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नई दुनिया के संपादक आशीष व्यास ने बताई CM कमलनाथ से उम्मीदें

Published At: Tuesday, 22 January, 2019 Last Modified: Tuesday, 22 January, 2019

आशीष व्यास
संपादक, नई दुनिया।।

युवा, सस्ता श्रम, भरपूर जमीन-फिर भी पीछे क्यों है मध्य प्रदेश?

‘भारत चौथी वैश्विक औद्योगिक क्रांति में बड़ी भूमिका निभा सकता है, क्योंकि आधी से अधिक आबादी 27 साल से कम उम्र की है। इसके अलावा अंग्रेजी बोलने तथा मोबाइल पर इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाली दूसरी सबसे बड़ी आबादी भी भारत में ही है। हालांकि, देश कौशल एवं शिक्षा के मामले में काफी पीछे रह जाता है। इसमें सुधार के साथ आधारभूत संरचना एवं बिजली की उपलब्धता तथा मौद्रिक एवं वित्तीय नीतियों में स्थिरता की जरूरत होगी’। यह मान्यता है विश्व आर्थिक मंच के अध्यक्ष बोर्गे ब्रेंडे की।

उनका यह संदेश आया है स्विट्जरलैंड के खूबसूरत शहर दावोस से। यूरोप में सबसे ऊंचाई पर स्थित महज 11000 आबादी वाले इस छोटे से शहर से हर साल जनवरी में एक बड़ी पहल होती है- ‘वैश्विक स्तर पर उद्योगों को एक मंच पर लाएं और दुनिया की औद्योगिक दिशा तय करें।‘ इस वर्ष 21 से 25 जनवरी तक होने वाले आयोजन का विषय है ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम: फोर्थ इंडस्ट्रियल रेवेल्यूशन (चौथी औद्योगिक क्रांति)।’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस के साथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ भी इसमें भागीदारी कर रहे हैं। यह पहला अवसर होगा, जब मध्य प्रदेश का कोई मुख्यमंत्री दावोस जाकर हिंदुस्तान के 'दिल’ की बात करेगा! प्रदेश के लिए यह इसलिए भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि मुख्यमंत्री कमलनाथ बतौर केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पहले भी दावोस में देश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

अब पुन: लौटते हैं बोर्गे ब्रेंडे के बयान पर। उन्होंने भारत को चौथी औद्योगिक क्रांति का नेतृत्वकर्ता मानते हुए जो स्थापनाएं गढ़ी हैं, उसमें से बिजली और आधारभूत संरचना मध्य प्रदेश के पास है। 27 साल से कम उम्र की जिस युवा पीढ़ी की बात कही जा रही है, उसमें मध्य प्रदेश आबादी के मान से देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है, इसलिए राष्ट्रीय भागीदारी में भी दूसरे स्थान पर है। चुनाव आयोग के आंकड़ों को ही आधार मानें तो मध्य प्रदेश में करीब 1 करोड़, 37 लाख, 83 हजार 383 ऐसे युवा हैं, जिनकी आयु 20-29 साल के बीच है। इनमें से 18-19 साल की आयु वर्ग वाले युवाओं की संख्या करीब 23 लाख है। 

यानी, भारत यदि चौथी औद्योगिक क्रांति की अगुआई कर सकता है तो मध्य प्रदेश उस क्रांति की ‘मशाल’ थामने की जिम्मेदारी-जवाबदेही निभा सकता है! छिंदवाड़ा मॉडल के वास्तु-शिल्पकार माने जाने वाले प्रदेश के नए मुख्यमंत्री पेशे से उद्योगपति भी हैं। इसलिए, दावोस से प्रदेश के उद्योगपतियों ने भी इस बार ज्यादा उम्मीदें लगा रखी हैं। मुख्यमंत्री के इलाके महाकोशल से ही उद्योगपतियों की बात आगे बढ़ाते हैं। फेडरेशन ऑफ एमपी चेंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के उपाध्यक्ष अरुण जैन कहते हैं, 'मध्य प्रदेश में खनिजों का भंडार है। विशेष रूप से महाकोशल और विंध्य क्षेत्र में मैग्नीशियम, बॉक्साइट, लोहा, तांबा, हीरा, चूना पत्थर जैसे खनिज बड़ी मात्रा में मौजूद हैं। इसमें गुणवत्ता के लिहाज से हीरा, मैग्नीशियम और लोहा निर्यात के मानकों पर भी खरे खनिज हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर मध्य प्रदेश की इन खूबियों का प्रचार कर मल्टीनेशनल कंपनियों को निवेश के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए। ठीक इसी प्रकार रक्षा भी एक बड़ा क्षेत्र है, जहां सैन्य उपकरणों के निर्माण में बड़े पैमाने पर स्वदेशी या मल्टीनेशनल कंपनियों का निवेश हो सकता है। मध्य प्रदेश में एक समय था जब जबलपुर में सैन्य उपकरणों और वाहनों के कलपुर्जों के निर्माण की 75 से ज्यादा सहायक इकाइयां थीं, यह अब घटकर छह रह गई हैं।‘ 

6000 कलपुर्जों की जरूरत 

मध्य प्रदेश में निवेश की संभावनाएं कितनी हैं, इसका एक उदाहरण यह है कि प्रदेश में रक्षा मंत्रालय के लिए तैयार होने वाले वाहन जबलपुर स्थित निर्माणी कारखानों में बनाए जाते हैं। इनमें विभिन्न् तरह के लगभग 6000 कलपुर्जे लगते हैं। फिलहाल 80 प्रतिशत कलपुर्जे प्रदेश के बाहर से मंगवाए जाते हैं। यदि ये पुर्जे बनाने वाले कारखाने मध्य प्रदेश में ही लग जाएं तो लागत काफी घट सकती है और रोजगार भी पैदा हो सकते हैं। मध्य प्रदेश में निवेश की बात शुरू होते ही उद्योग जगत की पहली प्रतिक्रिया बार-बार यही होती है कि यहां बेहतरीन जलवायु, अच्छी सड़कों का नेटवर्क, पर्याप्त मात्रा में बिजली-पानी, दूसरे राज्यों से अच्छी कनेक्टिविटी, व्यवसाय के लिए शांत वातावरण और सबसे जरूरी सस्ता श्रम भी है। इससे उलट यदि मध्य प्रदेश में मौजूद औद्योगिक क्षेत्रों का इतिहास टटोलें तो साफ समझ आता है कि एक ही समय में, एक जैसी सुविधाओं से शुरू हुए औद्योगिक क्षेत्रों के विकास में आज भी जमीन-आसमान का अंतर है। यह सवाल इसलिए हमेशा सामयिक और प्रासंगिक बना रहता है कि वर्ष 2006 से 2016 तक हुई इनवेस्टर्स समिट के एमओयू जमीन पर ज्यादा असर नहीं दिखा पाए! प्रचार और प्रभाव दिखाने के सभी उपक्रम करने के बावजूद निवेश के प्रतिशत ने हमेशा निराश ही किया है! 

इंदौर-भोपाल : बड़े मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट्स लगें

रक्षा के अतिरिक्त भी ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं, जहां निवेश की संभावनाएं हैं। लेकिन कुछ नहीं होने से ही यह धारणा लगातार बनती रही कि मध्य प्रदेश में बड़े-बड़े उद्योगपतियों को केवल बुलाने से ही औद्योगिक विकास संभव नहीं हो सकता। मंडीदीप इंडस्ट्री एसोसिएशन के अध्यक्ष डीके जैन कहते हैं, 'यदि विदेशी बाजार का अध्ययन किया जाए तो पता चलेगा कि कपड़ों के बड़े-बड़े ब्रैंड की मैन्यूफैक्चरिंग वियतनाम या बांग्लादेश में हो रही है। मालवा-निमाड़ में कॉटन इंडस्ट्री होने के बावजूद हमने गारमेंट्स क्षेत्र में बड़े निवेश के बारे में सोचा ही नहीं। जबकि इंदौर-भोपाल में बड़ी मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट्स के जरिए बड़ी मात्रा में निर्यात किया जा सकता है। यह सेक्टर महिलाओं के साथ छोटे कारीगरों-व्यापारियों के लिए भी नए रोजगार पैदा कर सकता है। औद्योगिक संगठनों द्वारा किए गए आकलन के अनुसार बेंगलुरु में 20 हजार रुपए के लिए व्यक्ति जो काम करता है, वही काम मध्य प्रदेश में 12 हजार रुपए में हो जाता है। यह सस्ता श्रम, प्रोडक्ट की लागत भी काफी कम कर सकता है।‘ फिर भी मध्य प्रदेश में निवेश क्यों नहीं होते? क्या कमी राजनीतिक इच्छा शक्ति की है या फिर प्रशासनिक तंत्र ऐसी व्यवस्था नहीं बना पाता, जिससे बेहतर निवेश के लिए माहौल बनाया जा सके। यदि कुछ दिखाई-सुनाई भी देता है तो वादों, घोषणाओं और केवल कागजों में! नीति और नीयत का नियंत्रण नहीं होने के कारण अच्छे प्रस्ताव भी फाइलों में दबे रहते हैं! इसका एक उदाहरण नीचे की घटना में कहीं झांकता हुआ मिल जाएगा! 

... तो जमीन नहीं दे पाए! 

हाल ही में देश की एक नामचीन कंपनी ने बड़ी मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट लगाने के लिए मध्य प्रदेश में कुछ एकड़ जमीन मांगी। 'जमीन तलाशी जा रही है, जब मिलेगी तो बताएंगे’, इस जवाब के साथ फिलहाल कंपनी को लौटा दिया गया है। जबकि मध्य प्रदेश का दावा है कि वह देशभर में सबसे ज्यादा लैंड बैंक वाले राज्यों में शामिल है। इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स एंड बिजनेस के विशेषज्ञ और देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर के स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रो. कन्हैया आहुजा कहते हैं, 'दरअसल उद्योग 'बुलाने’ से नहीं आते हैं। सकारात्मक माहौल होगा तो वे खुद ही आ जाएंगे। मध्य प्रदेश को दो व्यवस्थाएं दुरुस्त करने की जरूरत है, लालफीताशाही कम हो और नेतृत्व की दूरदर्शिता बढ़े।‘ 

पहली औद्योगिक क्रांति में कृषि का योगदान 

पहली औद्योगिक क्रांति इंग्लैंड से शुरू हुई। तब इंग्लैंड का व्यावसायिक वर्ग सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त था। सरकार भी व्यापारियों के कार्यों में सहायता करती थी। सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों में तालमेल के कारण ही यह संभव हुआ। बदलाव के इस उल्लेखनीय पड़ाव में भी कृषि का ही योगदान सबसे ज्यादा था। मध्य प्रदेश के संदर्भ में हम इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि जिस प्रदेश में कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 20 प्रतिशत  हो, वहां निवेश नहीं ला पाना चिंता का विषय होना चाहिए? लगातार कृषि कर्मण अवार्ड जीतने वाले प्रदेश के लिए यह इसलिए भी बड़ा प्रश्न है कि फूड प्रोसेसिंग के लिए अभी यहां काफी काम किया जाना बाकी है। बेहतर जलवायु से हमने कृषि का दायरा, गुणवत्ता और उपज बढ़ा ली लेकिन वेयरहाउस और कोल्ड स्टोरेज के मामले में पिछड़ गए!

बहरहाल, खाली खजाने के आरोप के साथ सत्ता में आई कमलनाथ सरकार से प्रदेश का उद्योग जगत फिर उम्मीद लगाए बैठा है। निवेश की नई संभावनाओं की तलाश में परदेस गए मुख्यमंत्री जब लौटें तो कागजों के बाहर भी यह लगना चाहिए कि दावोस ने मध्य प्रदेश के विकास को नई दिशा दी है।



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