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जरूरत हमारे आगे बढ़ने की है क्योंकि हमने बहुत कुछ खोया है और लगातार खो रहे हैं...

Published At: Saturday, 01 December, 2018 Last Modified: Tuesday, 04 December, 2018

अजय शुक्ल

प्रधान संपादक, आईटीवी नेटवर्क ।।

करतारपुर कॉरिडोर: सुखद उम्मीदों का रास्ता

हिन्दुस्तान के छोटे भाई पाकिस्तान ने पहली बार बड़ा दिल दिखाया है। सिख पंथ के लिए करतारपुर का पवित्र दरबार साहिब गुरुद्वारा मक्का-मदीना जैसा है। भारत पाकिस्तान की सीमा डेरा बाबा नानक (जिला गुरदासपुर) से फकत तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थिति इस गुरुद्वारे को सिख पंथ के लोग दूरबीन से देखकर शीश नवाते और अरदास करते। सिख पंथ के लोगों की यही अरदास होती कि कभी उनको गुरुनानक देव जी के बनाये इस गुरुघर और उनकी समाधि के दर्शन मिलें। करोड़ों सिख यही तमन्ना दिल में लेकर दुनिया से रुख़सत हो गए और उन्हें नानक बाबा के इस दरबार साहिब के दर्शन नहीं हो सके। देश की आजादी के बाद से अब तक कई बार यह कोशिश की गई कि करतारपुर के दरबार साहिब तक श्रद्धालुओं को बेरोक टोक जाने का मौका मिले मगर पाकिस्तान से तल्ख रिश्तों के कारण यह संभव नहीं हो सका। पाकिस्तान की सियासत ने करवट ली और आवाम ने क्रिकेटर इमरान खान को सत्ता की चाबी सौंप दी। इमरान ने भी अपने क्रिकेटर दोस्त और पंजाब के मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू को बुलावा भेजा। भारी विरोध के बाद भी सिद्धू ने दोस्ती निभाई और करतारपुर दरबार साहिब के बेरोकटोक दर्शन का रास्ता देने की मांग रखी।

पाकिस्तान से जब सिद्धू से लौटे, तो मानों आफत टूट पड़ी। विरोधी दलों के नेताओं से लेकर उनकी अपनी कांग्रेस के तमाम प्रतिद्वंदियों तक ने सिद्धू की विश्वसनीयता पर सैकड़ों सवाल खड़े कर दिए। पिछले 70 सालों के दौरान कई बार धर्म के नाम पर सत्ता सुख भोगने वालों ने भी सवाल उठाए, जिन्होंने खुद कुछ नहीं किया था। उन्हें लगा कि कहीं सिद्धू अपनी दोस्ती का वास्ता देकर करतारपुर के दरबार साहिब का रास्ता न खुलवा दें, तो वो भी लेटर-लेटर खेलकर उछलने लगे। केंद्र की भाजपा सरकार से लेकर पंजाब की पिछली सरकार के कारिंदे भी फुदकने लगे, जैसे वही सब कुछ कर रहे हों। सच तो यह है कि करना पाकिस्तान को है, वो भी तीन किलोमीटर का गलियारा बनाकर, जिससे डेरा बाबा नानक सीमा से सिख संगत दर्शन को दौड़ लगाते पहुंच सकें। सिख पंथ के लिए यह एक अशीम उपहार है जिसके लिए उनकी आंखें अरसे से तरस रही थीं। पाकिस्तान के निजाम इमरान ने दोस्ती का पैगाम भेजा तो केंद्र और पंजाब के सियासतदां क्रेडिट के लिए लड़ मरे। सीएम अमरिंदर सिंह के साथ धुर विरोधी अकाली भी मंच पर जम गए। सिद्धू को एक बार फिर से अपने दोस्त का पाकिस्तान से पैगाम आया और कीरतपुर दरबार साहिब तक के लिए कॉरिडोर बनना तय हो गया।

सिख पंथ को सिद्धू की इस बड़ी सौगात ने पंथ की सियासत करने वालों को किनारे लगा दिया है। परेशान हाल लोगों ने फिर वही किया जो सिद्धू की पिछली यात्रा के दौरान हुआ था। पाक सेना प्रमुख से औपचारिक झप्पी पर सवाल खड़े किये गए थे, तो इस बार उग्र सिख पंथक के साथ एक फोटो पर बवाल किया जा रहा है। सब यह भूल रहे हैं कि 70 सालों में दोनों देश में न जाने कितने हुक्मरां आये मगर कुछ सार्थक नहीं हो सका। पहली बार छोटे ने बड़ा दिल दिखाया है। यह सिर्फ सिद्धू की दोस्ती का रंग है, जो दोनों देशों के बीच रिश्तों की एक नई इबारत लिखने का मौका दे रही है। एक अच्छे मौके को अगर हम खो देंगे, तो फिर पता नहीं आगे क्या होगा? दोनों पड़ोसियों या यूं कहें भाइयों की दुश्मनी से दोनों को ही कुछ हासिल नहीं हुआ बल्कि खोया बहुत कुछ। इस मौके पर इमरान खान ने स्पष्ट कर दिया कि वह हिन्दुस्तान से दोस्ताना कायम करने के लिए किसी भी मुद्दे पर बात करने को तैयार हैं। पाकिस्तान ने पहली बार इतनी सकारात्मक बात की है।

इमरान खान ने वजीर-ए-आजम बनने के बाद से ही हिन्दुस्तान से रिश्ते सुधारने की पहल की है। जो पाकिस्तान कुछ मुद्दों को छोड़कर ही बात करने को कहता था, उसने सभी मुद्दों पर बात करने का संदेश देकर बड़ा दिल दिखाया है। यह एक बेहतरीन मौका भी है और कूटनीति भी। वजह साफ है एशिया और यूरोप से लगते राज्यों में चीन एक बड़ी महाशक्ति बन चुका है। चीन ने अपना गलियारा भारत की सीमा से पाकिस्तान तक बना लिया है और दूसरी तरफ समुद्री इलाके में भी उसका दबदबा बन चुका है। भारत-पाक के बीच की तल्खी ने पाकिस्तान को आर्थिक रूप से तोड़ दिया है जबकि हिन्दुस्तान के बजट का एक बड़ा हिस्सा यह डर खा जाता है कि पाकिस्तान कभी भी हमला कर सकता है। दोनों देशों के हजारों जवान इस छद्म युद्ध में मर रहे हैं और उनके परिवार अनाथ। आर्थिक और राजनीतिक आस्थिरता बढ़ती ही जा रही है। उधर, किसी देश को अपना ‘आर्थिक उपनिवेश’ बनाना चीन का शगल है। दक्षिण चीन सागर को चीन अपने अधीन बना चुका है, ठीक इसी तरह वह हिंद महासागर को बनाना चाहता है। चीन दुनिया का सबसे ताकतवर देश बनने के लिए वह हिंद महासागर में भी दखल बढ़ा रहा है। वह एशियाई और पूर्वी अफ्रीकी देशों में भारी निवेश कर रहा है। यह उसकी चाल है कि पहले ढांचेगत निवेश का लालच पैदा करता है और फिर प्रोजेक्ट्स पर बढ़ते कर्ज को ‘री-एडजस्टमेंट’ करने के नाम पर उस देश को अपना आर्थिक ‘उपनिवेश’ बना लेता है।

पाकिस्तान के नये निजाम को चुनौतीपूर्ण हालात में देश मिला है। पाकिस्तान न केवल कर्ज में डूबा हुआ है बल्कि चारो तरफ से घिर गया है। उधर, आवाम की उम्मीदें बड़ी हैं। उनको पूरा करने के लिए भारत से छद्म युद्ध के बजाय विकास के रास्ते चलना मजबूरी है। सिद्धू को दोस्ती का करतारपुर कॉरिडोर उपहार में देने के बाद इमरान ने भारत से सभी मुद्दों पर बात के लिए सहमति जता दी है। अब जरूरत हमारे आगे बढ़ने की है क्योंकि हमने बहुत कुछ खोया है और लगातार खो रहे हैं।  सुरक्षा-खुफिया एजेंसियां और सियासतदां दोनों देशों में अमन नहीं चाहते हैं क्योंकि अगर अमन हो गया तो उनके अनाब शनाब बेहिसाब खर्च पर लगाम जो लग जाएगी। देश का हित चाहने वालों के लिए यह सबसे मुफीद मौका है कि दोनों देशों के संबंध सुधारें और बड़े दिल से हम विकास के पथ पर दौड़ लगायें। अभी अगर यह नहीं हुआ तो भविष्य में संभावनायें नगण्य हो जाएंगी क्योंकि सुखद उम्मीद के रास्तों को करतारपुर कॉरिडोर ने खोल दिया है।

 

 



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