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अनुरंजन झा बोले, त्रिवेंद्र रावत के इस डर के पीछे की कहानी कुछ और लगती है...

Published At: Saturday, 01 December, 2018 Last Modified: Tuesday, 04 December, 2018

अनुरंजन झा 

वरिष्ठ पत्रकार ।।

प्रेमचंद ने पंच परमेश्वर में लिखा - बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे? प्रेमचंद की लिखी यह पंक्तियां तब भी समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार के लिए मौजूं थी और आज भी वही हालात हैं। समाज का बड़ा तबका अपने छोटे और क्षुद्र स्वार्थ के लिए सब कुछ देखते हुए आंखें फेर लेता है। भीड़ प्रवृत्ति से जितना उद्दंड होती है समाज प्रवृति से उतना ही डरपोक। लेकिन आश्चर्य तब होता है जब समाज को उसका हक दिलाने का दंभ भरने वाला पत्रकारिता समुदाय भी डर से सच कहने से डरने लगता है। 

पिछले दिनों तथाकथित स्टिंग ऑपरेशन के मामले में ‘समाचार प्लस’ के मुखिया उमेश कुमार की गिरफ्तारी हुई, ऊपरी अदालत ने सरकार को फटकार लगाई, निचली अदालत ने जमानत दे दी। जमानत के बाद रिहाई से पहले एक दूसरे मामले में फंसाकर परिवार के सदस्यों के बिना बताए दूसरे राज्य झारखंड भेज दिया गया, वहां भी अदालत ने वादी को फटकार लगाई और जमानत दे दी। इसी बीच एक पुराने मामले में नया केस दर्ज कर फिर वारंट जारी किया गया लेकिन जल्दबाजी इतनी थी कि जिस दिन अपराध होने का मामला दर्ज कराया, उस दिन उमेश कुमार पुलिस कस्टडी में थे लिहाजा अदालत ने फिर फटकार लगाई और गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। अब सरकार ने अदालत को भरोसा दिया है कि वो उमेश कुमार को गिरफ्तार नहीं करेंगे, साथ ही अदालत ने पूछा कि क्यूं न मामला सीबीआई को सौंप दिया जाए। 

चार दिन पहले देहरादून से कोर्ट का आदेश झारखंड नहीं पहुंचा, यहां भी सरकार और पुलिस शायद यही बहाना बनाती दिखी कि फैक्स मशीन काम नहीं कर रही। रिहाई के आदेश झारखंड नहीं पहुंचने की वजह से उमेश कुमार झारखंड के अस्पताल में कैद थे, बीमारी की वजह से मेडिकल बोर्ड ने दिल्ली एम्स रेफर कर किया गया, लेकिन रिहाई के बाद आदेश नहीं पहुंचने की वजह से मामला लटकता दिखाई दिया।    

सवाल उठता है कि आखिर उत्तराखंड के त्रिवेंद्र सरकार की उमेश कुमार से ऐसी क्या दुश्मनी है या फिर जिस तथाकथित स्टिंग की बात हो रही है उसमें ऐसा क्या है कि त्रिवेंद्र रावत उमेश कुमार को सलाखों से बाहर नहीं आने देना चाहते। मिली जानकारी के मुताबिक, उऩ्होंने अपने सलाहकारों से कहा है कि पुराने मामले उधेड़े जाएं और लोकसभा चुनाव तक उमेश कुमार को सलाखों के पीछे रखा जाए। त्रिवेंद्र रावत के इस डर के पीछे की कहानी कुछ और लगती है। निश्चित तौर पर सीएम रावत केंद्र के कुछ आला नेताओं के इशारे पर अपनी बिसात बिछा रहे हैं। हालांकि कुछ समय में यह साफ हो जाएगा कि उमेश कुमार पर आरोप मढ़ने वाला उनका मातहत आखिर किन सौदेबाजी या दबाव में इस हद तक पहुंचा, जब उसने उमेश कुमार पर ऐसे आरोप मढ़े जिसका पक्ष लेने की वजह से सरकार को अदालत ने फटकार लगाई। 

लेकिन मेरा अफसोस कुछ और ही है। उमेश कुमार या कोई और जो भी कोई गुनाह करेगा उसे सजा मिलेगी, बेगुनाह होगा वो बाइज्जत बरी होगा। लेकिन किसी व्यक्ति को फंसाकर पेरशान किया जाएगा तो भरोसा उठता है। साथ ही भरोसा टूटता है उस माध्यम से जिसके सहारे हम दूसरो को न्याय दिलाने का दंभ भरते हैं।

‘इंडिया न्यूज’ के संपादक राणा यशवंत जैसे इक्का दुक्का लोगों को छोड़ दीजिए तो कोई भी इस मामले में खुलकर बोलने से कतरा रहा है। अब जबकि अदालत ने भी सरकार को फटकार लगाई है तब भी लोग बोलने से डर रहा है या फिर उन सभी की प्रवृत्ति ही ऐसी है कि भीड़ में तांडव करो और समाज के पाले में खड़े होकर डरपोक हो जाओ। रही बात उत्तराखंड के त्रिवेंद्र सरकार की तो वो साफ दिख रहा है कि सत्ता के हनक में कैसे काम किए जा रहे हैं। श्रीमान ऊपरवाले की लाठी में आवाज नहीं होती। 

 

 

 



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