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क्या आपको पता था इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के बारे में

Published At: Monday, 11 March, 2019 Last Modified: Tuesday, 12 March, 2019

‘न्यूज की दुनिया, तकनीकी और सोशल मीडिया’

भव्य श्रीवास्तव
वरिष्ठ पत्रकार।।

न्यूज की दुनिया कैसे बदल रही है, इसके लिए आपको अपने टीवी स्क्रीन और अखबार से बाहर निकलकर देखना होगा। समाचार या सूचना का बाजार हर दिन बड़ा होता जा रहा है और ऐेसा केवल एक वजह से हो रहा है। जिस एक शब्द में सूचना के सागर को समेटा जा सकता है वो है-यूजर जेनेरेटेड कंटेंट। इसका सीधा का अर्थ है कि आम जनता जिस सूचना को न्यूज बनाकर पेश कर रही है।

1978 में पहली बार वार्ड क्रिसटेंशन और रैंडी श्यूज ने Computerised Bulletin Board Sytem नाम की एक तकनीक ईजाद की, जिससे आप अपने दोस्तों को मिलने-जुलने, पार्टी, और सूचनाओं का आदान प्रदान कर सकते थे। ये सोशल मीडिया की शुरुआत थी। 1993 में यूनिवर्सिटी ऑफ एलानॉए के छात्रों ने Mosaic नाम का एक ब्राउजर बना दिया था, जिस पर कोई भी वेबसाइट खोली जा सकती थी। 1993 में GeoCities सेवा आई, जिससे कोई भी अपनी वेबसाइट बना सकता था। 1998 का साल ब्रिटेन में Friends Reunited आई, जिससे कोई भी पुराने दोस्तों को खोज सकता था। 1998 में Google शुरू हुई और 1998 में ही ब्लॉगर नाम की सेवा शुरू हुई, यानी कोई भी अपना पेज इंटरनेट पर बनाकर कुछ भी लिख सकता था। 2000 में दुनिया की पहली सबसे लोकप्रिय सोशल मीडिया सेवा Friendster शुरू हुई, तीन महीने में ही तीस लाख यूजर बने। 2002 में MySpace आया। 2003 में LinkedIn आया। 2004 में फेसबुक ने हार्वर्ड से शुरूआत की, ये Friendster का कॉलेज वर्जन था, जिसका दायरा उस वक्त केवल कॉलेज के दोस्तों को जोड़ना भर था। फेसबुक को 10 मिलियन की पेशकश आई, जिसे उसने ठुकरा दिया। MySpace इस समय यानी 2004 में अमेरिका में सबसे लोकप्रिय सोशल नेटवर्किग था। 2004 में यूट्यूब ने बाजार में दस्तक दी। 2005 में फेसबुक को Viacom ने खरीदने के लिए 75 मिलियन का ऑफर दिया, जिसे मार्क जुकरबर्ग ने फिर ठुकराया।

न्यूज के लिए आधिकारिक तौर पर 2004 का साल खास रहा। Digg नाम की एक सोशल न्यूज साइट ने अपने यूजर्स को कहीं से भी खबरें उठाकर पोस्ट करने की सेवा दी। साथ ही BeBo आया, यानी Blog Early, Blog Often - ये एक और सोशल नेटवर्किंग पेज था। लोगों ने अपनी राय रखना, खबरों को शेयर करना शुरू कर दिया था। 2006 में Twitter आया। उस वक्त Google पर 40 करोड़ खोजें रोज हो रही थीं। 2008 में फेसबुक ने ट्विटर को 500 मिलियन में खरीदने की कोशिश की। 2009 में पहली बार Twitter पर Hudson River में हवाईजहाज के उतरने की फोटो एक यूजर ने पोस्ट की। यहीं से लोगों ने Twitter को सूचना पेश करने वाले माध्यम के तौर पर जाना।

2009 में इंटरनेट ने अखबार पढ़ने वालों की संख्या को पीछे छोड़ दिया। इस समय 1.97 अरब लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे थे। गूगल ने फेसबुक और ट्विटर से लड़ने के लिए 2010 में Buzz शुरू किया, जो Gmail से जुड़ा था, पहले ही हफ्ते में इस पर 90 लाख पोस्ट आए। आज 2019 में हम सूचनाओं के लिए जिन भी नए माध्यमों पर निर्भर हैं वो तेजी से बदल रहे हैं। भले ही फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, इंस्टाग्राम सबसे लोकप्रिय सोशल मीडिया माध्यम हो, पर खबरों की दुनिया में बहुत कुछ बहुत तेजी से बदल रहा है। आज शिन्हुआ ने वर्चुअल एंकर्स से लेकर बॉट्स तक से खबरें बनवानी शुरू कर दी है। और ये फाइनेंशियल बाजार से लेकर मौसम तक की जानकारियों को सटीक तरीके से पेश कर रहे हैं। ब्लूमबर्ग ने Cyborg की मदद से कंपनियों के आंकड़ों से खबर बनाना शुरू कर दिया है। वाशिंगटन पोस्ट के हैलियोग्राफ ने ओलंपिक से लेकर चुनावों तक में सटीक रिपोर्टिंग की है।

भारत में समाचार जगत में तकनीकी ने पहले न्यूज वेबसाइट, ईपेपर, सोशल मीडिया और फिर एप पर अपनी जगह बनाई। इसमें मानवीय पहलू अभी भी हावी दिखते हैं। मशीन पर भरोसा तो है पर सूचना को कलम से लिखने की आदत यहां अभी भारी है। ट्विटर और फेसबुक पर खबरों का अंबार लगा तो फेक न्यूज से माहौल संशय का ज्यादा बना है। न्यूज रूम में हर चीज को खुद की समझ से पेश करने से एंकर्स और संपादक की सोच और रुझान से जनता रूबरू हो चुकी है। प्रसारण और छपाई तक में तकनीक ने गहरी पैठ बनाई है पर कंटेंट को लेकर मशीनों को लगाकर सूचनाओं का रस निकालने में अभी समय लगेगा। हां, लेकिन जैसे प्रिंट से टीवी की ओर अखबार वाले पत्रकार बढ़े थे, वैसे ही अब टीवी से डिजिटल की ओर तेजी से ब्रॉडकॉस्ट जर्नलिस्ट बढ़ रहे हैं। खबरों को आने, लाने, बनाने, पेश करने तक के रास्ते में बहुत सारे बदलाव होने हैं। पेश करने को लेकर को हम सभी चौकन्ने हैं पर खबर के और पक्षों पर अभी हमें तकनीक का सही और सटीक इस्तेमाल करना होगा। InShorts जैसे एप ने ये बताया है कि कैसे तकनीक के लोग भी इस माध्यम को सही से पेश कर सकते हैं, भले ही वो पत्रकार न हों, पर पढ़ने वालों की जरूरतों को समझते हैं। DailyHunt जैसे एग्रीगेटर आज पाठक को एक जगह सबकुछ दे रहे हैं। ShareChat जैसे एप सूचनाओं के अंबार के साथ मौजूद हैं जहां अभी समाचार को जगह बनानी है। UcWeb, NewsDog जैसे चीनी एप भी लोगों को सूचना, खबरों और विचारों के लिए बड़े पायदान हैं।

समय के साथ खबरें बदलीं है। राजनीति जरूरी है तो तकनीकी की खबरें भी उसी चाव से पढ़ी जाती हैं। धर्म के प्रति रूझान है तो खाना बनाने के विडियो भी बहुत लोकप्रिय हैं। अखबार एक हद तक इन सामग्रियों को अपने बहुत सारे पन्नों पर जगह दे रहा है, पर टीवी न्यूज का पर्दा हर चीज को नहीं समेट पा रहा है। उसके लिए उसके सोशल मीडिया के पन्ने ही भविष्य का सहारा हैं। यहां वो अपनी नई पहचान बना सकता है। जो टीवी से ऊब चुके दर्शक के लिए नया झरोखा हो सकती है।

(साभार:फेसबुक)



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