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वरिष्ठ पत्रकार विनीत नारायण का सवाल- मगहर में प्रधानमंत्री मोदी का मजाक क्यों?

Published At: Saturday, 07 July, 2018 Last Modified: Friday, 06 July, 2018

हमारे देश का यही दुर्भाग्य है कि यवन और पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में हम अपनी सनातन संस्कृति को भूल गए हैं। उसमें हमारा विश्वास नहीं रह गया है और यही भारत के पतन का कारण है।पंजाब केसरी में छपे अपने लेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार विनीत नारायण का। उनका पूरा लेख आप यहां पढ़ सकते हैं-

मगहर में प्रधानमंत्री मोदी का मजाक क्यों

पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संत कबीरदास जी की समाधि दर्शन के लिए उत्तर प्रदेश के मगहर नामक स्थान पर गए थे। जहां उनके भाषण के कुछ अंशों को लेकर सोशल मीडिया में धर्मनिरपेक्ष लोग उनका मजाक उड़ा रहे हैं। इनका कहना है कि मोदी को इतिहास का ज्ञान नहीं है। इसीलिए उन्होंने अपने भाषण में कहा कि गुरुनानक देव जी, बाबा गोरखनाथ जी और संत कबीरदास जी यहां साथ बैठकर धर्म पर चर्चा किया करते थे। 

मोदी आलोचक सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि बाबा गोरखनाथ का जन्म 10वीं शताब्दी में हुआ था। संत कबीरदास का जन्म 1398 में हुआ था और गुरुनानक जी का जन्म 1469 में हुआ था। उनका प्रश्न है फिर कैसे ये सब साथ बैठकर धर्म चर्चा करते थे? मजाक के तौर पर ये लोग लिख रहे हैं कि माना कि अंधेरा घना है, पर बेवकूफ बनाना कहां मना हैबंदर क्या जाने अदरक का स्वाद’? अध्यात्म जगत की बातें अध्यात्म में रुचि रखने वाले और संतों के कृपा पात्र ही समझ सकते हैं, धर्म को अफीम बताने वाले नहीं। इस संदर्भ में मैं श्री नाभा जी कृत व भक्त समाज में अति आदरणीय ग्रंथ भक्तमालके प्रथम खंड से एक उदाहरण देकर यह बताने जा रहा हूं कि कैसे जो मोदी ने जो कहा, वह उनकी अज्ञानता नहीं बल्कि गहरी धार्मिक आस्था और ज्ञान का परिचायक है। 

झांसी के पास ओरछा राज्य के नरेश के राजगुरु, शास्त्रों के प्रकांड पंडित श्री हरिराम व्यास जी का जन्म 16वीं सदी में हुआ था। बाद में ये ओरछा छोड़कर वृंदावन चले आए और श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रमुख आचार्य श्रीहित हरिवंश जी महाराज से प्रभावित होकर उसी सम्प्रदाय में दीक्षित हुए। जिसमें भगवान श्री राधाकृष्ण की निभृत निकुंज लीलाओं का गायन और साधना प्रमुख मानी गई है। इस सम्प्रदाय की मान्यतानुसार वृंदावन में भगवान श्री राधाकृष्ण और गोपियों की रसमयी लीलाएं आठों प्रहर निरंतर चलती रहती हैं। गहन साधना और तपश्चर्या के बाद रसिक संतजनों को इन रसमयी लीलाओं का दर्शन ऐसे ही होता है, जैसे भौतिक जगत का प्राणी टेलिविजन के पर्दे पर फिल्म देखता है। इसे अष्टायाम लीला दर्शनकहते हैं।

श्री हरिराम व्यास जी ने वृंदावन में रहकर घोर वैराग्य और तपश्चर्या से इस स्थिति को प्राप्त कर लिया था कि उन्हें समाधि में बैठकर आठों प्रहर की लीलाओं के दर्शन सहज ही हो जाया करते थे। इसलिए श्री हरिराम व्यास जी का स्थान राधावल्लभ सम्प्रदाय के महान रसिक संतों में अग्रणी माना जाता है। भक्तमालमें वर्णन आया है कि एक बार श्री हरिराम व्यास जी यमुना तट पर समाधिस्थ होकर अष्टायाम लीलाओंका दर्शन कर रहे थे। तभी उनके मन में अचानक यह भाव आया कि जिस लीला रस का आस्वादन मैं सहजता से कर रहा हूं, वह रस संत कबीरदास जी को प्राप्त नहीं हुआ। 

यह विचार मन में आते ही उन्हें लीला दर्शन होना बंद हो गया। एक रसिक संत के लिए यह मरणासन्न जैसी स्थिति होती है। उनकी समाधि टूट गई, नेत्र खुल गए, अश्रु धारा प्रवाहित होने लगी और उनकी स्थिति जल बिन मछली जैसी हो गई। इस व्याकुलता में अधीर होकर, वह हित हरिवंश जी महाराज के पास गए और उनसे लीला दर्शन न होने का कारण पूछा। हित हरिवंश जी महाराज ने कहा कि अवश्य ही तुमसे कोई वैष्णव अपराध हुआ है। जाओ जाकर उसका चिंतन करो और जिसके प्रति अपराध हुआ है, उससे क्षमा याचना करो।

हरिराम व्यास जी पुन: यमुना तट पर आए और समाधिस्थ होकर अपराध बोध से चिंतन करने लगे कि उनसे किस संत के प्रति अपराध हुआ है। तब उन्हें ध्यान आया कि चूंकि कबीरदास जी ज्ञानमार्गीय संत थे, इसलिए व्यास जी के मन में ये भाव आ गया था कि कबीरदास जी को भगवान श्री राधाकृष्ण की अष्टायाम लीला के दर्शन का रस प्राप्त नहीं हुआ होगा। जोकि भक्ति मार्ग के रसिक संतों का सहज ही हो जाता है। जैसे ही यह विचार आया, हरिराम व्यास जी ने अश्रुपूरित कातर नेत्रों से, दीनहीन भाव से संत कबीरदास जी के श्री चरणों में अपने अपराध की क्षमा याचना की। 

व्यास जी यह देखकर आश्चर्यचकित हो गए कि संत कबीरदास जी उनके सामने ही यमुना जी से स्नान करके बाहर निकले और हरिराम व्यास जी से राधे-राधेकहकर सत्संग करने बैठ गए जबकि कबीरदास जी को पूर्ण समाधि लिए लगभग 150 वर्ष हो चुके थे। फिर यह कैसे संभव हुआ? हरिराम व्यास जी ने पुन: अपने अपराध की क्षमा मांगी और तब शायद उन्होंने ही यह पद रचा- मैं तो जानी हरिपद रति नाहिं। आज मैंने जाना कि मेरे हृदय में आज तक भगवान के श्रीचरणों के प्रति अनुराग ही उत्पन्न नहीं हुआ है। आज तक तो मैं यही मानता था कि हमारा ही सम्प्रदाय सर्वश्रेष्ठ है और हमारे जैसे ही रसिक संतों को निकुंज लीला के दर्शनों का सौभाग्य मिल पाता है। आज मेरा वह भ्रम टूट गया। आज पता चला कि प्रभु की सत्ता का विस्तार सम्प्रदायों में सीमाबद्ध नहीं है।

इसी तरह महावतार बाबाजी के शिष्य पूरी दुनिया में हैं और उनका विश्वास है और दावा है कि वह जब भी पुकारते हैं, बाबा आकर उन्हें दर्शन और निर्देश देते हैं। ऐसा हजारों वर्षों से उनके शिष्यों के साथ हो रहा है। अब अगर नरेन्द्र भाई मोदी ने अपने इसी आध्यात्मिक ज्ञान और अनुभव को दृष्टिगत रखते हुए, यह कह दिया कि बाबा गोरखनाथ, संत कबीरदास और श्री गुरुनानक देव जी मगहर में एक साथ बैठकर धर्म चर्चा किया करते थे, तो इसमें गलत क्या है? हमारे देश का यही दुर्भाग्य है कि यवन और पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में हम अपनी सनातन संस्कृति को भूल गए हैं। उसमें हमारा विश्वास नहीं रह गया है और यही भारत के पतन का कारण है।

(साभार: पंजाब केसरी)


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