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वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सिराज कुरैशी ने किया आगामी लोक सभा चुनाव का विश्लेषण

Published At: Saturday, 07 July, 2018 Last Modified: Saturday, 07 July, 2018

डॉ. सिराज कुरैशी

वरिष्ठ पत्रकार ।।

देश की सियासी पार्टियां लगी लोक सभा के चुनाव के चिन्तन और मंथन में

इस बार का लोक सभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सियासी रूपी परीक्षा का रिजल्ट पेश करेगा। इस रिजल्ट को बनाने के लिए देश की आवाम पूरी तरह लग गई है। कौन होगा पास और कौन फेल, इसको लेकर देश की समस्त राजनैतिक पार्टियां चिन्तन और मंथन में लग गई है।

हालांकि इस परीक्षा में नरेन्द्र मोदी और उनके हमदर्द तो मानकर चल रहें हैं कि इस परीक्षा में भी नरेन्द्र मोदी 2014 की तरह ही पास होंगे। परन्तु हो सकता है कि 2014 जैसा परिणाम न आए और गुड सेकेंड डिविजनही रह जाए, जबकि 2014 में मोदी गुड फर्स्ट डिविजन से पास हुए थे। लेकिन कुछ सियासतदां यह मानकर चल रहे हैं कि डिविजन कोई भी आए मोदी पास जरूर हो जाएंगे।

खैर, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि 2019 में होने वाली परीक्षा में कौन पास होगा और कौन फेल। हां, इस परीक्षा के रूप में नरेन्द्र मोदी को फेल करने के लिए समस्त सियासी पार्टियों के महान लोग एक रूम में बैठे दिखाई दे रहे हैं। यह लोग कभी एक समय में दूसरे को फेल करने में भी दिखाई देते थे और परीक्षक रूपी जनता के सामने एक दूसरे को भला-बुरा कहने से भी नहीं चूकते थे, लेकिन जब नरेन्द्र मोदी ने 2014 की सियासी परीक्षा में इंडिया टॉपकिया तो बाकी सियासी पिर्टयों के परीक्षार्थी एक दूसरे का मुंह ताकते ही रह गए लेकिन 2019 की परीक्षा आते-आते पुराना सिलेवस बदल गया, इसलिए इंडिया टॉपहोना असम्भव लग रहा है।

इसका मुख्य कारण यह दिखाई दे रहा है कि सपा रूपी कॉलेज के सियासी छात्रों के मुखिया और बसपा रूपी कॉलेज की सुप्रीमों एक दूसरे के गहरे मित्र बन गए हैं और आज 2019 में होने वाली सियासी परीक्षा में पूरी तरह मंथन करते हुए पास होने की रणीनति बनाने में लग गए है।

हां, कांग्रेसी कॉलेज के छात्रों में भी 2019 की सियासी परीक्षा के पास होने का जोश दिखाई दे रहा है, क्योंकि इस कांग्रेसी कॉलेज के मुखिया इस कॉलेज को पीड़ियों से तेजी के साथ चलाने का अनुभव पाए हुए हैं। इस कांग्रेसी कॉलेज के मुखिया और इस कॉलेज के ही सियासी छात्र ब्रिटिश हुकूमत की सियासी कॉलेज के छात्रों को मात देते हुए इंडिया से ही उनका सियासी कॉलेज हमेशा के लिए बन्द करने को मजबूर कर दिया था।

इस कॉलेज के अनुभावी सियासी टीचर तो रहे हैं अब मुखिया भी नए हैं, लेकिन यह मुखिया अनुभवी पीड़ी के फरजन्द है इसलिए अनुभवी भी होते जा रहे हैं। लोकसभा चुनाव से पूर्व उ.प्र. में जो दो केन्द्रों पर (कैराना और नूरपुर) जो सियासी परीक्षा हुई थी उसमें नरेन्द्र मोदी के हमदर्द सियासीदानों के फेल हो जाने से भी सपा कॉलेज के हेड और बसपा कॉलेज की सुप्रीमो की दोस्त पक्की तो हुई है तथा हौसलें भी बुलन्द हो गए है यही वजह है कि भाजपा कॉलेज के चीफ अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 2019 की परीक्षा पास करने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगाते दिखाई दे रहे हैं।

एक बुजुर्ग का यह कहना उचित लगा कि सपा और बसपा सियासी कॉलेज के दोनों हेड पहली बार ही गले नहीं मिले हैं। सन 1995 की उस चर्चित घटना के बाद पहली बार दोनों सपा-बसपा कॉलेज के सुप्रीमों ने एक दूसरे की ओर हाथ बढ़ाए थे, लेकिन कामयाबी नहीं मिली थी। लेकिन अब भाजपा कॉलेज के सियासी छात्रों को फेल करने के लिए जो हाथ मिलाएं हैं, वह अब मजबूत दिखाई दे रहे है। इसीलिए भाजपा कॉलेज के चीफ और स्टाफ की नींद उड़ चुकी है, लेकिन यह अपने को चुनौती भी मान रहे हैं और कह रहे हैं कि यह लोग हताश हो गए।

सपा-बसपा सियासी कॉलेज के हेड्स और समस्त स्टॉफ का यह भी मानना है कि कांग्रेसी सियासी कॉलेज की इमेज काफी गिर चुकी है। यह सियासी कॉलेज पिछड़े दलित और मुस्लिमों को रिझाते हुए अपने कॉलेज में लाने के लिए प्रयासरत हैं।

शायद यही वजह है कि सपा-बसपा कॉलेज के हेड्स कांग्रेसी सियासी कॉलेज के चीफ के हाथ मिलाने से हिचकिचा रहे हैं।

वैसे उ.प्र. में हुई हाल की घटनाओं से बसपा कॉलेज की सुप्रीमों स्वयं और सियासी छात्रों को एक नया जीवन दान मिला है और कॉलेज अपना खोया हुआ आधार पुनः पाने की उम्मीद लगाए हुए हैं। सपा-बसपा सियासी कॉलेज की दोस्ती गठबन्धन-धर्मके पालन के लिए भी तैयार है। मायावती यह भी जानती है कि रक्षात्मक मुद्रा उनकी मजबूरी है और वह अपने सियासी कॉलेज की शाख को जिन्दा रखने के लिए लड़ रही हैं, क्योंकि इस कॉलेज के दिग्गज स्टाफर नसीमुद्दीन सिद्दीकी, स्वामी प्रसाद मौर्या, ठाकुर जयवीर सिंह और इन्द्रजीत सरोज इस कॉलेज को छोड़कर दूसरे सियासी कालेजों के स्टाफर हो गए हैं। इसलिए इस कॉलेज की सुप्रीमो मायावती का चिन्तित होना स्वाभाविक भी है।

लेकिन यह सच्चाई भी किसी से नहीं छुपी है कि भाजपा सियासी कॉलेज के दोनों हैड्स (मोदी और शाह) अपनी कॉलेज की मार्केटिंग करने के विशेषज्ञ हैं और अपनी लुभावनी बातों से आवाम को निभाना जानते हैं। इसलिए इनके कॉलेज को मात देना असम्भव लगता है। हां छात्रों के पास होने का (2019 के चुनाव में वोटों और सीटों का) प्रतिशत जरूर कम हो सकता है, ऐसा आवाम का भी सोच है।

 

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