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‘इस वजह से इंटरनेट ने अखबारों से छीन लिए बहुत सारे विज्ञापन’

Published At: Wednesday, 19 September, 2018 Last Modified: Wednesday, 19 September, 2018

कुंवर सी.पी. सिंह

टीवी पत्रकार ।।

पत्रकारिता की प्रासंगिकता

पहले अखबार फिर टीवी और अब इंटरनेट, कोई भी व्यक्ति हो उसे दूसरों के बारे में जानने की खासी दिलचस्पी रहती है। इसके लिए माध्यम सदैव ही उपलब्ध रहें है।  पुराणों की बात की जाए तो नारद मुनि सबसे प्राचीन पत्रकार माने जाते हैं। बाद के समय में हरकारे और चारणकर्ताओं ने इस प्रवृत्ति को आगे बढ़ाया। मुद्रण के साधनों के विकास के बाद अस्तित्व में आए अखबार और फिर विज्ञान तकनीक के जमाने में अपनी धाक जमा चुका टेलिविजन। अब खबरों को जानने का टेस्ट बदल गया है। पहले सिर्फ खबरें जान लेना महत्वपूर्ण होता था। बाद में खबरों का बहुआयामी पक्ष जानने की लालसा बढ़ी और आज की तारीख में खबरों का पोस्टमार्टम शुरू हो गया। निश्चित रुप से इस प्रवृत्ति ने कहीं ना कहीं लीक से हटकर कुछ नया करने को बाध्य किया है।

वेब मीडिया में उसका एक ताजातरीन उदाहरण है वेब पत्रकारिता। एक उंगली की क्लिक और पूरी दुनिया आपके सामने, वह भी आपकी निहायत ही क्षेत्रीय भाषा में। एक जिज्ञासु मन को और क्या चाहिए। उसमें भी अगर टीवी और अखबार का मजा बिना रिमोट का बटन दबाए मिल जाए या फिर अखबारों के पन्ने पलटकर शेष अगले पृष्ठ पर देखने से मुक्ति मिल जाए तो उपभोगवादी समाज के लिए इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। शायद आरामतलबी के आदी हो चुके अभिजात्य वर्ग के लिए यह एक वरदान है। जो कि टॉयलेट में बमुश्किल अखबार पढ़ने का समय निकाल पाता है।

वेब पत्रकारिता आज मीडिया का सबसे तेजी से विकसित होने वाला पक्ष बन गया है। इसके अपने कारण है, अपनी विशेषताएं हैं। इसकी सबसे बड़ी खासियत है पाठक और दर्शक के साथ परस्पर संबंध। अन्य समाचार माध्यम चाहे वो मुद्रित हो या इलेक्ट्रॉनिक, उसकी तरह इसका पाठकों से रिश्ता एक तरफा नहीं होता हैं। यह बिल्कुल ऐसा ही है जैसे दो व्यक्ति आमने-सामने बैठकर परस्पर बातचीत कर रहे हों। परंपरागत माध्यमों में किसी समाचार विशेष पर पाठक अपनी प्रतिक्रिया संपादक के नाम पत्र से व्यक्त करता था, लेकिन इंटरनेट पत्रकारिता में पाठक या श्रोता। तत्काल समाचार विशेष पर राय जाहिर कर सकता है और संबंधित पक्ष भी इस राय पर तुरंत अपनी सफाई पेशकर सकता है इसमें संचारक और पाठक के बीच किसी प्रकार की कोई रोक-टोक या अंकुश नहीं है। इंटरनेट पत्रकारिता का आर्थिक पक्ष भी खासा मजबूत है।

परंपरागत समाचार माध्यमों का पाठक, श्रोतावर्ग बेहद व्यापक होता है, जिस कारण विज्ञापन दाता ठीक-ठीक अपने लक्षित उपभोक्ता तक नहीं पहुंच पाते, लेकिन वेब पत्रकारिता में स्थिति बिल्कुल उल्टी है। वेबसाइटों का श्रोतावर्ग जाना-पहचाना होता है जिससे विज्ञापनदाता आसानी से लक्षित उपभोक्ता तक पहुंच सकता है। लक्षित उपभोक्ता तक व्यापारिक सूचना त्वरित रुप से पहुंचने के कारण अधिकतर विज्ञापनदाता इंटरनेट को प्राथमिकता देने लगे है। इस कारण इंटरनेट ने अखबारों से बहुत सारे विज्ञापन छीन लिए हैं। मुद्रित अखबारों और ऑनलाइन पत्रों के ही विज्ञापन तेजी से वेब पत्रकारिता के जेब में जा रहे हैं या फिर यह भी कह सकते है कि जा चुके हैं।

अब अगर हार्ड न्यूज में टीवी की पत्रकारिता के लिए कोई चुनौती बन रहा है तो वह है वेब पत्रकारिता, जो व्यवहार में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों पत्रकारिता को समेटे हुए है और जिसकी गति के आगे बाकी सारी तकनीकें कहीं नहीं ठहरती और इसके विकास की रफ्तार बताती है कि जल्द ही यह बाकी माध्यमों को पीछे छोड़ देगी। अब इतना जरूर है कि जहां कम्प्यूटर या इंटरनेट की सुविधा न हो, बिजली या वैसी ऊर्जा की व्यवस्था न हो, मॉडम न हो वहां यह प्रणाली नहीं जा सकती। पर जहां ये सुविधाएं है वहां वेब पत्रकारिता के लिए अलग से बहुत कुछ झमेले की जरुरत नहीं होगी। बल्कि एक बार ये सुबिधाएं मिल जाने या जुट जाने के बाद काम इतना सस्ता, सुविधाजनक और तेज है कि बाकी माध्यमों पर जाने की इच्छा नहीं रहती और अभी चाहे मात्र प्रसार पाने की हो या इस नए धंधे में उतरने की संभावनाएं जांचना।

आज शायद ही कोई अखबार, पत्रिका, रेडियो या टीवी चैनल होगा जो बेब पर उपलब्ध नहीं हो और वह भी लगभग मुफ्त। टीवी पर विचार पक्ष की कमजोरी और प्रिंट में दृश्य-श्रव्य की अनुपस्थिति जैसी कमियां भी इस माध्यम में नहीं है, क्योंकि यह पढ़ने की सामग्री भी दे सकता है और चलती तस्वीरों और आवाज भी इसमें पाठक या दर्शक की भागीदारी किसी भी अन्य माध्यम की तुलना में ज्यादा होती है और यह काम होता है विश्वव्यापी नेटवर्क पर एक मानक भाषा के माध्यम से जो इलेक्ट्रॉनिक संकेतों की हैं। विश्वप्रसारित वेब कंप्यूटरों का एक ऐसा नेटवर्क है जो आप्टिकल फाइबर और सिलिकॉन चिप्स के दो बुनियादी माध्यमों से जुड़ा है और एक मानक भाषा से संबंध रखते हैं। हिंदी अंग्रेजी, उर्दू, फारसी तसवीर और आवाज के साथ कुछ पहले इसी एक भाषा में बदलता है। अर्थात इलेक्ट्रॉनिक संकेतों का रूप लेता है और फिर बटन दबाते हजारों मील दूर पहुंच जाता है। यह जाल दुनिया भर में फैल चुका है और इस तंत्र पर विभिन्न नाम से जगह ली जाती है। उस पर प्रोग्राम तैयार करके डाल दिया जाता है अपने कंप्यूटर और इंटरनेट से जो चाहे उस नाम के उस साइट पर पहुंच जाता है और पढ़ने देखने सुनने की जो चीजें हो उनका उपयोग कर सकता है जैसे ही कोई इस साइट पर आता है इस नेटवर्क से जुड़े उपकरण उसकी उपस्थिति दर्ज करते है जो हिट्स कहा जाता है। जिस साइट पर जितने ज्यादा हिट्स आएं वह उतना ही लोकप्रिय माना जाता है। फिर अखबारों की प्रसार संख्या और टीवी की दर्शक संख्या की तरह ही यहां भी इसी हिट्स वाले हिसाब से विज्ञापन पाने देने का हिसाब चलता है।

सचमुच वेब पत्रकारिता समाचार माध्यमों के लिए जबरदस्त चुनौती के रूप में आज उभरा है। खास कर मुद्रित माध्यमों के लिए। हो सकता है कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम, मुद्रित माध्यमों को बहुत अधिक नुकसान न पहुंचा पाए। लेकिन यह माध्यम कई मायनों में मुद्रित और इलेक्ट्रॉनिक दोनों माध्यमों के लिए चुनौती साबित हो रहा है। जिस तरह से वेब पत्रकारिता में राष्ट्रीय व बहुराष्ट्रीय कंपनियां निवेश कर रही है और वेब पत्रकारिता जिस तरह अपने शुरुआती दौर में ही अपनी खबरों व साक्षात्कारों आदि को अनन्य और विशिष्ट रुप देना प्रारम्भ कर दिया है वह परंपरागत माध्यमों के लिए खतरे की घंटी है। इसका उदाहरण तहलका डॉट कॉम की मैच फिक्सिंग और रक्षा सौदों में घूसखोरी की कवरेज को कहा जा सकता है। अभी तक अनन्य समाचारों के लिए इलेक्ट्रॉनिक माध्यम भी अखबारों आदि पर निर्भर थे। लेकिन अब विशिष्ट खबरों के लिए आम पाठक वर्ग तथा परंपरागत माध्यम वेब पत्रकारिता के मोहताज हो जाएंगे अधिकतर मीडिया विशेषज्ञ मानने लगे है कि इंटरनेट इक्कीसवीं सदी का प्रमुख मीडिया बनने जा रहा है। लेकिन कुछ मीडिया कर्मी इसे सही नहीं मानते। इनका कहना है कि वेबपत्रकारिता की ओर लोगों का झुकाव ठीक वैसा ही है जैसा कुछ समय पहले प्रिंट से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरफ लोगों का झुकाव हुआ था। यह सच है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रिंट मीडिया का स्थान लेने में असफल रहा लेकिन बेब पत्रकारिता इन दोनों के लिए खतरा बन सकती है। क्योंकि इसका स्वरुप इन दोनों से सर्वथा भिन्न है।

वस्तुत तकनीक का अविष्कार ही मेहनत से बचने की लालसा है। बैलगाड़ी से मोटरगाड़ी क्यों आयी? इसका साफ सुथरा जवाब है आराम के लिए। अगर बिलगेट्स के दो हजार रुपए गिर जाएं तो वह नहीं उठाएंगे क्योंकि उसे उठाने के समय में वो पचीस हजार रुपए कमा लेंगे। ऐसे में दो हजार का नोट उठाने के लिए तेईस हजार की कुर्बानी भला कौन बिजनेसमैन देना चाहेगा? ऐसे हाल में माध्यम भले ही कई आ जाए लेकिन एक बात साफ है कि जो भी माध्यम अभिजात्य वर्ग को सहूलियत देगा वही हिट रहेगा। यहां मैं केवल वेब पत्रकारिता की ही बात नहीं कर रहा हूं। बढ़ते तकनीक के युग में हो सकता है कि आगे आने वाले समय में सीधे सैटेलाइट पत्रकारिता का भी विकास हो जाए। ऐसे में यह भी बाकी माध्यमों के लिए चुनौती बन सकता है, क्योंकि आरामतलबी बढ़ेगी। नवधनाढ्य वर्ग का ऐसे ही विकास होगा। बस सवाल इतना हमेशा प्रासंगिक रहेगा कि इन तमाम कवायदों के बाद जमीनी पत्रकारिता जो कि वास्तव में सबसे ज्यादा जरूरी है वह कहां ठहरेगी क्योंकि तकनीक के बढ़ने से सिर्फ पूंजीवादी संस्कृति पोषित होगी और लोग उसे ही जानना पसंद करेंगे। गांव के किसान की बुनियादी जरूरतें फिर हाशिए पर होगीं। रोटी का सवाल फिर सिफर होगा  और पत्रकारिता के प्रतिमान आम आदमी से दूरी बनाते जाएंगे। आखिरकार तकनीक की जरूरते भी पूंजीवादी होती है और पूंजीवाद पूंजी से पलता है, आंसू और संवेदनाओं से नहीं।

 



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