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'पद्म सम्मान के मजबूत हकदार हैं 80 साल के संतोष आनंद'

Published At: Saturday, 01 December, 2018 Last Modified: Tuesday, 04 December, 2018

अमर आनंद

वरिष्ठ पत्रकार ।।

आप अपनी यादों को जरा चार साल पीछे 2014 में ले जाइए। उन चार साल पुरानी तस्वीरों को याद कीजिए जिनमें देश के माहौल में हर तरफ व्याप्त एक गीतकार अपने इकलौते बेटे और बहू की असामयिक मौत के बाद मीडिया कैमरों के सामने लाचार खड़ा था सदी के सबसे लोकप्रिय और खुद के लिखे गीत 'एक प्यार का नगमा' की इन पक्तियों को जीते हुए कि 'घर फूंक दिया हमने, अब राख उठानी है, जिंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी मेरी कहानी है'। 'परछाइयां रह जाती, रह जाती निशानी है, जिंदगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है'।

  इकलौते बेटे को खोने का जख्म, बेटे की अमानत उस वक्त तीन साल की उम्र की पोती को बेहतर भविष्य देने की जिम्मेदारी के बीच 80 साल के गीतकार के 'जुनून' और समाज के 'अंधेरों' में 'रोशनी' देने की इनकी ज़िद का मुरीद भला कौन नहीं होगा, देश के वो जवान भी, जिनके क़दम गीतों के ज़रिए 'क्रांति' लाने वाले संतोष आनंद के गीत 'अब के बरस धरती की रानी', 'दिल दीवाने का जोड़ा कश्मीर के लिए' और 'ये शान तिरंगा है' पर न सिर्फ थिरक उठते हैं बल्कि बुजुर्ग गीतकार को अपनी गोद में उठाकर वो खुद को धन्य महसूस करते हैं। देश और समाज के लिए इस गीतकार की सक्रियता बरकरार है अपने नगमों को लेकर गमों से वो ये कहकर आगे बढते हैं कि 'और नहीं, अब और नहीं गम के प्याले और नहीं'।


लड़खड़ाते कदमों और कंपकंपाते हाथों से बावजूद संतोष आनंद का हौसला नहीं टूटा, बड़ी मुश्किल से बड़ी मिन्नतों से मुद्दत के बाद मिली बुढ़ापे की लाठी यानी इकलौते बेटे को भी वक्त ने छीन लिया, लेकिन जीवन संघर्ष की उनकी ताकत में जो बात है वो शायद कहीं नहीं। रोते-रोते गाने और गाते-गाते हंसने वाले इस गीतकार ने अपनी जीवन शैली को अपने गम को पहले ही अपने गीतों में बयां कर दिया है अब तो उन गीतों को जीते हुए नजर आ रहे हैं। 'कुछ पाकर खोना है, कुछ खोकर पाना है। जीवन का मतलब तो आना और जाना है।' भला जीवन का ये फलसफा किसका मार्गदर्शन नहीं करेगा- 'दो पल के जीवन से, इक उम्र चुरानी है। ज़िन्दगी और कुछ भी नहीं, तेरी-मेरी कहानी है।'

26 फिल्में, 109 गीत, दो फिल्म फेयर पुरस्कार, दादा साहब फाल्के फाउंडेशन सम्मान यश भारती सम्मान और देश-विदेश में न जाने कितने लाइफ लाइम एचीवमेंट 'रोटी कपड़ा और मकान' के 'शोर' में खुद को खोते जा रहे जन मानस को 'प्रेम रोग' के जरिए रुमानियत का एहसास कराते हुए उनके 'जुनून' को बरकरार रखने और उनके मन में 'संतोष' लाने का बीड़ा इस गीतकार ने उठाया।

कहते हैं कि कलमकार देश और समाज की चेतना का प्रतीक होता है उसका प्रतिनिधित्व करता है इस गीतकार ने तो न सिर्फ समाज की चेतना को जगाए रखा, बल्कि उनके निराश मन को छूने की कोशिश करते हुए अपने गीतों के जरिए उनमें आशा और उम्मीद का भी संचार करता रहा। संतोष आनंद को पद्म सम्मान से नवाजने के लिए देश और समाज के वास्ते अब और कैसा योगदान चाहिए नीति निर्धारकों को? संतोष आनंद ने तो अपने गीत 'चना ज़ोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार' के जरिए चने वाले की देशभक्ति दिखाई अब देखना ये है अपने हर अंदाज में देशभक्ति का प्रदर्शन करने वाले और खुद को गर्व से चाय वाले कहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार उनको पद्म सम्मान देने के मामले में क्या करती है?


समाज के नफरत भरे माहौल के खिलाफ देशप्रेम के बाद प्रेम पर अपने गीतों के जरिए ज़ोर देने वाले गीतकार संतोष आनंद ने 'प्यार का नगमा' 'मोहब्बत है क्या चीज' 'मैं हूं प्रेम रोगी' जैसे गीत लिखकर ये बता दिया कि  'संगीत' को गीत के जरिए जोड़कर भी कोई 'क्रांति' की जा सकती है और तब उनकी कलम से ये निकल पड़ा 'जो गीत नहीं जन्मा वो गीत बनाएंगे, तेरे प्यार का सुर लेकर संगीत बनाएंगे'। संतोष आनंद के गीतों का समाज शास्त्र देखिए। ‘शोर’, ‘रोटी’, ‘कपड़ा और मकान’, ‘क्रांति’, ‘प्रेम रोग’, ‘संगीत’ और ‘तिरंगा’ समेत 26 फिल्मों में गीत देने वाले 1970 से 1998 तक फिल्मों में सक्रिय रहे संतोष आनंद चालीस से पचास की उम्र की जिस पीढ़ी में अपनी गीतों के जरिए हौसला, जज्बा और जुनून भरने की वजह से लोकप्रिय हैं, वो पीढ़ी नई और पुरानी और नई पीढ़ी के बीच पुल का काम कर रही है। इस पीढ़ी के कुछ लोग नीति नियंताओं में हैं, तो कुछ  आज भी 'रोटी कपड़ा और मकान' के लिए जूझ रहे हैं। आम लोगों की तरह ही सिस्टम की बदइंतजामी और खुद के लिए बेरुखी जब संतोष आनंद को परेशान करती है तो उनका पुरुषार्थ प्रबल हो जाता है और वो अपने गीतों के जरिए ही सिस्टम के खिलाफ नाराजगी जाहिर करते हुए कहते हैं 'तुम साथ न दो मेरा, चलना मुझे आता है, हर आग से वाकिफ हूं जलना मुझे आता है।'

ईवेंट जर्नलिज्म के अपने अभियान को संतोष आनंद के गीतों से जोड़कर आगे ले जाने के दौरान मुझे ये महसूस हुआ कि इनके गीतों के जरिए लोगों को जोड़ना, उन्हें अपनी बात समझाना ज्यादा आसान है। संतोष आनंद के साथ 'एक प्यार का नगमा' (संतोष आनंद के व्यक्तित्व पर) ऐ वतन तेरे लिए, वतन पे जो फिदा होगा, जय जवान, जय हिन्दुस्तान और भारत की बात सुनाता हूं ( देशभक्ति पर), ये गलियां, ये चौबारा (बेटियों के जज्बे पर) के बाद एक दिसंबर 2018 को जिंदगी की न टूटे लड़ी ( संघर्षरत लोगों को प्रेरणा देने के लिए) समारोह/टीवी शो करते हुए मुझे ये लगता है कि हमारे पास हौसले और जज्बे का एक प्रकाशपुंज है और हमें इस प्रकाशपुंज के चिरायु होने और देश के 'अंधेरों' में इससे 'रोशऩी' लेने के अभियान को जारी रखना चाहिए। 'तेरा साथ है तो हमें क्या कमी है, अंधेरों से भी आ रही रोशनी है' इस बात को ध्यान में रखते हुए अपने संतोष आनंद के मुरीदों और अपने साथियों की मदद से देश की तमाम पुलिस के जवानों के साथ उनके समारोहों का सिलसिला जारी रखा जाएगा। उनके सान्निध्य में बेटियों के लिए 'ये गलियां, ये चौबारा' और हार को जीत में बदलने की प्रेरणा देने वाले समारोह 'जिंदगी की न टूटे लड़ी' के देश भर में ले जाया जाएगा। 

हमारी दो कोशिशें हैं पहली ये कि ऐसे दौर में जहां लोगों को काफी औसत उपलब्धियों पर पद्म सम्मान मिल जाता है वहां, संतोष आनंद को उनकी उम्र रहते इससे वंचित न रखा जाए और दूसरी कोशिश ये होगी कि उनके गीतों के माध्यम से संघर्षरत लोगों को उनकी हार को जीत में बदलने की प्रेरणा दी जाए। 

 

 



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