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4 साल में मोदी सरकार के अच्छे-बुरे दिनों पर चर्चा...

Wednesday, 06 June, 2018

नीरज नैयर

पत्रकार ।।

मोदी सरकार के 4 साल: अच्छे दिन भले ही न आए, लेकिन विदेश नीति में बहुत कुछ बदला है

 नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने चार साल पूरे कर लिए हैं। इन चार सालों में एक बात तो जनता को समझ आ गई है कि अच्छे दिनमहज चुनावी वादा था और इसके पूरे होने की कोई उम्मीद नहीं है। तेल के दाम आसमान छू रहे हैं और प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे में शिकन तक नजर नहीं आती, ऐसे में यह समझना मुश्किल हो गया है कि ये वही मोदी हैं जो विपक्ष में रहते वक्त जनता से जुड़े मसलों पर आंखें नम कर दिया करते थे। इन चार सालों में स्वयं मोदी और भाजपा को भी यह आभास हो गया है कि विपक्ष में रहकर सवाल उठाना सत्ता में रहकर काम करने से कहीं आसान हैं। 

कल तक जिन बातों पर भाजपा कांग्रेस नीत यूपीए सरकार की खिंचाई किया करती थी, जो बातें उसे देश और जन विरोधी लगती थीं, आज वही उसके लिए जरूरी हो गई हैं। उसके नेता भी पिछली सरकार के नेताओं की तरह अहंकारी भाषा इस्तेमाल करने लगे हैं। सीधे शब्दों में कहें तो देश की जनता के एक बड़े हिस्से पर प्रभाव छोड़ने में मोदी सरकार अब तक असफल ही साबित हुई है। लेकिन यदि विदेश नीति की बात करें, तो इस मामले में सरकार ने पूर्ववर्ती सरकारों से ज्यादा बेहतर प्रदर्शन किया है। 

कांग्रेसकाल में भारत के दूसरे देशों से रिश्ते कैसे थे? ये जगजाहिर है। निसंदेह अमेरिका से परमाणु करार एक बड़ी उपलब्धि था, मगर उसके प्रारूप से लेकर प्रावधानों तक में अमेरिकी वर्चस्व साफ तौर पर नजर आता था। यह कहना गलत नहीं होगा कि यूपीए सरकार की विदेशनीति पूरी तरह से अमेरिका के इर्द-गिर्द ही सिमटकर रह गई थी, इसी के चलते वामदलों का कांग्रेस से तलाक हुआ। इसके विपरीत मोदी सरकार बेहद संतुलित तरीके से सभी देशों को साथ लेकर चलने की रणनीति पर काम कर रही है। 

सबसे अच्छी बात तो ये है कि पाकिस्तान को लेकर जो दोहरा रवैया पिछली सरकार के वक्त नजर आता था, वो अब तक इस सरकार में देखने को नहीं मिला है। मोदी इस बात को अच्छे से समझते हैं कि किसी एक के ज्यादा करीब जाना रणनीतिक संतुलन के लिहाज से नुकसानदायक हो सकता है, इसलिए वे अमेरिका, चीन के साथ-साथ जापान, नेपाल, श्रीलंका और भूटान को बराबरी का सम्मान दे रहे हैं। बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली आधिकारिक यात्र भूटान थी, जो इस बात का सबसे बड़ा सबूत है। 

आमतौर पर प्रधानमंत्री अपने विदेश दौरों की शुरुआत किसी सशक्त देश से करते हैं। मोदी के अलावा सरकार की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज भी रिश्तों में मिठास घोलने के लिए कई देशों की यात्रा कर चुकी हैं। इनमें कुछ तो ऐसे हैं, जिनके नाम भी यदा-कदा सुनने में आते हैं। कांग्रेस के कार्यकाल में भारत और श्रीलंका के बीच जो दूरियां बढ़ी थीं, मौजूदा सरकार उसे भी पाटने में जुटी हुई है। सामरिक तौर पर श्रीलंका भी हमारे लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि नेपाल, लेकिन जब लिट्टे से संघर्ष के दौरान श्रीलंका को हमारे साथ की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब तमिलनाडु में अपनी राजनीति बचाने के लिए कांग्रेस ने हाथ खड़े कर दिए थे। चीन ने इसका फायदा उठाते हुए श्रीलंका को हथियारों की सप्लाई की़ इसके बाद से भारत के प्रति श्रीलंका का मिजाज तल्ख होता गया। ये तल्खी श्रीलंकाई सेना द्वारा भारतीय मछुआरों के साथ बर्बरता के रूप में कई बार सामने आ चुकी है। हालांकि अब इस तरह की घटनाएं कम होने लगी हैं। 

मोदी सरकार की विदेशनीति की एक अच्छी बात ये भी है कि वो रूस को फिर से करीब लाने के प्रयास कर रही है। मनमोहन सरकार ने अमेरिका से निकटता बढ़ाने की जद्दोजहद में रूस को नजरअंदाज कर दिया था। रूस और भारत के रिश्तों का इतिहास काफी सुनहरा रहा है। अंतरिक्ष से लेकर भारत की विभिन्न क्षेत्रों में कामयाब छलांग के पीछे रूस की भूमिका अहम थी। बावजूद इसके रूस को लेकर प्राथमिकताएं बदलती रहीं। गोर्शकोव सहित कई मुद्दों पर दोनों देशों के बीच बढ़ती दूरियां पूरी दुनिया को दिखाई दीं थीं। भारतीय राजनीति के इतिहास में मनमोहन सिंह अकेले ऐसे प्रधानमंत्री रहे जिनका मास्को दौरा महज 24 घंटों में समाप्त हो गया वो भी औपचारिकापूर्ण समझौतों के साथ। 

प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी अब तक 55 से ज्यादा विदेश यात्राएं कर चुके हैं। इस बात को लेकर उनकी आलोचना भी हो रही है, कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों का तर्क है कि देश पर ध्यान देने के बजाए प्रधामनंत्री विदेशों में समय गुजार रहे हैं। लेकिन वो शायद भूल गए हैं कि घर की सुख-शांति तभी कायम रह सकती है जब आस-पड़ोस शांत है। अशांत पड़ोसी ताकतवर से ताकतवर व्यक्ति के समक्ष मुश्किलें खड़ी कर सकता है। 

चीन और पाकिस्तान के संदर्भ में हम ये देखते ही आ रहे हैं। पाकिस्तान को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर सबसे ज्यादा शह चीन से मिलती है, ऐसे में चीन को साधने की नरेंद्र मोदी की कोशिश की आलोचना नहीं, सराहना की जानी चाहिए। आमतौर पर भारतीय प्रधानमंत्री के चीन दौरे को सीमा विवाद के हल से जोड़कर देखा जाता है। यही वजह है कि जब इस मुद्दे पर कोई बात नहीं बनती तो दौरे को असफल करार दे दिया जाता है। जबकि संभावनाएं तलाशने के दूसरे रास्ते भी हैं। 

मोदी के हालिया दौरे में सीमा विवाद पर चर्चा हुई, मगर सामाजिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान, व्यापार संतुलन पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया। मोदी का मानना है कि आपसी संवाद का दायरा जितना विस्तृत होगा, दोनों मुल्कों के लोग एक-दूसरे के जितना करीब आएंगे सीमा विवाद जैसे जटिल मुद्दे सुलझने की संभावना उतनी ही अधिक रहेगी।

मोदी सरकार दूर होते नेपाल को पास लाने की दिशा में भी उल्लेखनीय कार्य कर रही है। पिछली सरकार के कार्यकाल में भारत और नेपाल के बीच एक अदृश्य सीमा खिंच गई थी जिसका फायदा चीन उठा रहा था। आज पूरे विश्व में भारत का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है, भारतीय प्रधानमंत्री से मिलने, उनसे हाथ मिलाने की होड़ हर तरह देखी जा सकती है। केवल अमेरिका ही नहीं दुनिया का हर देश हमसे रिश्ते मजबूत करने की इच्छा रखता है, जो पाकिस्तान रह-रहकर हमारी मुश्किलें बढ़ा रहा था, आज वो अलग-थलग पड़ गया है। 

अंदरूनी तौर पर वो इतना टूट गया है कि उसकी फौज भारत से बेहतर रिश्तों की हिमायत कर रही है। कुल मिलाकर कहा जाए तो नरेंद्र मोदी सरकार के ये चार साल विदेश नीति के लिहाज से काफी अच्छे गुजरे हैं, जहां तक बात महंगाई या अन्य कुछ मुद्दों की है तो सरकार को जल्द ही इस बारे में कुछ सोचना चाहिए, क्योंकि महज एक सब्जेक्ट में अच्छे नंबरों के सहारे परीक्षा पास नहीं की जा सकती।



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