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वक्त आ गया है जब मोदी-विरोधी और देश-विरोधी होने में भी लकीर खींची जाए

Published At: Monday, 18 February, 2019 Last Modified: Monday, 18 February, 2019

मोदी-विरोधी और देश-विरोधी होने में मात्राओं का, नहीं नीयत की मात्रा का फर्क है, ज़रा संभलकर!

प्रमिला दीक्षित।।

कल देर रात इंडिया गेट से लौटी थी शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करके। अफसोस, वहां अफसोस ही लेकर गई थी और आई भी अफसोस लेकर! मोमबत्ती जलाने के बाद मेरी बेटी ने मुझसे कहा, ‘मम्मी फोटो तो खींचो’! मैंने कहा, ‘हम यहां फोटो खींचने नही आए हैं! तुम्हें पता है हम यहां किसलिए आए हैं?’ उसने कहा,-सब तो फोटो ही खींच रहे हैं मम्मा! मन में चुभा, नौ साल की उस बच्ची को ये हम क्या सिखा रहे हैं?

मुझे लगता है स्मार्टफोन ने हमारी पीढ़ियों की बरसों से कमाई-संजोई संवेदना को निचोड़ मारा है। वहां मौजूद ज़्यादातर लोगों के एक हाथ में मोमबत्ती थी और दूसरे हाथ में सेल्फ़ी का पोज़ ताने फोन और शायद दिल-दिमाग़ में हैशटैग की जद्दोजहद।

पुलवामा-देश पर हमला, लेकिन भारत में अपना अच्छा वक्त बिता रहे ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ को लगा, लोकल यूथ के लिए सरकार कहां पाकिस्तान पर आरोप लगाए दे रही है? चैनलों की कवरेज में दर्द भी था और आक्रोश भी। सोशल मीडिया पर पुलवामा पर दर्द की बजाय एंकर काहे गुस्से में हैं, इस पर ज्यादा चर्चा रही। ‘ज़ी न्यूज़’ और ‘इंडिया टीवी’ को तुरंत बदले की दरकार रही। ऊंची आवाज से अगर बदला मुमकिन होता तो ‘रिपब्लिक’ अब तक ले चुका होता। हालांकि, ‘रिपब्लिक’ की एक खासियत ये है इसके बाद आपको ‘ज़ी’ और ‘इंडिया टीवी’ फिर भी संयत लगने लगेंगे। ‘आजतक’ ने इस मामले पर अपनी कवरेज सधी हुई रखी, जिसमें गुस्सा भी जायज जितना था और दुख तो ये 40 जन्मों का है ही।

पुलवामा की ख़बर, तस्वीरें बहुत तकलीफ़ देती हैं। ‘न्यूज़ नेशन’ और ‘नेटवर्क 18’ के एंकरों का ख़बर से गला भी भर्राया और रो भी पड़े-ये एक मानवीय संवेदना है और इन आसुओं को, ‘एंकर का काम समभाव से खबरें पढ़ना होता है’ से ऊपर रखना चाहिए। हां, जब कांग्रेस की प्रियंका चतुर्वेदी हमले के बाद एक चैनल पर एक घंटे तक चीख चिल्लाहट करें और अगले ही घंटे दूसरे चैनल पर भावुक होकर गला भर्रा लें तो अखरता है। सुरजेवाला हमले के तुरंत बाद दुख भी जताएं और सरकार की नाकामी भी बताएं,  तो अखरता है। अमित शाह रैली में बोलें बीजेपी की सरकार है, कांग्रेस की नहीं, इसलिए हम बदला लेंगे, तो अखरता है। तारीफ़ प्रियंका गांधी और राहुल गांधी की जिन्होंने ऐसे वक्त में पहले भारतीय होने की ज़िम्मेदारी का मान रखा।

बाकी सोशल मीडिया पर ‘काम चालू आहे’ के अंदाज में टुकड़ियां एक्टिव हो ही चुकी हैं। ग़लत ख़बरें, भड़काऊ पोस्ट, सरकार ने ये किया, सरकार ने वो नहीं किया सब चल रहा है। लेकिन बॉस, हमें रहना तो यहीं है। अभी हमारे घर संकट आया है। उसे तो अपनी दोफाड़ का अंदाजा न दो। जैसे मोदीभक्त और देशभक्त में फर्क करने की नसीहतें आती हैं, वक्त आ गया है जब मोदी-विरोधी और देश-विरोधी होने में भी लकीर खींची जाए!

 



पोल

पुलवामा में आतंकी हमले के बाद हुई मीडिया रिपोर्टिंग को लेकर क्या है आपका मानना?

कुछ मीडिया संस्थानों ने मनमानी रिपोर्टिंग कर बेवजह तनाव फैलाने का काम किया

ऐसे माहौल में मीडिया की इस तरह की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है और यह गलत नहीं है

भारतीय मीडिया ने समझदारी का परिचय दिया और इसकी रिपोर्टिंग एकदम संतुलित थी

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