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'अहिंसा और बराबरी पर आधारित थी गांधी की अर्थनीति'

Published At: Tuesday, 16 October, 2018 Last Modified: Tuesday, 16 October, 2018

अरुण कुमार त्रिपाठी

वरिष्ठ पत्रकार ।।

अहिंसा और बराबरी पर आधारित थी गांधी की अर्थनीति

महात्मा गांधी की अर्थनीति अहिंसा और बराबरी पर आधारित थी। उसके केंद्र में न तो बड़े-बड़े उद्योग और बाजार थे और न ही राज्य की असाधारण शक्ति। उसके केंद्र में थी राजनीति और पूंजी की विकेंद्रित सत्ता और नैतिक मनुष्य। इसलिए पारंपरिक अर्थशास्त्र के दायरे में उन्हें रख पाना और अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों को उनके विचार समझा पाना आसान नहीं है। उनके आर्थिक विचार जहां भारत की वैष्णवी परंपरा से प्रभावित थे, वहीं यूरोप के लेखक जान रस्किन की `अनटू दिस लास्ट’  से भी। उन पर टालस्टाय का `ब्रेड लेबर’ यानी रोटी के लिए श्रम के सिद्धांत का भी प्रभाव था। एक तरह से वे ऐसे भारतीय चिंतक थे, जो यूरोप के अच्छे और अनुकूल विचारों को मिलाकर अपनी अर्थनीति निर्मित कर रहे थे। रस्किन के `अनटू दिस लास्ट’ का सर्वोदय नाम से अनुवाद करने वाले गांधी ने उससे जो तीन सूत्र ग्रहण किए थे, वह उनकी अर्थनीति को समझाने में काफी मददगार साबित हो सकते हैः—

1- व्यक्ति की भलाई सबकी भलाई में निहित है। (यहां सबके आगे व्यक्ति का समर्पण नहीं है।)

2- वकील के कार्य का भी वही मूल्य है, जो नाई के कार्य का है। क्योंकि सभी को अपने काम से आजीविका कमाने का हक है।

3- एक मजदूर का जीवन यानी खेत जोतने वाले किसान और शिल्पकार का जीवन श्रेष्ठ जीवन है।

उन्हें टालस्टाय के ब्रेड लेबर सिद्धांत ने भी बहुत प्रभावित किया था और उसका अर्थ था कि हर किसी को अपने जीवन की मूल आवश्यकताओ की पूर्ति के लिए श्रम करना चाहिए। यहां तक कि एक बौद्धिक को भी उससे मुक्त नहीं रखना चाहिए।

गांधी की अर्थनीति भौतिक सुख-सुविधाओं की चिंता करती थी, लेकिन नैतिकता की कीमत पर नहीं। यानी जो अर्थनीति मनुष्य और राष्ट्र के नैतिक कल्याण को आहत करती है, वह अनैतिक कही जाएगी और पापपूर्ण है। इसी तरह जो अर्थशास्त्र एक देश को दूसरे का शिकार करने की अनुमति देता है, वह अनैतिक है। अब अगर गांधी के इस अर्थशास्त्र को पारंपरिक अर्थशास्त्र की परिभाषा के समक्ष रखकर देखेंगे तो वे एक उटोपिया रचते दिखाई देंगे, जिसे इक्कीसवीं सदी की तीसरी औद्योगिक लहर में व्यावहारिक बना पाना बेहद कठिन लगेगा। जो भी कक्षाओं में पढ़ाया जाने वाला अर्थशास्त्र है, वह तो यही कहता है कि मनुष्य की विभिन्न आर्थिक गतिविधियों का अध्ययन और उसमें किसी नियम की तलाश ही अर्थशास्त्र है।

अल्फ्रेड मार्शल कहते हैं कि अर्थशास्त्र वह विज्ञान है, जो जीवन के सामान्य व्यापार में मनुष्य के कल्याण का अध्ययन करता है। कार्ल मार्क्स अगर अर्थशास्त्र में अतिरिक्त मूल्य और उससे पूंजी के निर्माण का सिद्धांत देते हैं तो वे उससे बढ़ने वाली असमानता और शोषण का हल वर्ग संघर्ष और हिंसक क्रांति में देखते हैं। मौजूदा दौर पर सर्वाधिक प्रभावी ढंग से हावी और मार्शल के शिष्य जान मेनार्ड कीन्स ने रोजगार ब्याज और मुद्रा के सामान्य सिद्धांत के ग्रंथ की रचना 1936 में की। उनका उद्देश्य मंदी में फंसे विकसित देशों को बाहर निकालना था और इसलिए उन्होंने राष्ट्रीय आय और मांग का सिद्धांत दिया। उन्होंने कहा कि अगर रोजगार बढ़ाना है तो उपभोग बढ़ाना होगा।

गांधी इन सभी अर्थशास्त्रियों से एकदम अलग थे। वे न तो सुखी मानव जीवन के लिए निरंतर मांग बढ़ाते जाने में यकीन करते थे और न ही पूंजीपतियों की सत्ता को ध्वस्त करने के लिए वर्ग संघर्ष और हिंसक क्रांति की बात करते थे। वे सर्वहारा की तानाशाही की बात भी नहीं करते। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि उनके आदर्श छोटे हैं और न ही इसका यह मतलब है कि वे अव्यावहारिक हैं।

वे पूंजी को सामाजिक रूप से जरूरी भी मानते थे लेकिन उसे किसी एक के हाथ में केंद्रित होने को अनुचित मानते थे। पूंजीपतियों को बेहद नजदीक से देखने वाले गांधी का विश्वास था कि बड़े पैमाने पर पूंजी हिंसा से ही इकट्ठा की जा सकती है। उसके लिए चाहे परोक्ष हिंसा हो या प्रत्यक्ष। जाहिर है कि जो चीज हिंसा से जमा की जा रही है, उसे अहिंसा से संरक्षित नहीं किया जा सकता। उसकी रक्षा तो हिंसा से ही हो सकती है। हम देख सकते हैं कि पूंजी ने अपनी रक्षा के लिए राज्य को किस तरह अपना औजार बना रखा है। चाहे कारखाना लगाने के लिए किसानों की जमीन हथियाने के लिए किया जाने वाला बल प्रयोग हो या कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की हड़ताल को दबाने का सवाल हो, हर जगह हिंसा उपस्थित है। सिंगुर और नंदीग्राम तो एक प्रत्यय बन गया, लेकिन गुड़गांव और दिल्ली के आसपास नोएडा और ग्रेटर नोएडा के घोड़ी बछेड़ा गांव भी कम चर्चित नहीं हुए। दक्षिण के तूतीकोरन में स्टरलाइट के विरुद्ध हुए आंदोलन की हिंसा की स्मृति भी ताजा ही होगी। वह स्पष्ट तौर पर पूंजी का क्रूर चरित्र था, जिसमें राज्य उसके साथ खड़ा था। यानी, पूंजी हिंसा से अपनी रक्षा करती है और हिंसा की वह शक्ति वह राज्य से प्राप्त करती है। जनता ने राज्य को अन्याय से लड़ने के लिए दंड देने और हिंसा रोकने के नाम पर हिंसा करने का वैध अधिकार जो दे रखा है।

इसका मतलब यह नहीं कि वे पूंजीपतियों के विरुद्ध थे। वे जानते थे कि पूंजीपतियों और उद्यमियों के पास वह हुनर होता है, जिससे वे धन कमा सकें। इसलिए वे उन्हें धन कमाने और उनके हुनर के इस्तेमाल की छूट दिए जाने के पक्ष में थे। पर वे यह चाहते थे कि पूंजीपति जो धन कमाए उसे समाज के हित में लगाए और उस पर निजी अधिकार न माने। पूंजीपति अपनी जरूरत का धन इकट्ठा करे और उसके बाद की जो कमाई है, वह सामाजिक कल्याण में लगाए। इसलिए वे न सिर्फ पूंजी पर सामुदायिक स्वामित्व कायम करने के हिमायती थे, बल्कि उत्पादन के साधनों पर भी सामुदायिक स्वामित्व चाहते थे। यहीं पर उनके ट्रस्टीशिप का सिद्धांत आता है और उसके अनुसार पूंजीपति अपनी कमाई गई संपत्ति का मालिक नहीं है, बल्कि ट्रस्टी है और वह उसका सामाजिक हित में इस्तेमाल कर रहा है।

गांधी यहीं पर आदर्श और साध्य के रूप में समाजवाद के करीब जाते हैं। जहां न तो किसी के पास आवश्यकता से अधिक संपत्ति होनी चाहिए और न ही संपत्ति के उत्तराधिकार की परंपरा होनी चाहिए। लेकिन उसे प्राप्त करने के उनके तरीके अलग हैं। वे न तो ट्रस्टीशिप का आदर्श हिंसक क्रांति से हासिल करना चाहते हैं और न ही उसे बनाए रखने के लिए सर्वहारा की तानाशाही या राज्य के कठोर कानूनों की हिमायत करते हैं। वे राज्य को अतिरिक्त शक्ति देने के पक्ष में नहीं हैं। वे साम्राज्यवाद से लड़ते हुए देख रहे थे कि इंग्लैंड ने अपनी जो भी समृद्धि हासिल की वह दूसरे देशों के संसाधनों के शोषण पर आधारित थी। उसने राज्य के माध्यम से उन देशों की जनता को गुलाम बनाने, मारने और कुचलने की नीति अपनाई, जिनके संसाधनों को उनके पूंजीपति छीनना चाहते थे। इसलिए वे नहीं चाहते थे कि भारत की तरक्की इंग्लैंड की तरह उद्योगीकरण के रास्ते हो, क्योंकि अगर भारत को उस तरह समृद्ध बनना है तो दुनिया के कई देशों का शोषण करना पड़ेगा।

गांधी उन्नीसवीं सदी में इंग्लैंड में रहे थे और उन्होंने वहां औद्योगीकरण के बुरे परिणाम अपनी आंख से देखे थे। इसलिए वे क्रोपटकिन जैसे अराजकतावादियों की ओर भी आकर्षित हुए थे। हालांकि गांधी के किसी लेखन में क्रोपटकिन का जिक्र नहीं है लेकिन उस समय लंदन में रह रहे क्रोपटकिन के विचारों का उन पर प्रभाव दिखता है।

गांधी विशाल आधुनिक मशीनों पर आधारित थोक उत्पादन से दो तरह से भयभीत थे। एक तो वे मानते थे कि मशीनें आदमी के हाथ से रोजगार छीन लेती हैं और दूसरे वे अपने थोक उत्पादन को बेचने के लिए दुनिया में बाजार ढूंढती हैं। जिनके हाथ में मशीनें होती हैं, वे दूसरों को कम तनख्वाह और विस्थापन देते हैं और असमानता पैदा करते हैं। दूसरी ओर मशीन और सामान बेचने के लिए गरीब और पिछड़े देशों की तलाश की जाती है और उनका दोहन किया जाता है। इसीलिए पंडित नेहरू से असहमत होते हुए वे 1940 में लिखते हैः—

`पंडित नेहरू चाहते हैं कि उद्योगीकरण हो क्योंकि वे सोचते हैं कि अगर इसका सामाजीकरण कर दिया गया तो वह पूंजीवाद की बुराई से मुक्त हो जाएगा। मेरा विचार यह है कि औद्योगीकरण में बुराई अंतर्निहित है। उसमें कितना भी समाजवाद डालो वह दूर नहीं होगी।’

सोवियत संघ और यूरोप के अन्य समाजवादी देशों ने सत्तर सालों तक उद्योगों पर राज्य का स्वामित्व रखा और बाद में वे विफल हुए। आज चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अपने बचे रहने का ढिंढोरा भले पीटती हो लेकिन उसकी समाजवादी आर्थिक नीतियों पर पूंजीवाद का कब्जा हो चुका है। विडंबना यह है कि वह अपने औद्योगिक ढांचे को चलाए रखने के लिए न सिर्फ अमेरिका से व्यापारिक युद्ध कर रहा है बल्कि दुनिया के कई देशों में निवेश करते हुए उन्हें अपना उपनिवेश बना रहा है।

उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के साथ 1990 में शुरू हुए पूंजीवाद के नए दौर ने साबित कर दिया है कि नए बाजार को खोजे बिना और दूसरे देशों के संसाधनों के दोहन के बिना उद्योगों का थोक उत्पादन न तो चल सकता है और न ही नई मशीनों का आविष्कार प्रासंगिक रह सकता है। शीत युध्द समाप्त होने के साथ रोनाल्ड रेगन और मार्गरेट थैचर की पहल पर वाशिंगटन सहमति के नाम से शुरू हुई इस नई अर्थनीति ने जहां भारत समेत दुनिया के तमाम देशों को अपनी चपेट में लिया है वहीं सबसे बड़ी चुनौती महात्मा गांधी की अर्थनीति के समक्ष प्रस्तुत की है। गांधी की अर्थनीति को सिर्फ नेहरू ने ही ठुकराया उदारीकरण ने अपने 30 साल के कठोर प्रहार से गांधी के सोच को ध्वस्त करने की कोशिश की है। लेकिन यहीं बढ़ते शहरीकरण, केंद्रीकरण, पर्यावरण विनाश, मानवाधिकार उल्लंघन और युद्ध और आतंकवाद के खतरों के बीच गांधी फिर प्रासंगिक हो रहे हैं।

यह महज संयोग नहीं है कि आदिवासियों के शोषण से आहत डा ब्रह्मदेव शर्मा लोकलाइजेशन अगेंस्ट ग्लोबलाइजेशन की बात करते थे, बल्कि पूरी दुनिया में एक तरह की स्थानीयकरण की लहर भी शुरू हुई है। यह लहर लैटिन अमेरिका जैसे देशों के नेता फीदल कास्त्रो और ह्यूगो चावेज ने ही नहीं शुरू की यूरोप में भी कृषि के तमाम उत्पादों की स्थानीय उत्पादन और स्थानीय उपभोग की चर्चाएं भी तेज हुई हैं। यह बात तेजी से महसूस की जा रही है कि अगर आदिवासियों और मूल निवासियों को सम्मानजनक जीवन देना है तो उनके संसाधनों जैसे जल जंगल और जमीन को बचाना होगा और उन्हें वहीं पर अपनी जरूरत की चीजों के आत्मनिर्भर बनाना होगा। इससे पर्यावरण भी संरक्षित होगा और मानवाधिकार की भी रक्षा होगी।

गांधी जिस शहरीकरण का विरोध करते थे, वही आज सभ्यता का आदर्श बनता जा रहा है। लेकिन शहरों में बढ़ते ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और परायापन अब लोगों को अखरने लगा है। शहरों का बुनियादी ढांचा बनाने में जो संसाधन लगते हैं और उसे व्यवस्थित करने में जिस बड़ी नौकरशाही की जरूरत होती है, वह सरकारों पर एक बोझ साबित हो रही है। एक प्रकार से शहर और गांव के भीतर लगातार तनाव बढ़ रहा है और पूंजी और सत्ता का केंद्रीकरण भी  निर्मित हो रहा है। यूरोप में अगर भोजन के अंत और तेल व पानी के अंत की घोषणाएं हो रही हैं तो उनकी नींव में शहरों का अंधाधुंध विस्तार ही है। शहरों के उपभोग की जो वस्तुएं दूर उत्पादित होती हैं उनको लाने और संरक्षित करने में भारी खर्च आता था। आज तमाम नियोजक महसूस कर रहे हैं कि खाद्य का यह व्यापार विशुद्ध रूप से मूर्खता है। इसलिए शहरों के उपयोग की चीजें उनके आसपास ही पैदा की जानी चाहिए और उनका वहीं उपभोग कर लेना चाहिए। गांधी के विकेंद्रीकरण का यही रूप है।

गांधी की अर्थनीति में उपभोग, प्रौद्योगिकी, उत्पादन के परिमाण, विकेंद्रीकरण, शहरीकरण , समता और विशेषीकरण का एक रिश्ता है। गांधी दो बातों में सबसे ज्यादा पिछड़े और मध्ययुगीन लगते हैं। एक तो वे मशीनों के प्रति बहुत ज्यादा झिझक रखते हैं और दूसरी बात यह है कि वे खेती को सबसे ज्यादा सही व्यवसाय मानते हैं। लेकिन मशीनों के बारे में गांधी का वह चित्र बड़ा मशहूर है जिसमें वे माइक्रोसकोप में कुष्ठरोग के कीटाणुओं का निरीक्षण कर रहे हैं। लंदन में जब चार्ली चैपलिन उनसे पूछते हैं कि वे मशीनों का विरोध क्यों करते हैं तो वे कहते हैं कि हम तो जहाज से आए हैं। साइकिल से लेकर रेलगाड़ी तक का प्रयोग करते हैं इसलिए मशीनों का अंध विरोध कहां है। लेकिन आपने हमें अनावश्यक मशीनें दे दी हैं। जैसे हम तो हाथ से खाना खाते हैं लेकिन आपने हमें छूरी कांटा दे दिया। इसलिए हम वैसी मशीनों का विरोध करते हैं जो गैर जरूरी हैं और हमें गुलाम बनाती हैं।

गांधी स्वयं एक व्यवसायी परिवार से थे, लेकिन उनकी अर्थनीति घाघ की उस कहावत पर आधारित थी कि `उत्तम खेती मध्यम बान, निषिद्ध चाकरी भीख निदान’। उनके शिष्य और अर्थशास्त्री जेसी कुमारप्पा ने इकानमी आफ परमानेंस नाम की ग्रंथ रचना की है। उनका कहना था कि औद्योगिक अर्थव्यवस्था हिंसा की अर्थव्यवस्था है। वह प्रकृति का अतिरिक्त दोहन करती है और इनसानों को उजाड़ती, मारती और बेरोजगार बनाती है। इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था अहिंसक है तो शहरी और औद्योगिक अर्थव्यवस्था हिंसक है। गांधी के शिष्य डा राममनोहर लोहिया ने 1966 में निजी सदस्य के रूप में ट्रस्टीशिप का बिल भी संसद में पेश किया था और विनोबा भावे ने जबरदस्त भूदान आंदोलन चलाया। हालांकि यह दोनों प्रयास विफल रहे।

 लेकिन आज बड़ा सवाल है कि क्या हम सिर्फ खेती के आधार पर भारत जैसी बड़ी आबादी के नागरिकों को रोजगार और बेहतर जीवन दे सकते हैं? इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले यह प्रश्न बनता है कि क्या हम बड़े उद्योगों, शहरीकरण, केंद्रीकरण, आवश्यकताएं, थोक उत्पादन, प्राकृतिक साधनों का दोहन और असमानता को प्रेरक तत्व बढ़ाते जाने से एक लोकतांत्रिक सभ्यता बना पा रहे हैं? निश्चित तौर पर यह अर्थव्यवस्था टिकाऊ नहीं है। इसमें प्रकृति की तबाही है, खेती का संकट है और शहर में सबके लिए स्थान नहीं है। यह अर्थव्यवस्था बाजार के लोकतंत्र का दिखावा करके आई थी और फिर कारपोरेट और राज्य को अथाह शक्ति देकर खड़ी हुई है। रोज नए घोटाले हो रहे हैं और मेक इन इंडिया के नाम पर रोज हथियारों के नए नए सौदे हो रहे हैं।

गांधी की अर्थनीति के केंद्र में मनुष्य है। वह पूंजीपति और राज्य दोनों को अथाह शक्ति नहीं देना चाहती। वह न तो पूंजीपतियों के हाथ में उत्पादन के ऐसे साधन देना चाहती है जिससे वे मनुष्य को गुलाम बना लें और न ही राज्य के हाथ में ऐसा हथियार देना चाहती है जिससे वे मानवता का विनाश करें। आज अगर थामस पिकेटी, जोसेफ स्टीग्लिट्ज बढ़ती असमानता से चिंतित हैं और कारपोरेट को नियंत्रित करने के लिए नए सिरे से टैक्स लगाने की बात करते हैं तो परमाणु हथियारों से भी दुनिया चिंतित है। जिन्होंने परमाणु हथियार बना लिए हैं वे चाहते हैं कि कोई और देश न बनाए। दूसरी ओर जो नहीं बना पाए हैं वे उसे बनाने और संरक्षित करने में लगे   हैं। हथियारों का बजट हर देश जरूरी मानता है और उस पर बड़े बड़े लोकतंत्र में सवाल नहीं उठते हैं। इसकी कीमत पर शिक्षा और स्वास्थ्य में चाहे जितनी कटौती हो जाए और चाहे जितनी बदहाली।

इस बीच मशीनों और संचार प्रौद्योगिकी ने एक ओर झूठ(उत्तर सत्य) और उससे डरी राजनीतिक व्यवस्थाओं की चुनौती पेश की है तो दूसरी ओर `आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस’ जैसा आविष्कार मनुष्य पर ही कब्जा करने को तैयार बैठा है। गांधी की नैतिक अर्थव्यवस्था एक बार फिर हम से पूछ रही है कि हम कहां जा रहे हैं और क्या कर रहे हैं। धरती पूछ रही है कि हमें कितना विनाश सहना होगा। धार्मिक समूह पूछ रहे हैं कि हमें कितने आतंकी पैदा करने होंगे तो सैनिक पूछ रहे हैं कि हमें कितने आपरेशन करने होंगे। जबकि सेनाध्यक्ष कह रहे हैं कि सैनिक वर्चस्व का सारा खेल तो अर्थव्यवस्था का है। ऐसे में गांधी की 150 वीं जयंती पर उनके बारे में कही गई सरोजिनी नायडू की वह बात याद आती है कि हम चाहते हैं कि उनकी आत्मा को शांति न मिले और वह इस दुनिया में तब तक भटकते रहें, जब तक एक अंहिसक समाज (अर्थव्यवस्था) का निर्माण न हो जाए। 



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‘नेटफ्लिक्स’ और ‘हॉटस्टार’ जैसे प्लेटफॉर्म्स को रेगुलेट करने की मांग को लेकर क्या है आपका मानना?

सरकार को इस दिशा में तुरंत कदम उठाने चाहिए

इन पर अश्लील कंटेट प्रसारित करने के आरोप सही हैं

आज के दौर में ऐसे प्लेटफॉर्म्स को रेगुलेट करना बहुत मुश्किल है

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