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#Medianka: शादी में लोग तो बहुत आए, पर अब देखना होगा ‘व्यवहार’ कितने देंगे?

Published At: Tuesday, 12 February, 2019 Last Modified: Tuesday, 12 February, 2019

प्रमिला दीक्षित।।

आमतौर पर जब आंधी की सूचना होती है तो मौसम विभाग और शुभचिंतक घर से बाहर ना ही निकलने की सलाह देते हैं। लेकिन प्रियंका गांधी का जब आंधी का रूप धर लखनऊ आना हुआ तो कांग्रेस ने पूरी ताकीद की कि हर कोई सड़क पर उतर आए, चैनलों के एंकर-रिपोर्टर चप्पे चप्पे कहकर असल में अपनी संख्यानुसार एक औसत दूरी लेकर तैनात हो गए।

प्रियंका बस की छत पर थी तो ‘आजतक’ ने भी अपनी विशेष बस और एंकरों-रिपोर्टरों के साथ ये कवरेज की। कांग्रेसी कार्यकर्ता 'ना भूतो ना भविष्यति' कहते हुए जोश में गोते खाए जा रहे थे। वहीं ‘एबीपी न्यूज़’ के पंकज झा भीड़ को सामान्य करार दे रहे रहे थे। ‘एनडीटीवी’ ने उन लोगों को ढूंढ निकाला, उनसे भी बात की बकौल एनडीटीवी संवाददाता, जिनके डीएनए में कांग्रेस है! ‘ज़ी न्यूज़’ ने ये पूरा वक्त शहीदों के परिवारों को समर्पित कर दिया। साथ ही निर्विकार भाव से, देश का युवा क्या चाहता है? आम चुनाव में जनता की क्या उम्मीदें है?  जैसी ख़बरों पर कायम रहा।

सोशल मीडिया पर यूपी के अखबारों पर तंज कसे जा रहे हैं कि पहला पन्ना सरकारी ऐड की भेंट चढ़ गया और आंधी में क्या-क्या ढहा इसकी खबर तीसरे-चौथे पन्ने पर चली गई। हालांकि, ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ और ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के  दिल्ली के अखबारों में भी नए उत्तर प्रदेश के अलावा ओप्पो का भी एड है, लेकिन ओप्पो का फ्रंट कैमरा फोकस भी लोगों का ध्यान अपनी ओर नहीं खींच पा रहा जितना मोदी जी, योगी जी के मुस्कुराते चेहरों वाले नए भारत का एड। ‘द टेलीग्रॉफ’ ने अपनी आदतानुसार बड़े फॉन्ट में ‘प्रियकां ग आंधी’ लिखा है।

वैसे मीडिया के प्रियंका प्रेम पर भी सोशल मीडिया पर खूब कटाक्ष हुए। पिछले ट्विटर ट्रेंड्स को देखते हुए इस कवरेज का नाम #Medianka  भी रखा जा सकता था|

एक मॉरल ऑफ द स्टोरी तो ये है कि भइया चाहे अमीर हो या ताकतवर, सत्ता में अपने वजूद के लिए संघर्ष सबको करना पड़ता है। पूरा लखनऊ होर्डिंग से पट गया तो तो एंकरों ने सवाल भी पूछा, लोगों से ज्यादा तो होर्डिंग ही हैं। कांग्रेसी कैमरों पर आ आकर बोलते रहे कि आप भी मजबूर हो गए कवरेज दिखाने के लिए़...

खैर इत्ता स्वागत तो गहलौत, पायलट और ज्योतिरादित्य का भी नही हुआ था, जितना प्रियंका के चुनाव प्रभारी बनने पर पार्टी ने जान लगा दी| लेकिन ये यूपी है भइया, गणित का ध्यान रखना पड़ता है शादी में कित्ते लोग आए? कितनों ने खाना खाया? और कितनों ने व्यवहार दिया?

(ये लेखक के निजी विचार हैं)



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