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‘रेडियो जॉकी’ बनने वाले जरूर पढ़े वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल का ये विश्लेषण...

Published At: Thursday, 05 July, 2018 Last Modified: Thursday, 05 July, 2018

राजेश बादल

वरिष्ठ पत्रकार व पूर्व एग्जिक्यूटिव डायरेक्टरराज्यसभा टीवी ।। 

कहां गए वो स्वर, उच्चारण और अंदाज

बीते दिनों एक प्रसारण केंद्र में रेडियो जॉकी या पुरानी परिभाषा के मुताबिक उद्घोषक का चुनाव करने वाले निर्णायक मंडल में शामिल होने का अवसर मिला। प्रतिभागियों को स्वर परीक्षा से गुजरना था। दो दिन में करीब साठ सत्तर उम्मीदवारों के कंठ और प्रसारण व्यवहार को जांचना था।

बड़े उत्साह से हम तीन लोग उन्हें सुनना चाहते थे। मेरी अपनी दिलचस्पी इसलिए भी थी कि मैं खुद आकाशवाणी के लिए चालीस बयालीस बरस पहले एक कम्पेयर और उद्घोषक की परीक्षा का सामना कर चुका था। कुछ बरस मैंने बतौर अनाउंसर भी काम किया। वो एक ऐसा दौर था जब हमें लोग आवाज के आधार पर गांवों और शहरों में पहचानते थे। जाते, आकाशवाणी का टेपरिकॉर्डर लेकर गाड़ी से उतरते, लोगों से बतियाते और वो तुरन्त नाम लेकर पूछते'- आप तो वो हैं न? उन दिनों टेलिविजन नहीं आया था।

हमने स्वर परीक्षण शुरू किया। जो प्रश्नपत्र उन्हें दिया गया था- मेरी नजर में बहुत आसान था। लेकिन दो दिन के बाद कह सकता हूं कि हमें बड़ी निराशा हुई। आज ज्ञान और संचार के आधुनिक साधन हैं, सुनने के लिए दुनिया भर के रेडियो और टीवी स्टेशन हैं, स्वर- प्रसारण पत्रकारिता पढ़ाने वाले संस्थान हैं, उच्चारण ठीक करने के लिए भी तमाम कोर्स हैं फिर भी हमें चार या पांच लोग बड़ी मुश्किल से मिले।

ऐसा क्यों है? इस प्रश्न का उत्तर हममे से किसी के पास नहीं था। सारे के सारे स्टार रेडियो जॉकी बनना चाहते हैं लेकिन उसके लिए तैयारी कुछ नहीं। न उच्चारण ठीक, न शब्दों की अदायगी और न अपनी बोली के प्रभाव से मुक्त हो पा रहे थे। किसी को देवकी नंदन पांडे, इंदूवाही, अशोक वाजपेयी, जसदेव सिंह और अमीन सायानी के बारे में पता नहीं। क्या किसी को याद है कि एक जमाने में बुधवार की शाम आठ बजते ही शहरों और कस्बों में कर्फ्यू जैसा सन्नाटा हो जाता था। अमीन सायानी की बहनों और भाइयो सुनते ही धड़कने तेज हो जाती थीं और देवकी नंदन पांडे की गरजदार आवाज में - ये आकाशवाणी है! सुनते ही कदम थम जाते थे। लगता था जैसे पांडे जी ने वाणी सम्मोहन से बांध लिया है। भारत के इन महानायकों के बारे में नहीं जानते ये लोग।

सच! बड़ा अफसोस हुआ। आवाज के बुनियादी संस्कारों से वंचित यह पीढ़ी निजी टीवी चैनलों और एफएम रेडियो केंद्रों के एंकर/अनाउंसर की कॉपी करती है। जो आवाज की बारीकियां नहीं जानते, जिन्हें स्वर का उतार चढ़ाव नहीं मालूम, ठहराव का असर नहीं पता, बोलने और लिखने वाले शब्दों का फर्क नही समझते, उनको देख सुनकर नए बच्चे इस पेशे को अपनाना चाहते हैं। क्या किया जाए?


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पोल

क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

बड़े लोगों की बातें, बड़े ही जाने, हम तो सिर्फ चुप्पी साधे

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