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'मीडिया में लौट रहा है सरोकार और सम्मान का दौर'

Monday, 23 April, 2018

अमर आनंद

मीडिया जहां पहुंचा है वहां पर सबकुछ अच्छा है, ये नहीं कहा जा सकता। खास तौर से जो जनता टीवी की टीआरपी और अखबारों की रीडरशिप तय करती है उस जनता की नजरों में तेजी से अपनी इमेज को गिरता हुआ देखना मीडिया के लिए बहुत आशाजनक दौर नहीं कहा जा सकता, लेकिन पिछले दिनों जो हुआ वाकई मीडिया के लिए जनता के लिए और मीडिया में काम कर रहे लोगों के लिए उत्साह बढ़ाने वाला हुआ है। जिस तरीके से उन्नाव और कठुआ की आवाज को मीडिया में बुलंद किया गया उसे तवज्जों दी गई। बेटियों को लेकर हुए प्रदर्शनों को दिखाया गया और सरकार की खामोशी को निशाने पर लिया गया, वो तरीका ही मीडिया की पहचान रहा है और मी़डिया को आम लोगों की नजरों में नायक बनाता है।

बेरोजगारी, बेकारी, भूखमरी, तालीम और सेहत से जुड़ी समस्याओं से जूझ रही और सत्ता पर बैठे लोगों के छल का शिकार रही देश की जनता ने हमेशा मीडिया को अपने आत्मबल और आत्मविश्वास के रूप में देखा है। जनता की समस्याओं और सिस्टम की बद इंतजामी के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले मीडिया की गूंज ने कई सरकारें बदल डालीं हैं,  पर अपना सरोकार नहीं बदला। ऐसी जनधारणा रही है। पिछले कुछ साल के वाकयों ने लोगों की इस धारणा के उलट तस्वीर पेश की है। सत्ता के पक्ष में ज्यादा और सरोकारों के पक्ष में कम दिख रहे मीडिया की खूब आलोचना हुई है। हालांकि कुछ चैनल तो सरकार के सामने दंडवत की मुद्रा में साफ तौर पर नजर आए हैं। 

पिछले दिनों एक्सचेंज4मीडिया में 2020 में न्यूज रूम की परिकल्पना पर संवाद का दौर था और डायस पर बड़े-बड़े चैनलों के धुरंधर सामने थे और अपने-अपने तरीके से चिंताएं जाहिर कर रहे थे। उन चिंताओं में ये भी शामिल था कि न्यूज रूम कहीं विचारधाराओं में न बंट जाए और वैचारिक टकराव के हालात न पैदा हो जाएं। सियासत के बाद जब सरोकारों की बात आई तो मेरा सवाल था कि न्यूज रूम में कितनी सरकार और कितना सरोकार हैवो बात आई गई हो गई,  लेकिन पिछले दिनों जो हुआ वो मेरे सवाल के जवाब के हिस्से की तरह था।। सरकार का परवाह किए बगैर जिस तरीके जन सरोकारों के साथ खड़ा रहा मीडिया वो वाकई काबिल-ए-सलाम था। अलग-अलग टोन में बात करने वाले अलग अलग चैनल एक ही टोन में बात कर रहे थे। मीडिया की इस मुहिम ने इस मामले में सरकार और सिस्टम को कटघरे में खड़ा किया और ताकतवर आरोपी को सलाखों के पीछे पहुंचाकर दम लिया। 

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को ऐसे दौर में देखना इससे जुड़ाव की वजह से वाकई खुशी देता है। ये सिलसिला चलता रहे तो वाकई मीडिया का सरोकार न सिर्फ उसे खोया हुआ सम्मान दिलाएगा, बल्कि इस सम्मान को और आगे बढ़ाएगा। सोशल मीडिया के इस दौर पर जबकि कोई सच जनता से छुपाया नहीं जा सकता, मीडिया के एक तरफा और तटस्थ नहीं होने को लेकर खड़े होने वाले सवाल और बढ़ने लगे थे, लेकिन पिछले दिनों के मीडिया कवरेज ने उन सवालों को पीछे छोड़ दिया है। मीडिया के अलबंरदारों को कोशिश ये होनी चाहिए बगैर किसी किंतु-परंतु के इसी तरह सरोकारों के साथ बढ़ते चलें और सरकारों को अपने आचरण से बताएं कि उनकी अच्छी चीजों की तारीफ तो करेंगे, लेकिन उनकी कमियों को भी उजागर करने में पीछे नहीं हटेंगे। 

देश और मीडिया ने बड़े-बड़े संपादकों का दौर देखा है, जिनसे मुख्यमंत्री भी समय लेकर मिला करते थे। आज के दौर में संपादकों को मिलने का समय बड़ी मुश्किल से मिलता है। पिछले दिनों एक तस्वीर ऐसी भी देखी गई जिसमें एक नामचीन चैनल के स्थानीय संपादक स्तर के एक पत्रकार को उनके चैनल के आयोजन पहुंचने पर सीएम और डिप्टी सीएम का पांव छूते देखा गया। सवाल ये उठता है कि क्या ऐसे लोग खबरों के साथ निष्पक्ष रह पाएंगे या इंसाफ कर पाएंगे? सर्वजन हिताय- सर्वजन सुखाय के टोन में जिस मीडिया को बात करनी चाहिए वो मीडिया ऐसे लोगों की नुमाइंदगी में क्या स्वार्थपरता का जरिया नहीं बन जाएगा?

लच्छेदार शब्दों और बड़े-बड़े आदर्शों की बात करने वाले मी़डिया के शिखर पर बैठे कई दिग्गजों की अथाह संपत्ति को लेकर भी सवाल उठे हैं। इनमें से कई बड़े नेताओं की आय से ज्यादा संपत्ति पर धारदार एंकरिग करते नजर आते हैं जबकि खुद की संपत्ति उनकी आय के कई गुना होती है। कई संपत्ति तो उनके नाम पर न होकर उनके रिश्तेदारों और करीबियों के नाम पर होती है। यानी  जिन मामलों को हम उठा रहे हैं, जिन पर जनता का ध्यान खींचकर अपने चेहरे चमका रहे हैं, वही सब खुद के साथ भी जुड़े हुए हैं। हिप्पोक्रेसी की इसी विधा पर अपनी सुविधा के साथ काम कर रहे मीडिया के एक हिस्से ने इसकी इमेज का वाकई बंटाधार किया है, लेकिन इसी दौर में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपने पेशे की ईमानदारी के लिए नौकरी तक को दांव पर लगा देते हैं। अपने सवालों से समझौता नहीं करते। देश भी ऐेसे पत्रकारों का सम्मान करता है और उनके सवालों के साथ खड़ा नजर आता है। 

बहुत कुछ ऐसा है जो नहीं होना चाहिेए। बहुत कुछ ऐसा है जो और होना चाहिए। इस होने और न होने के बीच खड़े मीडिया के असर को सिर्फ जनसरोकार ही आगे बढ़ा सकता है। सरकार तो बिल्कुल नहीं। सरकारों के भरोसे रहने वाली मीडिया को किस तरह मुंह की खानी पड़ती है इसका उदाहरण यूपी/उत्तराखड के कई चैनल हैं, सरकार बदलते ही, जिनके दुर्दिनों की शुरुआत होने लगी और अब तो ऐसा है कि अच्छे दिन कब आएंगे इसकी कोई भी गारंटी नहीं ले सकता।

 

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