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ये है प्रेस क्लब के 'पत्रकारों' की असलियत, शेयर कर कीजिए इनका 'पर्दाफाश'

Published At: Saturday, 26 January, 2019 Last Modified: Saturday, 26 January, 2019

एम.एच.जकरीया।।

आए दिन पत्रकार सुरक्षा के नाम पर बड़ी-बड़ी खबरें आ रही हैं, वहीँ सरकार से पत्रकार सुरक्षा की मांग हो रही है। छत्तीसगढ़ राज्य के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पत्रकार सुरक्षा के मामले में गंभीरता से विचार भी कर रहे हैं। यह बहुत ही अच्छी बात है कि मुख्यमंत्री पत्रकार की सुरक्षा को लेकर गंभीर हैं। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए क़ानून बनना भी चाहिए, लेकिन यहां पर यह सोचने वाली बात यह है कि आखिर पत्रकार कौन हैं?

पत्रकार वो हैं जो वास्तविकता में पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी जान जोख़िम में डालकर पत्रकारिता कर रहे हैं या वे जो प्रेस क्लब की सदस्यता लेकर वहां बैठकर कैरम खेल रहे हैं। यहां तो कई ऐसे लोग हैं जो बीते समय में किसी अख़बार या मीडिया ग्रुप से जुड़े थे और उसी के माध्यम से प्रेस क्लब की सदस्यता ली थी आज भले ही वे लोग उन मीडिया ग्रुपों से अलग हो चुके हैं, लेकिन फिर भी अपने नाम के आगे ‘पत्रकार’ शब्द लगा रहे हैं और वही आज पत्रकार संगठनों के नाम पर वसूली करते नजर आ जाएंगे। यहां पर यह सवाल है कि क्या उन पत्रकारों को सुरक्षा का लाभ मिलना चाहिए?

लेकिन ऐसा लगता है छत्तीसगढ़ राज्य की विडम्बना यही है और विशेष रूप से राजधानी रायपुर की कि जो सही मायनों में सुदूर ग्रामीण और नक्सल प्रभावित क्षेत्र में पत्रकारिता का कार्य कर रहें हैं। जो वास्तविकता में छोटे या बड़े मीडिया समूह से जुड़कर ईमानदारी जान जोखिम में डालकर खबरे पहुंचा रहे हैं। जिन्हें हमेशा से नक्सलियों, रसूखदार नेताओं और पुलिस से खबर छापने पर प्रताड़ित किया जाता रहा है और निडरता से सच्ची खबर लिखने के बाद भी जेल जाना पड़ा है। वास्तविकता में सुरक्षा ऐसे पत्रकारों को मिलनी चाहिए न कि क्लब कल्चर में रमे पत्रकारों को!   

छोटी मीडिया ग्रुपों से जुड़े ये पत्रकार शहर के क्लब कल्चर से दूर हैं जो इन चौथ वसूली करने वाले बड़े-बड़े मंत्रियों के आगे पीछे घूमने वाले फर्जी पत्रकारों को मिलने वाली सुविधाओं से बहुत दूर हैं। यहां तो प्रेस क्लब का सदस्य बिना पत्रकारिता किए वो सब सुविधाएं पा रहा है जिसका वास्तविक अधिकार सही मायनो में पत्रकारिता करने वाला पत्रकार रखता है

पत्रकारों को मिलने वाली सुविधाएं वास्तविक पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करने वाले उस पत्रकार को नहीं मिलतीं, क्योंकि यहां का दस्तूर ही उल्टा है। जिन्होंने कभी किसी समय किसी समूह या मीडिया में काम करके उन क्लबों और संगठनों की सदस्यता ली होगी, वह आज भी अपनी सदस्यता के दम पर फोकट में वह सब सुविधाएं ले रहे हैं जिनकी पात्रता वह अब नहीं रखते। यहां मज़े की बात तो ये है कि कई पत्रकार, जनसंपर्क विभाग के अधिमान्यता भी प्राप्त किये हुए हैं जो हर साल नवीनीकरण में काम छोड़े समूह से अधिमान्यता नवीनीकरण करवा लेते हैं!  उससे भी दुःखद बात यह है कि जो पिछली सरकार में पत्रकार अधिमान्यता समिति में काबिज थे, वही अब भी वर्तमान सरकार में अधिमान्यता समिति में हैं! वही आलम विधानसभा पत्रकार समिति का है, जहां वर्षों से मठाधीश जमे हुए हैं ऐसे में जो जोख़िम भरे पत्रकारिता करने वाले पत्रकार हैं वे पत्रकार सुरक्षा से भी वंचित हो रहे हैं ।

पत्रकार सुरक्षा उन भोले भाले ग्रामीण पत्रकार सुदूर नक्सल प्रभावित क्षेत्र में पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों को मिलनी चाहिए। यहां प्रेस क्लब और मीडिया संगठन के नाम पर पिछली सरकार और मंत्रियों से बड़े-बड़े फंड वसूल किये जाते रहे हैं  और जो सही में पत्रकार हैं, उन्हें इन क्लबो और समूहों की सदस्यता से भी वंचित रखा जाता रहा है, जहाँ चुनाव कराने के नाम पर अवैध वसूली होती है। RTI  से निकली जानकारी बता रही है कि इन क्लबो का पंजीयन ही अवैध है, क्योंकि इन समूहों ने विधायकों मंत्रियों और सांसदों से मिलने वाले अनुदान राशि का कोई हिसाब ही नहीं दिया है यानी जनता की गाढ़ी कमाई के टैक्स के पैसों को इन जनप्रतिनिधियों ने इन प्रेस क्लबों को खुश करने के लिए बाँटे, उसका कोई हिसाब किताब ही नहीं, फ़िर भी ये क्लब चल रहे हैं। इसकी कई शिकायत होने के बाद भी कार्यवाही नहीं हो रही हैं और अब पत्रकार सुरक्षा माँग रहे हैं।



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