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नीतीश कुमार पर वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री का गंभीर विश्लेषण

Published At: Friday, 29 June, 2018 Last Modified: Thursday, 28 June, 2018

नीतीश कुमार को जानने वाले कहते हैं कि जद(यू) को जब राजद-कांग्रेस महागठबंधन से अलग होना था तो किसी को भी कानोकान खबर नहीं हुई, लेकिन जब भाजपा से उन्हें अलग होना होता है तो वह इसका माहौल पहले से बनाना शुरू कर देते हैंहिंदी दैनिक अमर उजाला में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार व कंसल्टिंग एडिटर विनोद अग्निहोत्री का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं-

कुरुक्षेत्र: चुनावी वैतरणी में क्या एनडीए की हिन्दुत्व की नाव पर सवार रहेंगे नीतीश कुमार

लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं सियासी घटनाएं तेजी से घट रही हैं। पहले आंध्र प्रदेश में तेलुगू देशम ने भाजपा का साथ छोड़ा। फिर हाल ही में जम्मू और कश्मीर में भाजपा पीडीपी गठबंधन टूट गया।

बिहार में जनता दल(यू) और महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ भी भाजपा का गठबंधन हिचकोले खा रहा है। लेकिन भाजपा ने 2019 के लिए कश्मीर के रथ पर सवार होकर हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद का अपना चुनावी एजेंडा तय कर लिया है।

अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण के लिए विश्व हिंदू परिषद और मंदिर आंदोलन से जुड़े संतों ने अलख जगानी शुरू कर दी है। अब यह सहयोगी दलों को तय करना है कि उन्हें भाजपा के हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद की छतरी के नीचे चुनाव लड़ना है या विपक्षी दलों के महागठबंधन के बरगद के नीचे शरण लेनी है। हालांकि विपक्षी दलों के महागठबंधन के बरगद को लेकर अभी कई किंतु परंतु हैं और लोकसभा चुनाव आते-आते कौन दल टूटकर किधर जाएगा कुछ भी कहना मुमकिन नहीं है।

लेकिन सबसे ज्यादा दुविधा और असंमजस इन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल(यू) के सर्वेसर्वा नीतीश कुमार को लेकर है, क्योंकि एनडीए के भीतर बिहार में रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी पिछली बार की अपनी सीटों में कोई कमी करने को राजी नहीं हैं और नीतीश कुमार बिहार में 2009 के लोकसभा चुनाव के फार्मूले 25-15 का समझौता चाहते हैं।

यानी नीतीश चाहते हैं कि बिहार में जनता दल(यू) लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बड़े भाई की भूमिका में रहे और लोकसभा की 25 सीटों पर चुनाव लड़े। जबकि 2014 के चुनाव नतीजों के मुताबिक बिहार की कुल 40 सीटों में से भाजपा ने 22, लोजपा ने छह और रालोसपा ने दो जीती थीं।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह बिहार में एनडीए गठबंधन बनाए रखना चाहते हैं, क्योंकि भाजपा, जद(यू), लोजपा और रालोसपा का संयुक्त जनाधार राजद-कांग्रेस गठबंधन पर खासा भारी पड़ सकता है। लेकिन जद(यू) के अलग होने पर और उसके वापस राजद-कांग्रेस के साथ जाने पर बाजी पलट कर 2015 के विधानसभा चुनाव नतीजों जैसी हो जाएगी। इसलिए जद(यू) को साथ बनाए रखने के लिए भाजपा अपनी कुछ सीटें जद(यू) को दे सकती है, लेकिन अकेले जद(यू) को 25 क्या 15 सीटें देना भी मुमकिन नहीं होगा।

पिछले कुछ समय से नीतीश कुमार जिस तरह भाजपा से अपनी दूरी बढ़ा रहे हैं और इसे सार्वजनिक रूप से दिखा भी रहे हैं, उसे एक तरह से एनडीए के भीतर उनकी दबाव राजनीति भी माना जा सकता है। लेकिन दबाव की इस पैंतरेबाजी से ही टकराव और अलगाव का रास्ता भी तैयार हो जाता है।

2014 के लोकसभा चुनावों से पहले 2013 से ही नीतीश ने इसी तरह के तेवर तब दिखाने शुरू कर दिए थे जब भाजपा में नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में लगभग तय हो गया था और आखिर में नीतीश कुमार ने एनडीए छोड़कर अपना रास्ता अलग कर लिया था।

नीतीश कुमार को जानने वाले कहते हैं कि जद(यू) को जब राजद-कांग्रेस महागठबंधन से अलग होना था तो किसी को भी कानोकान खबर नहीं हुई, लेकिन जब भाजपा से उन्हें अलग होना होता है तो वह इसका माहौल पहले से बनाना शुरू कर देते हैं, क्योंकि इसमें वह अपने अल्पसंख्यक जनाधार को भी संबोधित करते हैं और अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि बनाए रखना चाहते हैं। इसलिए जब नीतीश कुमार यह कहते हैं कि कुछ लोग अब कामकाज के आधार पर नहीं जाति और सांप्रदायिकता के नाम पर वोट मांगते हैं। जाहिर है नीतीश के निशाने पर राजद और भाजपा दोनों हैं। यानी एक बार फिर नीतीश अपनी अलग राह बना सकते हैं क्या, यह एक सवाल सियासी गलियारों में अहम है।

लेकिन अगला सवाल यह भी है कि नीतीश अगर एसा फैसला करते हैं तो वह जाएंगे कहां? बिहार में उनकी सरकार कैसे बचेगी? क्या लालू प्रसाद यादव और राजद दोबारा नीतीश कुमार को महागठबंधन में लेना और बिहार में उन्हें मुख्यमंत्री बनाए रखने के लिए अपने समर्थन का सहारा देना मंजूर करेंगे? या नीतीश कांग्रेस राजद से अलग अपनी राह निकाल कर चंद्र बाबू नायडू चंद्रशेखर राव नवीन पटनायक, ममता बनर्जी के तीसरे मोर्चे की राजनीति करेंगे? लेकिन क्या इसके लिए वह बिहार की अपनी सरकार कुर्बान करने की कीमत चुकाएंगे। या फिर नीतीश कुमार की यह बदली भाव भंगिमा महज एनडीए के भीतर रहते हुए बिहार में ज्यादा से ज्यादा लोकसभा सीटें लेने के लिए सिर्फ दबाव की राजनीति का हिस्सा है।

इन सारे सवालों के जवाब भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन जिस तरह से कांग्रेस के बिहार प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल ने बयान दिया कि नीतीश कुमार अगर भाजपा का साथ छोड़ते हैं तो कांग्रेस उन्हें महागठबंधन में लेने को तैयार हो सकती है, उसे महज यूं ही हवा में नहीं उड़ाया जा सकता है। इससे संकेत साफ है कि कांग्रेस अभी भी नीतीश कुमार को लेकर नरम रुख रखती है। 21 जून को जब केंद्र और ज्यादातर राज्य सरकारें विशेषकर एनडीए शासित राज्यों में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस बहुत धूमधाम से आयोजित किया गया, तब नीतीश कुमार और जद(यू) के मंत्री और नेता पटना में उसमें शामिल नहीं हुए। एनडीए में शामिल बिहार के एक धुर नीतीश कुमार विरोधी नेता का दावा है कि नीतीश कुमार अगले दो महीनों के भीतर एनडीए छोड़ देंगे। यह पूछने पर कि नीतीश कहां जाएंगे, वह कहते हैं कि यह उनकी समस्या है।

कश्मीर के नाम पर राष्ट्रवाद की पतवार

नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ी समस्या है कि 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए जिस तरह भाजपा ने कश्मीर के नाम पर राष्ट्रवाद की पतवार लेकर हिन्दुत्व की नाव पर सवार होकर चुनावी वैतरणी पार करने का फैसला कर लिया है और पूरा संघ परिवार राम मंदिर समेत हिन्दुत्व के तमाम मुद्दों को लेकर फिर सक्रिय है, ऐसे में वह अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को बचाते हुए लोकसभा चुनावों में कैसे एनडीए के साथ जा सकते हैं। इसीलिए इन दिनों नीतीश बार बार कह रहे हैं कि वह अपराधीकरण, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता तीनों को देश और समाज के लिए बराबर खतरा मानते हैं और इन मुददों पर कोई समझौता नहीं कर सकते हैं।

इससे साफ संकेत हैं कि वह एनडीए छोडेंगे या नहीं यह तो भविष्य बताएगा, लेकिन भाजपा से एक निश्चित दूरी बनानी उन्होंने शुरू कर दी है। सियासी गलियारों में पर्दे के पीछे सक्रिय रहने वाले खिलाड़ी यह भी कहते हैं कि अंदर-अंदर बहुत कुछ पक रहा है। जिस दिन सारी बातें तय हो जाएंगी, नीतीश जी को पाला बदलते देर नहीं लगेगी। अंदेशा भाजपा को भी है इसलिए भाजपा ने फिलहाल अपने प्रवक्ताओं और गिरिराज सिंह जैसे धुर नीतीश विरोधी नेताओं को जद (यू) के नेताओं और प्रवक्ताओं और नीतीश कुमार के बयानों पर खामोश रहने को कहा गया है।

भाजपा नेतृत्व नहीं चाहता कि दोनों दलों के बीच बयानबाजी से तनाव और टकराव बढ़े। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के एक करीबी के मुताबिक सीटों के बंटवारे में अभी वक्त है, इसलिए इस मुद्दे पर पार्टी में कोई चर्चा अभी नही हुई है, लेकिन फिर भी जद(यू) एनडीए में बना रहे, इसके लिए भाजपा अपनी हिस्सेदारी कुछ कम भी कर सकती है। लेकिन 2009 का फार्मूला पूरी तरह लागू होना नामुमकिन है क्योंकि तब बिहार में सिर्फ भाजपा और जद(यू) का गठबंधन था, अब लोजपा और रालोसपा भी हैं। इन्हें भी साथ रखने के लिए भाजपा और जद(यू) दोनों को अपने अपने दावों पर कुछ नरमी बरतनी होगी।

लेकिन भाजपा नीतीश कुमार के रुख को लेकर बेहद सतर्क भी है। इसलिए पार्टी नीतीश कुमार के अलग होने की स्थिति में भी एनडीए को मजबूती से मैदान में बनाए रखने और अपनी जीत सुनिश्चित करने की रणनीति पर भी काम कर रही है। इसके लिए भाजपा नीतीश कुमार के अति पिछड़े वर्गों के जनाधार में सेंध लगाने की तैयारी में है।

नीतीश कुमार भी इसे भांप रहे हैं। दोनों दलों के बीच रस्साकसी का ये दौर आने वाले दिनों में बिहार की सियासत में अगर कोई नया गुल खिलाता है तो उसका असर 2019 के लोकसभा चुनावों की राष्ट्रीय राजनीति पर भी खासा पड़ेगा।

(साभार: अमर उजाला)

 

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