर वापस आईसर का फ़ोन आया। फ़ोन पर उन्होंने मुझे खूब डांटा। मैं कुछ कह पातीइससे पहले वो काफी कुछ कह गए थे। मुझे पहले रोना आयाबाद में गुस्सा। ख़ैर जैसे-तैसे करके मैंने शिफ़्ट पूरी की और घर जाने से पहले सर से मिलने गई।

मैं गुस्से में थी। गुस्से और आंसुओं की वजह से मेरा गला रुंधा हुआ था और मैं ठीक से बोल भी नहीं पा रही थी। मैंने जाकर कहामैं विशाल को लाइव ब्लॉग देखने को कहकर गई और वो काम कर भी रहा था। लाइव ब्लॉग की सीट खाली थी, इसका मतलब ये नहीं कि काम नहीं हो रहा था। आपने मुझसे एक बार कुछ पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा। ये कहकर मैं रोने लग गई क्योंकि ये पहली बार था जब सर ने मुझे ऐसे डांटा था।

आप शायद यक़ीन न करेंलेकिन सर ने मुझसे माफ़ी मांगी। सॉरी कहा और बहुत अफ़सोस जताया। वो सिर्फ औपचारिकता के लिए सॉरी नहीं कह रहे थे। उन्हें मुझे डांटने का दुख थाये मैं उनकी आंखों और चेहरे पर बख़ूबी पढ़ पा रही थी।

इसके बाद हमने बहुत सी बातें कीं और मेरा मन हल्का हो गया। सर के कैबिन से निकलते वक़्त मैं ये सोच रही थी कि कोई और बॉस होता तो क्या मेरी इतनी बातें सुनताक्या मैं किसी और के सामने इस तरह गुस्से में बात कर सकती थीक्या कोई और इतनी आसानी से अपनी चूक स्वीकार करता और सबऑर्डिनेट से इस तरह माफ़ी मांगताशायद नहीं।

सबसे ज़रूरी बातये सब करने के बाद सर ने कभी ऐसा नहीं दिखाया कि उन्होंने कोई अलग या महान काम किया है।

ये सिर्फ एक किस्सा है। नागर सर से जुड़े ऐसे हज़ारों किस्से हैंजब मेरे मन में उनके लिए इज़्जत बढ़ती गई। चाहे इंटरव्यू से पहले उनका ये पूछनाकि कुछ खाकर आई हो या मुर्झाया चेहरा देखकर ये समझ लेना कि आज मेरा मूड अच्छा नहीं है।

करियर के शुरुआती दौर में नागर सर जैसा संपादक मिलना मेरी ख़ुशकिस्मती है। उन्होंने मेरी फ़िक्र कीमेरा ख़ुद पर भरोसा बढ़ाया। मुझे बहुत कुछ सिखाया। काम के बारे में और ज़िंदगी के बारे में भी।

इन सबके लिए एक थैंक यू काफ़ी तो नहीं होगामगर कहना ज़रूरी है। थैंक यू सरवी लव यू :)

 



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पोल

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