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वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता का आंकलन- क्यों देश में अब भी इंदिरा गांधी का शासन है?

Published At: Wednesday, 22 November, 2017 Last Modified: Tuesday, 21 November, 2017

शेखर गुप्ता

एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट

क्यों देश में अब भी इंदिरा गांधी का शासन है?

मुझे पत्रकार का पेशा इसलिए भी पसंद है, क्योंकि मुझे किस्से सुनाना अच्छा लगता है। खेद है कि मेरे पास इंदिरा गांधी की सौवीं जयंती पर कहने के लिए ज्यादा किस्से नहीं हैं। उनकी मौत के वक्त मैं 27 साल का था। दो अवसरों पर मैं उनके निकट रहा। 1979 की गर्मियों में वे सत्ता से बाहर थीं और इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट से श्रीनगर जा रही थीं। चंडीगढ़ में कुछ मिनटों के स्टॉप के दौरान मैं उनसे कुछ सवाल पूछने में कामयाब रहा। उनसे चर्चा में ज्ञानी जेल सिंह और वीएन तिवारी (पूर्व मंत्री मनीष तिवारी के पिताजी) के गौर से सुनने का ब्लैक-एंड-व्हाईट फोटो यादों में बस गया।

फिर फरवरी 1983 तक इंतजार करना पड़ा। असम चुनाव के दौरान गुवाहाटी से 120 किमी दूर नेल्ली में 18 फरवरी को 3 हजार से ज्यादा मुस्लिम मार डाले गए। अगले दिन वे वहां पहुंचीं। हेलिकॉप्टर के पंखों के कारण हवा में धूल उड़ रही थी। उन्होंने पल्लू से नाक ढंक ली पर इससे उनका गुस्सा नहीं छिपा।

उन्होंने राष्ट्रपति शासन के तहत राज्य के मुख्य प्रशासक (राज्यपाल के मुख्य सलाहकार) आरवी सुब्रह्मण्यम को फटकारा, ‘तीन हजार मुसलमान मारे गए, इसका कौन जवाब देगा, आप?फिर आईजी (कानून-व्यवस्था) केपीएस से कहा, ‘आप सब सो रहे थे क्या?’ दोनों स्कूली बच्चों की तरह चुपचाप खड़े रहे। फिर पल्लू से अपना चेहरा पोंछते हुए कहा, ‘उफ, कितना धूला पड़ता है!मुझे सत्यजीत रे का इंटरव्यू याद आया, जिसमें उन्होंने इंदिरा गांधी पर बनाई डाक्यूमेंट्री की चर्चा की थी। इसमें उनकी रोज की ज़िंदगी को दर्ज किया जा रहा था जैसे लिविंग रूम में कोई कुर्सी ठीक से रखती या किसी तस्वीर को बदलती इंदिरा। इसी दौरान उन्होंने अपने पिता का धूल भरा पोर्ट्रेट उठाया और पोंछने के लिए कोई कपड़ा ढूंढ़ने लगीं। रे ने कहा कि आप साड़ी के पल्लू से क्यों नहीं पोंछ देतीं, यह अच्छा शॉट होगा। उन्होंने इनकार कर दिया। रे ने पूछा, क्यों नहीं मिसेस गांधी? क्या पिता के लिए आपके मन में भावनाएं नहीं हैं। उन्होंने कहा, ‘हैं, लेकिन धूल के लिए मेरे मन में कोई भावनाएं नहीं हैं।

वह सुबह इंदिरा गांधी ने जो फैसला लिया वह उनके सबसे कठिन फैसलों में था। असम में चार साल से विदेशियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर शांतिपूर्ण जनआंदोलन चल रहा था। कच्चे तेल की आपूर्ति भी रोक दी गई थीं। सरकार का कोई नियंत्रण नहीं था। फिर भी उन्होंने चुनाव का फैसला लिया। मेरा अनुमान है कि एक पखवाड़े में ही 7 हजार लोग मारे गए, ज्यादातर मुस्लिम। इस बात के लिए इतिहास उनका कैसा आकलन करेगा? राज्य की शक्ति का यह बहुत निर्मम और हिंसक इस्तेमाल था।

एक मंत्री 266 वोट पाकर जीते थे और उन्हें 100 फीसदी मत मिले थे। इंदिरा का यह कठोर पहलू उनके शुरुआती दौर में ही दिख गया था, जब उन्हें गूंगी गुड़िया (लोहिया का दिया संबोधन) कहा जाता था। लाल बहादुर शास्त्री की अचानक मौत के कारण वे वैसे ही प्रधानमंत्री बनीं, जैसा बाद में उनका पुत्र बना। तब भारत विनाशक युद्धों (1962-65) से उबर रहा था। पद पर कुछ ही हफ्ते हुए थे कि मिजो विद्रोहियों ने आइजोल पर कब्जा कर लिया और सरकारी खजाना व असम राइफल्स को लूटने वाले थे। उन्होंने आइजोल पर हमले के लिए वायुसेना का इस्तेमाल किया, जो उसके पहले और बाद कोई नहीं कर सका पर इससे अनर्थ टल गया।

आइजोल पर बमबारी से बांग्लादेश में निर्णायक युद्ध, असम में 1983 के चुनाव और सालभर बाद ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार तक सत्ता का निर्मम इस्तेमाल। इन कदमों ने जख्म भी छोड़े लेकिन, भारत के लिए बड़ा खतरा हमेशा के लिए हट गया। पाकिस्तान कभी भी दो मोर्चों पर खतरा नहीं बन सकता। मिजोरम अाज पूर्वोत्तर का सबसे शांत प्रांत है। असम में 1983 में तेल आपूर्ति व चुनाव में बाधा डालने वालों ने उनके बेटे के साथ समझौता किया, चुनाव लड़ा, दो बार सत्ता में आए, हारे। आज उनका शेष हिस्सा भाजपा गठबंधन का मामूली हिस्सा है। इसी तरह चाहे ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के लिए उनकी हत्या कर दी गई पर पंजाब पिछले 25 वर्षों से शांत है। उनमें सर्जन जैसी नफासत नहीं थी बल्कि लकड़हारे जैसा मानस था। इसने जख्म छोड़े और नया विपक्ष तथा आज का गैर-कांग्रेसी नेतृत्व भी तैयार हुआ। चुनौतीपूर्ण वर्षों में उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा पर शानदार काम किया लेकिन, दो नाकामियां हैं। सांप्रदायिक शांति बनाए रखने में उनका रिकॉर्ड शर्मनाक है, जबकि वे वाकई धर्मनिरपेक्ष थीं।

दूसरी और सबसे बड़ी विफलता थी देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को पहुंचाया गया नुकसान। इंदिरा गांधी कोई रूमानी उदारवादी नहीं थीं बल्कि वे ठंडे दिमाग से काम करने वाली योद्धा थीं। उन्होंने समाजवाद का इस्तेमाल पार्टी को बांटने और बैंकों, कोयला, पेट्रोलियम, बीमा आदि का राष्ट्रीयकरण करने में किया। कुछ भी बख्शा नहीं गया। पक्के कम्युनिस्ट की शैली में उन्होंने 1973 में अनाज के व्यापार का भी राष्ट्रीयकरण करना चाहा।

उन्होंने पूरी तरह अवैध और असंवैधानिक संसद (इमरजेंसी में अवधि विस्तार के छठे साल में) के जरिये संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी’ (और धर्मनिरपेक्ष) शब्द जुड़वाया। 1991 के बाद से देश बाजारवादी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। फिर भी हमें ऐसा कोई नेता नज़र नहीं आया, जो संविधान को उस अवैध कृत्य से मुक्त कर सके। कभी भाजप िवशाल बहुमत से जीत हासिल कर ले और संविधान की प्रस्तावना में संशोधन करें तो धर्मनिरपेक्षता चली जाएगी, समाजवाद बना रहेगा।

सबूत बार-बार मिलते रहते हैं। हाल ही में नरेंद्र मोदी सरकार ने इंदिरा गांधी के सबसे खराब आर्थिक फैसले -बैकों का राष्ट्रीयकरण- को उलटने की बजाय उन्हें पुनर्जीवित करने के लिए 2.11 लाख करोड़ रु. दिए। मोदी की राजनीतिक अर्थव्यवस्था वाजपेयी की बजाय इंदिरा गांधी से ज्यादा प्रेरित है। और राजनीति? इंदिरा ने पूर्ण राजनीतिमें महारत हासिल की थी। पूरे देश में उनकी पार्टी की जीत होनी चाहिए और विपक्ष का पूरा विनाश। लोकलुभावन तरीकों, गठबंधनों, छीना-झपटी, येन-केन-प्रकारेण और अनुच्छेद 356 के जरिये उन्होंने यही किया। विपक्ष के लिए उनके पास कोई वक्त नहीं था। इस तरह वे विपक्ष-मुक्त भारत चाहती थीं। कुछ सुना हुआ सा लगता है?

(साभार दैनिक भास्कर)

 

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