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#MeToo: दोनों जेंडर्स बनते हैं 'शिकार' क्योंकि दोनों तरफ है शिकारी....

Published At: Thursday, 11 October, 2018 Last Modified: Friday, 12 October, 2018

 मृत्युंजय त्रिपाठी 

युवा पत्रकार

सांप-सीढ़ी न खेलिए तो यहां सब ठीक है

रिसेप्शनिस्ट से शुरुआत कर बिना किसी डिग्री व अनुभव, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्राइम टाइम एंकर बनने से लेकर प्रिंट मीडिया में एडिटर बन जाने वाली महान लड़कियों की कई कहानियां मेरे पास हैं जो कहीं न मिलेंगी। कहिए तो सुनाएं? 

खैर छोड़िए, नहीं तो मीडिया के क्षेत्र में जो दो-चार पात्र दिख रही हैं, जिनके लिए कहा जा रहा है कि देखो इस क्षेत्र में भी लड़कियां अपनी प्रतिभा के दम पर लड़कों से आगे निकल रही हैं, उनमें से अधिकतर पात्रों की पात्रता खतरे में पड़ जाएगी।

अरे हां, आप यदि नहीं जानते कि मीडिया में मी-टू (#Mee Too) टाइप का कैंपेन क्या है तो जान लीजिए कि यह सांप-सीढ़ी जैसा ही खेल है और कुछ नहीं। जब आपको शॉर्टकट मिला और आप सीढ़ी से ऊपर पहुंच गए या गईं तो टॉप एंकर-एडिटर और यदि सांप ने डंस लिया, आप नीचे आ गिरे या गिरीं तो हो गया न आपका शोषण।

मी-टू कैंपेन में अधिकतर कहानियां कुछ वैसी ही घिसी-पिटी हैं, जिनमें वर्षों तक मनोहर कहानियां, सत्य कथाएं टाइप मजा रहता है और अचानक ‘सावधान इंडिया’ जैसा मामला बन जाता है। बाकी आप समझदार हैं...। यदि सांप-सीढ़ी न खेलिए तो​ भी मीडिया में रह सकते या रह सकती हैं। हां, आगे बढ़ने की रफ्तार थोड़ी कम होगी लेकिन इसी के साथ यह बेहतर बात होगी कि न आप पर कोई आरोप लगा सकेगा, न शायद आपको किसी पर आरोप लगाने का मौका होगा...।

सौभाग्य से कुछ लड़कियों को मैंने जर्नलिज्म पढ़ाया भी है और प्रशिक्षित भी किया है। लेकिन उनमें से अधिकतर अभी कहां हैं, हम नहीं जानते। पता नहीं कि वे हमें जानती हैं या नहीं कि अभी हम कहां हैं। पढ़ाई या प्रशिक्षण के बाद कुछ लड़कियां मीडिया में हैं तो कुछ राजनीति में। कुछ से संपर्क भी है और कुछ से नहीं भी। लेकिन, जो राजनीति में हैं, उनसे राजनीति की बातें होती है जो मीडिया में हैं उनसे मीडिया की, देश-दुनिया की। कुछ से सभी विषयों पर बात होती है और कुछ से कोई बात ही नहीं होती। यहां बड़ी बात यह है कि यदि वह दोस्त है तो हम या वह अपनी मर्यादा क्यों लांघेंगे और यदि दोस्त नहीं है तो बात क्या करेंगे? क्यों करेंगे? वॉट्सऐप-वॉट्सऐप क्यों खेलेंगे? यह मिलना-मिलाना क्यों?

बॉलिवुड के बाद अभी मीडिया में मी-टू की कहानियां चर्चा में हैं। क्या आपको इस तरह की कहानियां आश्चर्य में नहीं डालतीं? आपको आश्चर्य नहीं लगता कि अखबार, टीवी चैनल वाले जब सभी बेरोजगारों को सावधान करते हैं कि वे नौकरी के लिए किसी को भी पैसा न दें, कोई शॉर्टकट न अपनाएं, सीधे आवेदन करें और नियमानुसार ही नौकरी पाएं, तो फिर मीडिया में ही काम करने वाली लड़कियों या लड़कों को क्या यह बुनियादी बात पता नहीं होगी? इस समय मीडिया में तमाम ऐसे पोर्टल चल रहे हैं जिनमें अखबार, पोर्टल, चैनल में होने वाली वैकेंसी का जिक्र रहता है। उसमें मेल आईडी दिया रहता है, जिस पर रेज्युमे दे देना होता है। कॉल आई तो जाकर इंटरव्यू देना होता है और यदि सेलेक्ट हुए तो ठीक वरना दूसरी जगह यही तरीका अपनाना होता है।

हिन्दुस्तान, अमर उजाला से लेकर दैनिक जागरण तक मैंने खुद इसी तरीके से नौकरी पाई है। सवाल है कि यह तरीका लड़कियां क्यों नहीं अपनातीं? किसी शॉर्टकट की तलाश में रेज्युमे से भी पहले मिलना-मिलाना होता है? हम तो डेढ़ साल से इसी दिल्ली-एनसीआर में हैं लेकिन कभी प्रेस क्लब नहीं गए, क्योंकि हम जानते हैं कि वहां क्या होता है फिर मीडिया क्षेत्र की शरीफ लड़कियां वहां क्या करने जाती हैं?

जो भी दिल्ली के मीडिया में है, उसे ठीक तरह से पता है कि प्रेस क्लब कुल मिला-जुलाकर अय्याशी का अघोषित अड्डा है, यह जानते हुए भी यदि वहां कोई जाता है तो उसकी भेंट क्या किसी महापुरुष से होगी? नहीं! अधिकतर तो यही मुमकिन है कि उसकी मुलाकात किसी अय्याश से ही होगी। हम चाय पीते हैं तो मिलने वाले से भी चाय पीने का ही आग्रह करते हैं लेकिन जब आप प्रेस क्लब में किसी शराब पीने वाले के साथ बैठिएगा, तो वह शराब पीने का ही आग्रह करेगा। हम किसी के घर नहीं जाते, न लाते हैं, जब तक कि वह पारिवारिक न हो जाए। जबकि एक लड़के के तौर पर दुनिया यही कहती है कि मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं है। सवाल है कि आखिर लड़कियां तपाक से क्यों किसी के घर चली जाती हैं या बुलाती हैं जो बाद में अपना सबकुछ लुट जाने की व्यथा भी पोस्ट करती हैं?

जोर-जबरदस्ती अपनी जगह है, ऐसा करने वालों को बेनकाब किया जाना चाहिए, लेकिन सहमति के बाद असहमति वाले मामले को रेप का नाम दिया जाए तो सावधान हो जाएं, क्योंकि अब यह मीडिया के क्षेत्र में एंकर, एडिटर जैसा ही एक अलग रोजगार बन चुका है जिसका वेतन हर पद से अधिक है।

सांप-सीढ़ी के इस खेल का शिकार होकर न जाने कितने होनहार पत्रकारों ने अपनी जान तक की कीमत चुकाई है। हाल ही में दैनिक भास्कर के समूह संपादक कल्पेश याग्निक इसी तरह की सांप-सीढ़ी खेल का शिकार हो गए। अति महात्वाकांक्षी लड़कियां किसी भी कीमत पर आगे बढ़ना चाह रही हैं और वह भी बहुत कम समय में। अति महात्वाकांक्षी लड़के भी इसी राह पर हैं। लड़कियां खुद ही को पेश कर रही हैं तो लड़​के उनको, दूसरे तक पहुंचा रहे हैं। मगर, इस तरह की कहानियां अभी भी गिनी-चुनी ही हैं, यही मीडिया नहीं है। मीडिया सांप-सीढ़ी का खेल खेलने वाले लड़के-लड़कियों से इतर भी है। इस क्षेत्र में संघर्ष की कितनी ही कहानियां पड़ी हुई हैं जो अनकही हैं, उनका जिक्र होना चाहिए। मीडिया में न हर लड़की अय्याश है और न ही हर लड़का, लेकिन सांप-सीढ़ी के इस खेल से हर लड़के और हर लड़की को स्वयं को बचाना चाहिए क्योंकि दोनों तरफ ही शिकार हैं और दोनों तरफ शिकारी भी।

(साभार: फेसबुक वाल से)

 



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