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Father’s Day Spl: पुत्र का पिता होना...

Published At: Sunday, 17 June, 2018 Last Modified: Sunday, 17 June, 2018

आलोक श्रीवास्तव ।।

माता-पिता का कोई एक दिन नहीं होता। वे सब दिन एक-से होते हैं, अपने होने पर भी और न होने पर भी। वे यहीं रहते हैं, हमारे आसपास ही रहते हैं। गांव में रहते हुए भी और दूर गगन की छांव में रहते हुए भी वे मन से सदा हमारे ही साथ रहते है। मेरी बाबूजी, अम्मा की तरह ही बहुत जज़्बाती थे। बात-बात पर भावुक हो जाते थे। फिर भी मैं उनसे बहुत डरता था। कुछ भी कहते हुए या मांगते हुए सांस फूल जाती थी। कारण, एक सोच– ‘पिता हैं। पता नहीं किस बात पर बिफर जाएं? तमीज़ में रहो या उनके सामने चुप ही रहो।

तभी, कभी कहा था

भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ-पिता।

अलग, अनूठा, अनबूझा-सा इक तेवर बाबूजी।

कभी बड़ा-सा हाथ ख़र्च थे, कभी हथेली की सूजन,

मेरे मन का आधा साहस, आधा डर थे बाबूजी

बाबूजी, मेरा साहस भी थे और डर भी, इसीलिए उनसे मां की तरह खुलकर बातचीत नहीं होती थी। लेकिन नज़र न आने वाला एक तार था, एक डोर थी जो हमें बराबर बांधे रखती थी। इसी वजह से अक्सर उनसे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती। जो चाहता, हो जाता।

बाबूजी लेफ़्टी थे। बाएं हाथ से लिखते थे, और क्या ख़ूब लिखते थे। उनकी हेंड-राइटिंग बहुत सुंदर थी। जैसे किसी ने काग़ज़ पर मोती उतार दिए हों। मैंने चाहा कि उन जैसे अक्षर बनाऊं। बहुत कोशिश की तब कहीं थोड़ा-बहुत हो पाया। काग़ज़ पर शब्द सजाने का हुनर उन्हीं से सीखा- एकलव्य की तरह। वे बाएं हाथ से ही खाना खाते थे। मुझे अपने दायीं तरफ़ बैठाते। खाते-खाते ललचाई आंखों से जैसे ही मैं उनकी तरफ़ देखता, अपनी तरफ़ बढ़ता निवाला, मुस्कुराते हुए मेरे मुंह में डाल देते। उनकी ये अदा क़ातिलाना थी। मैं दिल निकाल कर रखने की कोशिश में ही रह जाता और वे कलेजा निकाल कर रख देते। इस एक क्षण में शब्द या संवाद अक्सर कसमसा कर रह जाते। हर लफ़्ज़ बौना। हर शब्द बे-मआनी। वजूद में अगर कुछ होता तो बस- ख़ामोशियों के बीच तैरती दो भावुक दिलों की आवाज़ें।

मेरी ख़ामोशियों में तैरती हैं तेरी आवाज़ें,

तेरे सीने में अपना दिल मचलते मैंने देखा है।

तुम्हारे ख़ून से मेरी रगों में ख़्वाब रौशन हैं,

तुम्हारी आदतों में ख़ुद को ढलते मैंने देखा है।

नई पैंट या जींस लेना हो या फिर किसी शर्ट की चाहत जाग जाए, बस उनके सामने जाता और तंग होती किसी प्राचीन-पतलून की चेन लगाता, या टाइट होती पुरातन-शर्ट के बटन खींजते हुए कांच में खोंसता। कुछ कहता नहीं, बस ये हरकत करता और दंबे-पांव उनके सामने से खिसक लेता। दूसरे दिन नए कपड़ों की रसद मुझ तक पहुंच जाया करती। इस रिश्ते की यही डोर थी और यही शक्ति थी। पिता-पुत्र के अंतर-संबंध की यही ताक़त थी। मैं, मेरे भाई-बहन और मेरे कई मित्र ऐसे ही दौर, संस्कार और परिवेश में पले-बड़े हुए। जहां पिता-पुत्र का संवाद न के बराबर रहा। अगर कुछ था तो बस एक तार, एक डोर। जो दिखाई तो नहीं देती थी, लेकिन हर वक़्त हमें बांधे रखती थी।

22 बरस का था जब पिता नहीं रहे। दो दशक से ज़्यादा बीतने को हैं। तब मेरे पिता थे। अब मैं पिता हूं। 'इशारों में ख़्वाहिशों के इज़हार का हुनर आज भी क़ायम है। ख़ामोशियों की आवाज़ें अब भी सुनाई देती हैं। एक तार, एक डोर अब भी काम पर मुस्तैद हैं। पुत्र अंशल 16 बरस का हो गया है। वो भी अक्सर मुझसे कुछ नहीं कहता। लेकिन आंखों की चमक में ख़्वाहिशें पढ़ने का जो हुनर मैंने अपने बाबूजी में देखा था, वो अब मेरे काम आता है। सपने बदल गए हैं। ज़रूरतें जींस और शर्ट से बहुत आगे निकल गई हैं। जिन्हें पूरा करने की मैं हर मुमकिन कोशिश करता हूं। जैसे मेरे पिता, मेरे लिए किया करते थे। मेरे पिता बहुत अच्छे थे -यह मैं मानता हूं। मैं कैसा पिता हूं -यह अंशल तय करेगा। मेरा कल तय करेगा।

(लेखक, कवि और टीवी पत्रकार हैं)

 

 

 

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