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वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता बोले- ये मोदी की सबसे बड़ी भूल है

Published At: Tuesday, 10 July, 2018 Last Modified: Saturday, 07 July, 2018

इतिहास में सफल नेताओं का पहला जरूरी गुण रणनीतिक धीरज रहा है। वे दृढ़ता से आगे बढ़ते हैं लेकिनबदलाव की गुंजाइश भी रखते हैं। मोदी ने ऐसी कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी।’ दैनिक भास्कर में छपे अपने लेख के जरिए ये कहना है द प्रिन्ट’ के एडिटर-इन-चीफ शेखर गुप्ता का। उनका पूरा लेख आप यहां पढ़ सकते हैं-

चुनावों में विदेशी मुद्‌दे भुनाना भारी पड़ गया

भारत का बाहरी और रणनीतिक परिदृश्य किसी त्रासदी जैसा दिखता है। बहुप्रचारित टू प्लस टू संवाद को तीसरी बाद स्थगित करने के अमेरिकी अपमान से ही इसका संबंध नहीं है। एक साल पहले हमने जो देखा थाआज का परिदृश्य उससे जरा भी नहीं मिलता। तब प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्राध्यक्षों को गले लगा रहे थे। भारत उभरती शक्ति था और मोदी इसके शक्तिशाली मुखरऊर्जावान नए नेताएक सितारे थे। पिछले छह माह में इसका काफी कुछ गंवा दिया गया है। 

मोदी समर्थक विरोध करेंगे पर महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा रखने वाला देश हकीकत से मुंह नहीं मोड़ सकता। सरकार के पहले तीन साल हम एक के बाद एक ‘महान कूटनीतिक विजयों’ का जश्न मनाते रहे। भारत को जिम्मेदार शक्ति के बतौर परमाणु मिसाइल संबंधी तीन वैश्विक समूहों में लिया गया। उपमहाद्वीप में अमेरिकी नीति में भारत को अंतत: अलग स्थान मिला। बिल क्लिंटन के दूसरे कार्यकाल से भारत का बाहरी माहौल सुधर रहा था। 15 साल की आर्थिक वृद्धि से संचालित नीतिगत निरंतरता ने इसकी दिशा तय कर दी। मोदी की ऊर्जाशैली और पूर्ण बहुमत ने अच्छी तेजी दी। फिर किस चीज ने इस ट्रेन को पटरी से उतारादो बाहरी नकारात्मक घटनाओं में मोदी सरकार की गलती नहीं है : एक तो ट्रम्प का उदय और दूसरा चीन की नई आक्रामकता। ट्रम्प के कदमोंखासतौर पर ईरान नीति में बदलाव से तेल की कीमतें बढ़ीं और भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था व राजनीति अस्थिर हो गई। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर भारत की चिंताओं की परवाह न करते हुए चीन का जोर देने तथा श्रीलंकानेपालमालदीव और बांग्लादेश में इसके कदमों ने दिखा दिया कि चीन अब उपमहाद्वीप को भारतीय प्रभुत्व का क्षेत्र रखने का इच्छुक नहीं है। वे दिन गए जब जॉर्ज बुश फोन पर हू जिंताओं से भारत को एनएसजी के लिए छूट देने को कह सकते थे। अब शी जिनपिंग सुनेंगे नहीं बल्कि ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि ट्रम्प यह करेंगे नहींक्योंकि यदि मोदी लेन-देन में भरोसा करते हैं तो ट्रम्प इस सौदेबाजी में और भी बढ़-चढ़कर हैं।

मोदी की सबसे बड़ी भूल है संवेदनशील बाहरी रिश्तों को घरेलू राजनीति में भुनाना। इतिहास में सफल नेताओं का पहला जरूरी गुण रणनीतिक धीरज रहा है। वे दृढ़ता से आगे बढ़ते हैं लेकिनबदलाव की गुंजाइश भी रखते हैं। मोदी ने ऐसी कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी। प्रमुख राज्यों के सारे चुनावों में उन्होंने विदेश नीति की ‘विजय’ को केंद्र में रखाइसका फायदा भी मिला लेकिनइतनी जल्दी जीत घोषित करने के अपने खतरे हैं। इससे आपकी रणनीतिक गुंजाइश घट जाती है। पूर्ववर्ती सरकारों की तरह चुप रहने की बजाय एक क्षेत्र में की गई सीमित सर्जिकल स्ट्राइक को उन्होंने 1984 के वसंत में सियाचिन विजय के बराबर बता दियाजबकि इंदिरा गांधी ने कभी कुछ नहीं कहा। उत्तर प्रदेश के चुनाव में लोगों की प्रतिक्रिया से उत्साहित होकर ऐसी बातें होने लगीं कि 2018 के उत्तरार्ध में कुछ बड़े पैमाने पर ऐसी ही कार्रवाई राष्ट्रीय चुनाव का रुख बदल सकती है। डोकलाम और बाद के कदमों से सतर्क हुए चीन ने स्ष्ट कर दिया कि वह एक सीमा के आगे भारत को सैन्य भुजाएं फड़काने नहीं देगा। उसने साफ कर दिया कि पाकिस्तान अब उसकी छत्रछाया में है।

व्यापार में भी ऐसी गलतियां हुईं। चिकित्सा उपकरणों खासतौर पर स्टेंट पर नियंत्रण को चुनावी चर्चा बना दिया गया। ट्रम्प ने जब प्रतिक्रिया दी तो आपके पास विकल्प ही नहीं थे। हर्ले डेविडसन बाइक पर कम आयात शुल्क की उनकी लड़ाई मजेदार थी। बड़े इंजन की कुछ बाइक भारत में बिकने से किसी भारतीय निर्माता को खतरा महसूस नहीं होता। ट्रम्प को जीत का अहसास देकर मूल्य नियंत्रण की बजाय चिकित्सा उपकरणों पर गरीबों को सब्सिडी देनी थी। दशकभर करीब 8 फीसदी की वृद्धि दर से जो प्रभाव भारत को मिला थावह बर्बाद हो गया। 

पिछले साल 13 नवंबर को मनीला में मोदी और ट्रम्प के बीच हुई बैठक बहुत खराब रही। न सिर्फ ट्रम्प के व्यवहार व देहबोली में गर्मजोशी नहीं थी बल्कि व्यवहार भी अपमानजनक था। फिर वह विडियो आयाजिसमें वे मोदी के बोलने के तरीके की खिल्ली उड़ा रहे थे। फिर उन्होंने भारतीय व्यापार पर प्रहार किया। इसी के साथ वीजा को लेकर ब्रिटेन ने कड़े कदम उठाए। जब आप भारतीय पासपोर्ट के लिए बढ़ते सम्मान को बड़ी उपलब्धि बता रहे हों तो ऐसी बातें चोट पहुंचाती हैं। 

अपनी ताकत की शेखी बघारते रहना हमेशा जोखिम भरा होता है। चार साल से भारत अमेरिका के स्वाभाविक सामरिक सहयोगी होने का जश्न मना रहा है लेकिनइस बीच उसका सैन्य पतन हुआ है। सेना की पेंशन का बजट दो साल में उसके वेतन के बजट को पार कर जाएगा। आक्रामक और कारगर सामरिक शक्ति होने की बजाय यह पुरानी शैली की सेना है। चीन हर साल तीन युद्घपोत बना रहा है। हम तीन साल में एक युद्धपोत नहीं बना पा रहे।

घटती सैन्य शक्ति के साथ आर्थिक मंदी से हालत और बुरी हो गई है। आप जीडीपी आकलन की व्यवस्था बदलकर लोगों को मूर्ख बना सकते हैं लेकिनअगर आप इस पर यकीन करने लगें तो यह खतरनाक है। भारत उदय की बात लगातार सुनने को मिलती रही है। कैसे दुनिया भारत की ओर देख रही है। योग दिवस अब भारत की सॉफ्ट पॉवर का वैश्विक उदाहरण बन चुका है और क्रिसमस को टक्कर दे रहा है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने तो (प्रणब मुखर्जी की मौजूदगी वाले आयोजन में) घोषणा कर दी कि भारत विश्व गुरु बनने की राह पर है। अगर ऐसा है तो हमारे सदाबहार और बेहतरीन मित्र अमेरिका के साथ रिश्ते क्यों कमजोर पड़ रहे हैंहमारे सभी पड़ोसी चीन को गले क्यों लगा रहे हैंबांग्लादेश को छोड़कर सभी शत्रुतापूर्ण और संदेहास्पद क्यों बने हैंट्रम्प इस विश्वगुरु के प्रधानमंत्री के साथ रूखा व्यवहार करने की हिम्मत कैसे कर सकते हैंनिक्की हेलीजिनकी ट्रम्प प्रशासन में कोई खास हैसियत नहीं हैवह भारत आकर उसे अपनी ईरान नीति बदलने का आदेश कैसे दे सकती हैंयह भी देखिए कि कैसे शी जिनपिंग के साथ मोदी की देहबोली बदल चुकी है। यह कब से हो गया कि सीपीईसी के पाक अधिकृत कश्मीर के भारतीय क्षेत्र से सीपीईसी के गुजरने का भारतीय नेताओं ने विरोध करना बंद कर दिया है?

(साभार: दैनिक भास्कर) 


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क्या इंडिया टीवी के चेयरमैन रजत शर्मा का क्रिकेट की दुनिया में जाना सही है?

हां, उम्मीद है कि वे वहां भी उल्लेखनीय कार्य कर सुधार करेंगे

नहीं, जिसका काम उसी को साजे। उनका कर्मक्षेत्र मीडिया ही है

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