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'उमेश कुमार की जमानत उन तमाम सवालों का जवाब हैं, जो पत्रकारों ने उठाए'

Published At: Saturday, 17 November, 2018 Last Modified: Saturday, 17 November, 2018

अमर आनंद

वरिष्ठ पत्रकार ।।

सरकार, सरोकार और उमेश कुमार

देहरादून में हाई कोर्ट की सरकार को लगी फटकार और ‘समाचार प्लस’ के सीईओ व एडिटर-इन-चीफ उमेश कुमार को मिली ज़मानत को उन तमाम सवालों और आरोपों के जवाब के रूप में देखा जाना चाहिए जो उनके ऊपर सत्ता प्रतिष्ठान और सरकारी गवाह पंडित आयुष गौड़ की तरफ से लगाए गए हैं। इसके साथ ही उन सवालों के जवाब के रूप में भी देखा जाना चाहिए जो उमेश कुमार के ऊपर मीडिया और पत्रकारिता से जुड़े साथियों ने उठाए और अपने सवालों को जनधारणा से जोड़ने की कोशिश की। इस मामले में अब बाज़ी पलटती हुई नजर आ रही है और सरकार बैकफुट की तरफ जाती हुई दिखाई पड़ रही है। भारतीय न्याय व्यवस्था में कोर्ट सर्वोपरि है और किसी भी आरोप और किसी भी मामले में कोर्ट ने जो कहा उसे नज़ीर माना जाता है। इस हिसाब से अगर देखा जाए स्टिंग मामले में ज़मानत हासिल करने वाले उमेश कुमार विजेता के रूप में दिखाई पड़ रहे हैं और सरकार पराजित के रूप में। 

स्टिंग के जरिए उत्तराखंड की सत्ता से टकराने का उमेश कुमार का ये पहला मामला नहीं है। रमेश पोखरियाल निशंक सरकार के सरकारी प्रोजेक्ट के स्टिंग के बाद उन पर मुकदमे लादे जाने का मामला हो, या फिर उन मुकदमों से बाहर आने के बाद सीएम हरीश रावत के स्टिंग के जरिए सुर्खियां बटोरने का मामला हो। उत्तराखंड सरकार से उमेश कुमार की ज्यादातर ठनी ही रही और सरकार के खिलाफ किए गए स्टिंग ने जहां उमेश कुमार की लोकप्रियता बढ़ाई और उनके पत्रकारीय साहस की दाद दी जाने लगी, वहीं उन पर आरोपों की झड़ी भी लगाई, सवाल भी खड़े हुए।

आरोप लगाने वाले ऐसे लोग भी थे जो पिट्ठू पत्रकारिता के लिए जाने और समझे जाते रहे हैं। उमेश कुमार की संपत्ति को लेकर भी सवाल उठाए गए और जांच की मांग की गई। आज के दौर में जब जांच एजेंसियों पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं किसकी जांच पर कितना भरोसा करें, ये भी एक सवाल है लेकिन किसी भी मामले में किसी भी आरोप में जो न्यायालय की टिप्पणी आती है, उसका फैसला आता है, हम उसी के आलोक में किसी भी आरोपी के ऊपर लगाए गए आरोपों और उससे जुड़े मामलों को देखा जाता है। अदालत के रुख को देखते हुए स्टिंग मामले में फिलहाल सरकार की किरकिरी जारी रहेगी, ऐसा अनुमान लगाया जाना चाहिए। 

स्टिंग को लेकर तमाम सवालों और आरोपों का सामना कर रहे उमेश कुमार की पत्रकारिता के कई आयाम रहे, लेकिन जितने भी आयाम रहे उनमें नकारात्मक और सकारात्मक चर्चे का दौर भी रहा, लेकिन व्यापकता लगातार मिलती रही। और मुझे लगता है कि ये सिलसिला जारी रहेगा। पत्रकार के साथ साथ उमेश कुमार को कुछ लोग कारोबारी भी कहते हैं लेकिन मैं उमेश कुमार के व्यक्तित्व के जिस पहलू से जुड़ा रहा वो एक सामाजिक कार्यकर्ता का था।


2015 में एक कैंसर के एक बाल मरीज को बचाने के अभियान में उमेश कुमार की सक्रियता काबिलेतारीफ रही और विदेश में होने के बावजूद कोलकाता के उस मरीज बच्चे के लिए जिसका गुड़गांव के फोर्टिस हॉस्पिटल में इलाज होना था, उसके इलाज के लिए जिस तरीके से उमेश कुमार ऩे रुचि दिखाई और अंजाम तक पहुंचाया और इसके लिए मेरे द्वारा चलाए गए अभियान को बल दिया, वो वाकया काबिलेतालरीफ था। कोलकाता की टीवी पत्रकार प्रियंका दत्ता के जरिए उमेश कुमार को जोड़ने में मदद मिली थी और हम सबने मिलकर इस अभियान को सफल बनाया था। इसके बाद पत्रकारों की संस्था ‘प्रेस फाउंडेशन ऑफ इंडिया’ के अध्यक्ष उमेश कुमार की सक्रियता सिवान में मारे गए पत्रकार को इंसाफ दिलाने के लिए भी देखी गई। ऐसे कई मामलों में उनका बढ़ चढ़कर हिस्सा लेना उनसे जुड़े कई विवादों और सवालों पर भारी नजर आया।


उस दौरान मैं ‘लाइव इंडिया’ चैनल का हिस्सा था। उसके ठीक बाद जो हमारा सरोकारी संपर्क आगे बढ़ता चला गया और जनवरी 2016 में यही संपर्क उस वक्त नौकरी में बदल गया, जब वो विदेश से लौटे थे। हम दोनों के कॉमन मित्र अनुरंजन झा ने भी इसमें अपनी सक्रिय भूमिका निभाई थी। हमारा मकसद सरोकार से जुड़े इस रिश्ते सरोकार की राह पर ही आगे बढ़ाना था। मीडिया में नौकरियों की क्या स्थिति है और ‘लाइव इंडिया’ से रुखसत हुए पत्रकारों को इसका दर्द मालूम है। ऐसे दौर में बंद होने की कगार पर खड़े ‘लाइव इंडिया’ से ‘‘समाचार प्लस’ में मेरा नौकरी मिलना वो भी भाईचारे के एहसास वाले एडिटर-इन-चीफ उमेश कुमार के साथ गले मिलकर, ये मेरे जैसे संवेदनशील और साधन विहीन इंसान के लिए एक बड़ी बात थी। 

ईवेंट जर्नलिज्म की अपनी बनाई गई विधा पर काम करते हुए ‘समाचार प्लस’ में मेरी जिम्मेदारी रूटीन के खबरों की नहीं थी, कुछ अहम तारीखों पर ईवेंट आधारित टीवी शो करने की थी और हमने वही किया। ‘समाचार प्लस’ में एसोसिएट एडिटर रहते हुए मुझे उमेश कुमार ने अपनी अध्यक्षता वाले  प्रेस फाउंडेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय संयोजक की जिम्मेदारी दी थी। 12 साल इस पुराने संगठन को अपने ‘समाचार प्लस’ में कार्यरत साथी जौवाद हसन और राज्यों मे मौजूद अपने साथियों से दो राज्यों से बढ़कर 11 राज्यों तक संगठन विस्तार में कामयाबी मिली। कई मामलों में हमारे विचारों में अंतर के बावजूद ये सिलसिला फिर भी जारी रहता, अगर नवंबर 2016 में हुई नोटबंदी की मार के 6 महीनें बाद मई 2017 में ‘समाचार प्लस’ से करीब आधा दर्जन लोगों की हुई छंटनी में मेरा नाम नहीं होता। उस वक्त जीवन संघर्ष पर आधारित रघुवीर यादव की फिल्म टजैकलीन आई एम कमिंग में उनके बॉस का रोल करते हुए जो मुझे खुशी मिली थी, वो ‘समाचार प्लस’ से मिले नौकरी से हटाए जाने के नोटिस से काफूर हो गई। ‘समाचार प्लस’ की नौकरी खोने के बाद रोजी रोटी और ईवेंट जर्नलिज्म के अभियान को आगे बढ़ाने के तमाम संघर्ष के दौरान भी उन एहसासों को नहीं भुलाया जा सकता, जिसने उमेश कुमार से मेरे जुड़ाव को बढ़ाया था और उन सरोकारी प्रयासों को भी नहीं भुलाया जा सकता, जिसमें हम साथ साथ नजर आए थे।  

(लेखक ‘समाचार प्लस’ के एसोसिएट एडिटर और प्रेस फाउंडेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय संयोजक रहे हैं)

 



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