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हिंदी: फूलों को नहीं, जड़ों को सींचिए...

Published At: Saturday, 15 September, 2018 Last Modified: Sunday, 16 September, 2018

 गोविंद सिंह ।।

वरिष्ठ पत्रकार

आम तौर पर हिंदी दिवस या सप्ताह के दौरान हम हिंदी को आगे बढ़ाने की कसमें खाते हैं। इस साल यह कुछ पहले शुरू हो गया। अर्थात 18-20 जुलाई को मौरिशस में सम्पन्न 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन से। देशी स्तर पर होने वाले समारोहों में  छोटी कसमें खाई जाती हैं, जबकि विदेशी या विश्व स्तर पर होने वाले सम्मेलनों में खाई जाने वाली कसमें ऊंची होती हैं। मसलन देश के भीतर कहा जाएगा कि हमें अपने सरकारी दफ्तर या संस्थान में हिंदी को स्थापित कर देना है, हिंदी को शत-प्रतिशत लागू कर देना है या शत प्रतिशत पत्र हिंदी में लिखने हैं, आदि-आदि। विश्व हिंदी सम्मेलन के मंच से गूंजेगा कि हमें हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बना देना है। कंप्यूटर की भाषा बना देना है या यूरोप-अमेरिका में हिंदी कक्षाएं शुरू करवा देनी हैं। ये सब सपने कैसे पूरे होंगे, इसकी बात कोई नहीं करता। नतीजा यह है कि पिछले 70 साल से हम कसमें ही खा रहे हैं और हिंदी वहीं की वहीं है। बल्कि यह कहना ज्यादा सार्थक होगा कि वह एक कदम आगे बढ़ती है तो दो कदम पीछे भी आ जाती है।

ऐसा क्यों है? क्योंकि हम हिंदी को आगे बढ़ाने के नाम पर उसकी जड़ों पर नहीं, फल-फूलों पर पानी डाल रहे हैं। आप कहेंगे जड़ से आशय क्या है, फल-फूल का क्या मतलब है? ये कोई रहस्य नहीं हैं। सर्वविदित हैं। देश के स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालय उसकी जड़ें हैं तो संयुक्त राष्ट्र फल-फूल। निस्संदेह अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में बोल कर महान कार्य किया। नरेंद्र मोदी ने मेडिसन स्क्वेयर पर अमेरिकियों के सामने हिंदी में बोलकर देश का गौरव बढ़ा दिया। लेकिन यह उपलब्धि तब तक आगे नहीं बढ़ सकती, जब तक कि पीछे से सपोर्ट न मिले। यही वजह है कि अटल बिहारी वाजपेयी से नरेंद्र मोदी तक आते-आते 37 साल लग गए। आशय यह है कि हम हिंदी दिवस के नाम पर ऊपर-ऊपर से चाहे जितनी कोशिश कर लें, वह तब तक सफल नहीं हो सकती, जब तक कि शिक्षा में हिंदी को उचित महत्व न मिल जाए। आप 1975 से अब तक हो चुके 11 विश्व हिंदी सम्मेलनों की कार्यसूची देख लीजिए। आपको एक भी सूची ऐसी नहीं मिलेगी, जिसमें कहा गया हो कि हम भारत की शिक्षा में हिंदी को लागू करवाएंगे। उनमें आपको बड़ी-बड़ी बातें मिलेंगी। सरकारी दफ्तरों में ‘साहित्य-संस्कृति में सूचना प्रौद्योगिकी’ दुनिया भर में हिंदी को बढ़ाने की बातें मिलेंगी लेकिन एक छोटी सी बात नहीं मिलेगी, शिक्षा में हिंदी को लागू करने की।

यह इसलिए जरूरी है कि बिना शिक्षा में हिंदी को लाए, आप लाख कोशिश कर लीजिए, हिंदी को लागू नहीं कर सकते। भले ही आप कुछ धन खर्च करके थोड़े काम हिंदी में कर लेंगे, लेकिन पीछे से अंग्रेजी की ऐसी सुनामी आ रही है कि आप उसका मुकाबला कर ही नहीं सकते। 1950 में लगभग पूरे देश में एक जैसी शिक्षा थी। देश में चार-छह अंग्रेजी स्कूलों को छोड़ दें तो बाकी सारे स्कूल भारतीय भाषाओं वाले थे। चाहे अमीर हो या गरीब, सबके बच्चे समान शिक्षा पाते थे। जबकि आज अंग्रेजी स्कूलों की भी अनेक श्रेणियां बन गई हैं। गांव-गांव तक अंग्रेजी फैलाने वाले तथाकथित पब्लिक स्कूल खुल गए हैं। शुद्ध भारतीय विचारों वाले स्कूल भी अंग्रेजी माध्यम अपना चुके हैं। इस आंधी के सामने हिंदी के छप्पर कहां टिकने वाले हैं? 

आज बड़े-बड़े शिक्षाविद कहते हैं कि अंग्रेजी शिक्षा की बदौलत ही हम तरक्की कर रहे हैं। उसी की वजह से हमारे बच्चे सिलिकोन वैली पहुंच रहे हैं। लेकिन आप यह भूल रहे हैं कि इसीलिए तो अंग्रेजों ने इस देश में अंग्रेजी शिक्षा लागू करवाई थी कि आप जन्म-जन्म तक अंग्रेजों की गुलामी करते रहें। 1820 तक तो इस देश में अंग्रेजी शिक्षा नहीं थी। तब भी हमारे देश में स्कूल-कॉलेज थे, विश्वविद्यालय थे। जहां अंग्रेजी शिक्षा से बेहतर शिक्षा दी जाती थी। हजार साल पहले तक और भी उन्नत शिक्षा दी जाती थी। नालंदा, तक्षाशिला इसी देश में थे, जहां विश्व भर से छत्र पढ़ने आते थे। उनके भाषा कोई यूरोपीय भाषा तो नहीं थी। आखिर मैकाले ने ब्रिटिश संसद में कहा ही था कि इस देश को स्थायी गुलाम बनाना है तो इस देश की शिक्षा के ढांचे तो तहस-नहस करके अपनी शिक्षा व्यवस्था लागू करो। दो फरवरी 1835 को भारत के गवर्नर जनरक विलियम बेंटिंक को मैकाले ने लिखा था-

1.    फारसी की जगह अंग्रेजी को देश की राजभाषा बनाया जाए।

2.    शिक्षा के तमाम संस्थानों में अंग्रेजी को शिक्षा के माध्यम के रूप में लागू करवाया जाए।

3.    आगे चल कर पश्चिमी शिक्षा ग्रहण किए हुए लोग अन्य भारतीयों को शिक्षित करने का काम करेंगे।

4.    अंग्रेजी शिक्षा पाए हुए लोगों का एक आभिजात्य वर्ग तैयार होगा, जो रक्त और वर्ण में भाले ही भारतीय होंगेए पर बुद्धि, विचार और चरित्र से अंग्रेज होंगे।

5.    इस शिक्षा का मकसद सरकार के निचले स्तरों पर कार करने वालों कि फौज तैयार करना तो था ही, साथ ही सांस्कृतिक रूप से भारतीयों को बदलना भी था।

मैकाले की इस शिक्षा नीति का फल हम आज तक भोग रहे हैं। देश के एक कोने कोलकाता में मैकाले ने जिस अंग्रेजी शिक्षा का वृक्ष बोया था, आज वह फल-फूल रहा है। भारत में उसे खूब पोषण मिल रहा है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह रही कि इसे आभिजात्य वर्ग से जोड़ दिया गया। सिर्फ अंग्रेजी जानने भर से ही आदमी शिक्षित कहलाने लग गया। यह सामाजिक स्टेटस का प्रतीक बन गई। यही वजह है कि तमाम कोशिशों के बावजूद वह अपनी जगह से टस से मस नहीं हो रही। गांधी जी ने कहा था, ‘ऐसा लगता है कि लोगों ने अंग्रेजी नाम की शराब पी ली है, लिहाजा वे क्लबों में, घरों में और सार्वजनिक स्थलों में अंग्रेजी बोलने में गर्व महसूस करते हैं।’ संभव है कि अंग्रेजी के बल पर हमारे बच्चे अमेरिका पहुंच रहे हों, लेकिन इस शिक्षा ने हमंभ अपनी जड़ों से सचमुच काट दिया है।

हिंदी को स्थापित करने का मतलब अंग्रेजी भाषा का विरोध नहीं है। जिस तरह से अंग्रेजी हमारे राष्ट्र जीवन में छा गई है, उससे हमारी स्वाभाविक प्रगति पर ब्रेक लग गया है। हमारे मौलिक सोच पर ग्रहण लग गया है। इसलिए जरूरी है की शिक्षा को अंग्रेजी की जकड़नों से मुक्त किया जाए।

(लेखक केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू में जनसंचार विभागाध्यक्ष हैं)

 

 



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