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‘मीडिया RSS को अब एक नए चश्मे से देखें’

Published At: Tuesday, 12 December, 2017 Last Modified: Tuesday, 12 December, 2017

माधबी श्री ।।

आम तौर पर अगर कोई पत्रकार किसी का इंटरव्यू लेने जाता हैं तो वो सीधा व्यक्ति विशेष से प्रश्न करना शुरू कर देता है जिसका साक्षात्कार लेना हो। अभी हाल में मेरा पहला अनुभव रहा है आरएसएस के मीडिया प्रभारी से बातचीत का। मेरे इंटरव्यू के पहले उन्होंने मेरे बारे में जानना चाहा। किसी भी पत्रकार के लिये यह थोड़ा कष्टदायक या उसके अहं को ठेस पहुंचाने वाला अनुभव होगा, जहां पहले उसके विषय में जानकारी ली जाये। शायद यही कारण है कि पत्रकारों को आरएसएस जरा कम पसंद आती हैं। 

राजनीति पर सीधे-सीधे मैंने कभी नहीं लिखा है सिर्फ फेसबुक पर टीका टिपण्णी चलती रहती है। यह मेरा पहला प्रयास है तो सोचा कहां से शुरू करूं। आज सबसे ज्यादा बीजेपी चर्चा का विषय है, जिस तरह से बीजेपी पूरे देश में छा गयी है। लोगों का स्वाभाविक झुकाव आरएसएस को जानने का बढ़ा हैं। पर आरएसएस एक पहेली की तरह है जिसे लोग सुलझाना चाहते है और समझना भी। मीडिया आरएसएस को हिंदूवादी कहती है और आरएसएस खुद को राष्ट्रवादी। मीडिया का कहना है आरएसएस भारत वर्ष को सिर्फ हिन्दुओं को देश देखना चाहता है। पर आरएसएस का कहना है कि इस देश के सभी पूर्वज हिन्दू थे इसलिए जितने मुस्लिम, ईसाई, सिख है वे मूलतः हिन्दू है।  हो सकता है कईयों को यह बात न पचे। मीडिया आने वाले समय में अगर आरएसएस को अलग बिंदुओं से समझने की कोशिश नहीं करेगा तो वह अधूरी रिपोर्टिंग होगी, यूपी इलेक्शन की तरह या पिछले लोक सभा चुनाव की तरह। 

क्यों भारत में हर दिन आरएसएस की स्वीकारोक्ति बढ़ रही है और विश्व मंच पर भी जहां प्रवासी भारतीयों को केवल हिन्दू बने रहने के लिए कोई जोर-जबरदस्ती नहीं है, तब फिर वे क्यों आरएसएस से जुड़ना चाहते है या उनका झुकाव उनकी तरफ है।

विश्व स्तर पर  धर्म के नाम पर जो आंतकवाद चल रहा है। कहीं उसका असर प्रवासी हिन्दू भारतीयों पर यह तो नहीं पड़ रहा कि वे भी आरएसएस से जुड़ कर खुद को सुरक्षित महसूस करते हों मानसिक तौर पर। मीडिया को इस पहलू पर भी विचार करना होगा। आरएसएस को नज़र अंदाज़ कर मीडिया बीजेपी के बारे में सही और सार्थक रिपोर्टिंग नहीं कर सकता। 

एक और पहलू हैं आरएसएस का- "समाज सेवा"। प्राय: इस बिंदु पर कोई रिपोर्टिंग मीडिया में देखने को नहीं मिलती है। मीडिया को आरएसएस को एक नए चश्मे से देखना होगा। अगर मीडिया वही पुराना चश्मा इस्तेमाल करेंगे, जिससे वह वर्षो से आरएसएस को देखते आयें हैं तो उसी तरह की पत्रकारिता होगी, जिसमें आरएसएस एक सांप्रदायिक पार्टी हैं जिसे जनता को हरा देना चाहिये। पर जनता उसके द्वारा समर्थित पार्टी को जिताती जा रही हैं। बीजेपी की जीत से आरएसएस को फायदा होगा या नहीं यह तो वक़्त बताएगा पर अपनी विचारधारा को थोपते हुए रिपोर्टिंग करके मीडिया पत्रकारिता का नुकसान जरूर कर रही  है। 


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पोल

क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

बड़े लोगों की बातें, बड़े ही जाने, हम तो सिर्फ चुप्पी साधे

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