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ओंकारेश्वर पांडेय ने बताया- किम के ट्रेन कार्ड से ट्रंप को कैसे लगा झटका

Sunday, 15 April, 2018

कोरियाई युद्ध में इस बार चीन मध्यस्थ की भूमिका में है। क्या मोदी सरकार भी कोरियाई विवाद में कोई भूमिका निभाएगी? 1953 में कोरियाई विवाद में मध्यस्थता के कारण ही नेहरू बाद में विश्व नेता के तौर पर उभरे थे। राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित अपने लेख के जरिए ये कहना है राष्ट्रीय सहारा के ही वरिष्ठ समूह संपादक ओंकारेश्वर पांडेय का। उनका ये लेख आप यहां पढ़ सकते हैं-

किम के ट्रेन कार्ड से ट्रंप को झटका

छोटा मोटा दिखने वाले उत्तर कोरिया के युवा शासक किम जोंग-उन ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपने पहले कूटनीतिक दांव से चौंका दिया है। किम ट्रेन से गुपचुप चीन जाकर लौट भी आया और अमेरिकी खुफिया एजेंसी को खबर तक नहीं लगी। सीआईए की आंखों में धूल झोंककर किम जब ट्रेन से चीन पहुंचा तो इसकी पहली भनक जापानी मीडिया को लगी। दो दिनों तक अफवाहें उड़ती रहीं। और आखिरकार जब किम चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से हाथ मिलाकर लौट गया तो बीजिंग के आधिकारिक खुलासे से इस खबर की पुष्टि हुई।

पूरी दुनिया किम के इस दांव से हैरान है। अपने लंबी दूरी के न्यूक्लियर मिसाइलों व हाइड्रोजन बम तक के अंधाधुंध परीक्षणों के कारण अमेरिका, जापान और तमाम यूरोपीय देशों व संयुक्त राष्ट्र की कड़ी निंदा और प्रतिबंध झेल रहे उत्तर कोरियाई शासक किम ने पहले तो कहा कि वह दक्षिण कोरिया से बात करेगा। फिर उसने अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप को शिखर बातचीत का न्यौता देकर चौंकाया और फिर इन दोनों मुलाकातों से ऐन पहले चीन जाकर अमेरिका को जतला दिया कि वह अकेला नहीं है, और इराक और लीबिया भी नहीं है।

अमेरिकी राष्ट्रपति किम को छोटा मोटा रॉकेटमैन कहते हैं, तो जवाब में वह ट्रंप को पागल बूढ़ा और भौंकने वाला कुत्ता कहता है। दोनों के बीच ट्विटर पर घटिया वाक युद्ध देखकर रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन को कहना पड़ा था कि बच्चों की तरह लड़ना बंद करो।

25 से 28 मार्च तक की किम की चीन यात्रा बेहद अहम है। पिछले साल उत्तर कोरिया ने प्योंगयांग की आ रहे चीनी दूत को जब वापस भेजा था तो माना जा रहा था कि दोनों देशों के संबंधों में खटास है। पर वह सच नहीं था। आज भी चीन उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और उसका सबसे पुराना व विश्वस्त सहयोगी भी है। शी जिनपिंग ने कोरियाई नेता को कॉमरेड चेयरमैनकहकर पुकारा, तो किम ने यात्रा को नए युगकी शुरुआत बताया। इस यात्रा ने अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया के होश उड़ा दिये।

किम की सही उम्र किसी को नहीं मालूम। पर कहते हैं कि उसका जन्म 1984 में हुआ। सन 2011 से वह उत्तरी कोरिया का सर्वोच्च नेता है और 2012 से कोरिया की श्रमिक पार्टी का अध्यक्ष भी। सत्ता में आने से पहले किम को आम जनता में नहीं देखा गया था। किम का व्यक्तित्व रहस्यमय है। उसकी गतिविधियों की खबर किसी को नहीं होती।

सन 2011 में बड़े किम (किम जोंग-आईएल) की मृत्यु के बाद किम ने डीपीआरके (डेमोक्रेटिक पब्लिक रिपब्लिक ऑफ कोरिया) की सत्ता संभाली। 18 जुलाई 2012 को किम ने उत्तरी कोरिया की सशस्त्र सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर और मार्शल का पद संभाला। इसीलिए कोरिया में उन्हें मार्शल किम जॉंग-उन या मार्शल भी कहा जाता है।

किम को दगाबाजों से सख्त नफरत है। 12 दिसंबर 2013 को किम ने धोखा देने के कारण अपने चाचा जंग सोंग-थाक और 9 मार्च 2014 को उसने अपने एक भाई किम जोंग-नाम की हत्या करवा दी थी।

उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच मौजूदा तनाव के ऐतिहासिक कारण हैं। कोरियाई प्रायद्वीप सन 1894 से ही जापान के प्रभुत्व में था। सन 1910 में जापान ने उसपर आधिपत्य जमा लिया था। लेकिन सन 1939 से 1945 तक चले द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मुख्य विजेता अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ (रूस) ने कोरिया को जापान से छीन कर जर्मनी की तरह उसके दो टुकड़े कर दिये।

विभाजन के बाद रूस-चीन समर्थित उत्तरी हिस्सा कम्युनिस्ट देश बना और अमेरिका समर्थित दक्षिणी हिस्सा एक पूंजीवादी देश। इन देशों ने कोरियाई नेताओं से वादा किया कि पांच साल के बाद वे उनके देश को उनके हवाले कर देंगे। हालांकि जनता इसके खिलाफ थी। जल्दी ही कोरिया में विरोध प्रदर्शन होने लगे। तो दोनों गुटों ने दोनों कोरियाई देशों में अपनी समर्थक सरकारें बनवा दीं। ये हालात आज भी ज्यादा बदले नहीं हैं। दोनों कोरिया अपने-अपने आकाओं के शतरंजी मोहरे भर हैं।

सन 1945 में दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन हुआ और उसके पांच साल बाद ही 25 जून 1950 को यूएन की विधिवत अनुमति से कोरिया का पहला युद्ध शुरु हुआ। पेंटागन ने इसे 'ऑपरेशन स्ट्रैंगल' नाम दिया था। अमेरिकी बमवर्षक विमान तीन सालों तक उत्तर कोरिया पर नॉनस्टॉप हवाई हमले कर कुल 635,000 टन बम गिराये जिसमें 5000 स्कूल, 1000 अस्पताल और छह लाख घर नष्ट हो गये और करीब 35 लाख लोग मारे गये। उत्तर कोरिया के विशेषज्ञ पत्रकार ब्लेन हार्डेन ने अमेरिकी सैनिक कार्रवाई को 'युद्ध अपराध' करार दिया था। किम इसे भूला नहीं है।

कम लोगों को पता होगा कि दोनों देशों के बीच युद्ध खत्म कराने में भारत की अहम भूमिका थी। जब दक्षिण कोरिया हार की कगार पर था, तभी अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से सहयोगी देशों की सेना के साथ दक्षिण कोरिया की मदद का प्रस्ताव पारित करवा लिया। और इससे पहले कि पूरा दक्षिण कोरिया, किम इल सुंग के कब्जे में आता, वहां अमेरिका के नेतृत्व में दस लाख सैनिक पहुंच गए।

सितंबर 1950 तक अमेरिकी नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र की सेना ने दक्षिण कोरिया का एक बड़ा हिस्सा अपने कब्जे में ले लिया और उसकी सेना उत्तर कोरिया में चीन की सीमा के नजदीक बढ़ने लगी। तब चीन के शीर्ष नेता चाऊ एन लाई ने बीजिंग में भारतीय राजदूत के जरिए नेहरू को संदेश भेजा कि यदि अमेरिका ने उत्तर कोरिया पर कब्जा करने की कोशिश की तो वह शांत नहीं बैठेगा।

नेहरू ने चीन की चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन तक पहुंचा दी। हालांकि अमेरिका नहीं माना। उसके सैनिक जब और आगे बढ़े तो नवंबर में अचानक चीन ने अमेरिका के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

इस लड़ाई को जब एक साल से ज्यादा हो गये तो भारत ने ब्रिटेन के सहयोग से चीन को युद्ध विराम के लिए मनाया। लेकिन अमेरिका के कब्जे में विरोधी पक्ष के तकरीबन 1,70,000 सैनिक बंदी थे। चीन इनकी रिहाई चाहता था। इसपर अमेरिका ने भारत को मध्यस्थता के लिए बुलाया और काफी प्रयासों के बाद 27 जुलाई 1953 को नेहरू ने चीन से युद्ध-विराम समझौता करा दिया।

युद्ध बंदियों की अदला-बदली के लिए यूएन ने भारत की अध्यक्षता में पांच देशों के एक आयोग का गठन भी किया था, जिसके अध्यक्ष भारतीय सेना के प्रमुख जनरल केएस थिमैया थे। तब भारत ने 6000 सैनिकों की अपनी इंडियन कस्टोडियल फोर्स भी कोरिया में तैनात की थी।

कोरियाई युद्ध में शांति की कोशिशों की वजह से दुनिया में भारत की अच्छी साख बनी। और इसी वजह से नेहरू बाद में विश्व नेता के तौर पर उभरे थे।

आज भी कई हज़ार अमेरिकी सैनिक दक्षिण कोरिया में तैनात हैं, ताकि उत्तर कोरिया अचानक फिर हमला न कर बैठे। अमेरिका वहां एंटी मिसाइल सिस्टम थाड तैनात करना चाहता है, जिसे उत्तर कोरिया और चीन अपने लिए खतरा मानते हैं, क्योंकि उससे इन दोनों देशों की खुफिया निगरानी का खतरा है।

अमेरिका, यूरोपीय संघ और यूएन के भारी प्रतिबंधों से जूझते उत्तर कोरिया के 12 लाख सैनिक अमेरिका के आगे झुकने को तैयार नहीं, क्योंकि उन्हें अमेरिका पर भरोसा नहीं। किम कहता है कि जब अमेरिका परमाणु बम रख सकता है, तो हम क्यों नहीं।

बर्लिन की दीवारें गिर गयीं, जर्मनी एक हो गया, लेकिन क्या कोरिया भी कभी एक हो पाएगा? इसी महीने 27 अप्रैल को दोनों कोरियाई देश आपस में बातचीत करने वाले हैं। और उसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ किम की बैठक होनी है। हालांकि कोई तिथि और स्थान अभी तय नहीं है। जाहिर है कि चीन की ताकत लेकर ट्रंप से मिलने जब युवा किम जायेगा, तो उसकी ठसक कुछ और होगी। चीन ने इस पूरे मामले में बढ़त ली है। वह मध्यस्थ की भूमिका में आ गया है। क्या मोदी सरकार इस बार भी कोरिया में शांति के लिए कोई भूमिका निभाएगी?

 

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