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भारत के टीवी सीरियल्स से पाक में क्यों मचा है बवाल? क्यों टेंशन में हैं इमरान खान

Published At: Tuesday, 15 January, 2019 Last Modified: Tuesday, 15 January, 2019

 

राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार।।

पाकिस्तान में एक बार फिर हिन्दुस्तान का मनोरंजन सुप्रीम कोर्ट में है। हिन्दुस्तान की कोख़ से निकले इस मुल्क़ को लगता है कि भारत की फ़िल्में, टीवी प्रोग्राम और संस्कृति इस्लाम पर आक्रमण कर रही हैं। हर साल वहां हिन्दुस्तान की सात-आठ फ़िल्मों पर बंदिश लग जाती है। बीते आठ साल में भारत की 38 फ़िल्मों पर रोक लगाई गई। उसके कारण भी बड़े अटपटे हैं।

वहां के सुप्रीमकोर्ट का मानना है कि इससे पाकिस्तानी कल्चर को नुकसान पहुंचता है। पिछले साल आठ फ़िल्मों पर रोक लगा दी गई। इनमें-भाग मिल्खा भाग, रईस, रांझना, परमाणु, मुल्क़, पैडमेन, दंगल, टाइगर ज़िंदा है, उड़ता पंजाब, ढिशूम, नीरजा, कैलेंडर गर्ल्स, हैदर, डर्टी पिक्चर, लादेन और फैंटम जैसी अनेक फ़िल्में शामिल हैं।

कट्टरपंथी समाज और पाकिस्तान

पाकिस्तान की अदालतें और वहां का कट्टरपंथी समाज अक्सर भारत की फ़िल्मों और टेलिविजन कार्यक्रमों को लेकर दोहरा चरित्र अख़्तियार करता रहा है। यूं जो लोग सड़क पर भारतीय मनोरंजन का विरोध करते हैं, अपने घर में छिप-छिपकर हिन्दुस्तानी फ़िल्में देखते हैं। भारतीय फ़िल्मों के वहां के पढ़े-लिखे समाज में गुप्त शो होते हैं और कई दिनों उन पर महफ़िलों में चर्चा होती है। ताज़ा मामला वहां के टीवी मनोरंजन चैनल फिल्माजिया में भारतीय मनोरंजन सामग्री पर बंदिश लगाने से जुड़ा है। आपत्ति इस बात पर है कि इस चैनल पर हिन्दुस्तानी कंटेंट 65 फ़ीसदी से अधिक चला जाता है। अनेक बार तो यह 80 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। भारतीय कंटेंट पर चैनल को भरपूर राजस्व मिलता है।

हाई कोर्ट की ओर से लगाईं गई पाबंदी के विरोध में पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नियामक प्राधिकरण के मुखिया सलीम बेग सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका लेकर पहुंचे थे। उनकी दलील थी कि भारतीय कार्यक्रमों में विशुद्ध मनोरंजन होता है। यह कोई दुष्प्रचार नहीं करता। इस पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि जो भी हो, इससे पाकिस्तानी संस्कृति को क्षति पहुंचती है। अब इस मामले की सुनवाई फरवरी में होगी।

क्यों खतरा महसूस करते हैं पाकिस्तान के हुक्मरान

दरअसल, पाकिस्तान की हुक़ूमतों को हिन्दुस्तान की साझा विरासत से हरदम ख़तरा बना रहता है। उन्हें आशंका रहती है कि अगर पाकिस्तान का समाज हिन्दुस्तान के समाज से घुलमिल गया (जो वास्तव में एक ही था) तो वे किस आधार पर अपनी नफ़रत की राजनीति करेंगे? इसलिए, समय-समय पर उन्हें कोई भूत सवार हो जाता है और वे तुग़लक़ी फ़रमान जारी करती रहती हैं। इमरान ख़ान भी प्रधानमंत्री बनने के बाद फ़ौज़ और कटटरपंथियों की कठपुतली बनकर रह गए हैं।

अपने देश की ख़स्ता-जर्जर आर्थिक हालत से अवाम का ध्यान बंटाने के लिए कभी कश्मीर कार्ड तो कभी भारत से घृणा की राजनीति खेल रहे हैं। हाल ही में उन्होंने इस्लामी कठमुल्लाओं के दबाव में टीवी चैनलों पर सख़्ती दिखानी शुरू कर दी है। अब चैनलों में बेडरूम दृश्य, प्रेम के अंतरंग दृश्य, विवाहेत्तर रिश्तों, शराब, ड्रग्स, आधुनिक पहनावे और बोल्ड थीम वाले धारावाहिकों तथा कंटेंट पर कड़ी पाबंदी लगा दी गई है। यहां तक कि वहां के समाज में महिलाओं की बदतर स्थिति और अपने अधिकारों को लेकर उनके संघर्ष दिखाने वाले कथानकों पर बनी फिल्मों और धारावाहिकों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

दो हज़ार उन्नीस में दाख़िल हो चुके विश्व में पाकिस्तानी सोसायटी पचास बरस वाले सोच और सिस्टम का मुक़ाबला कर रही है। यह मुल्क़ के लिए और वहां की नई नस्लों के लिए कितनी घातक है,इमरान ख़ान की सरकार को इसका अंदाज़ा नहीं है। आने वाले दिन इस लिहाज़ से और भी कठिन हो सकते हैं।

साभारः अमर उजाला



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