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बड़ा सवाल- क्या डिजिटल मीडिया का अस्तित्व खतरे में है?

Published At: Tuesday, 12 December, 2017 Last Modified: Tuesday, 12 December, 2017

बालेंदु शर्मा दाधीच

वरिष्ठ पत्रकार ।।

आठ साल पहले हमने देखा था कि किस तरह अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों में प्रिंट मीडिया के भविष्य पर अचानक खतरा मंडरा गया था। बहुत सारे अखबार और पत्रिकाएं बंद हो रहे थे क्योंकि डिजिटल मीडिया के दबाव में उनके पाठक और विज्ञापन दोनों घटते चले जा रहे थे। इनमें से कुछ अखबार ऐसे थे जो सौ साल से भी ज्यादा समय से चल रहे थे और बड़ी से बड़ी मंदी और विश्वयुद्धों तक का माहौल झेल चुके थे।


प्रिंट मीडिया में वह बड़ी हताशा और निराशा का दौर था। बहुत से अखबारों ने इन हालात के सामने समर्पण कर दिया लेकिन कुछ ने खुद को बदला और आगे बढ़ने के नए रास्ते निकाले। जैसे अमेरिका में वाशिंगटन पोस्ट और न्यूयॉर्क टाइम्स, ब्रिटेन में गार्डियन और डेली मिरर तथा अपने यहां टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस। उन्होंने डिजिटल मीडिया की ओर विस्तार किया तथा प्रिंट मीडिया में अपनी साख का इस्तेमाल नए माध्यमों में कामयाबी के लिए किया। न्यूयॉर्क टाइम्स का उदाहरण देखिए जिसने प्रिंट मीडिया में जितना खोया उससे कहीं ज्यादा ऑनलाइन मीडिया में अर्जित कर लिया। ऐसी मिसालें भारत में भी मौजूद हैं। शनै-शनै डिजिटल मीडिया समग्र मीडिया का स्वाभाविक हिस्सा बन गया और तमाम किस्म के मीडियाओं के बीच सह-अस्तित्व सा कायम हो गया। लेकिन अब कुछ खबरें ऐसी आ रही हैं जो एक बार फिर से मीडिया के चाहने वालों को निराश करेंगी।


संकेत यह है कि अब डिजिटल मीडिया का अस्तित्व भी संदेह से परे नहीं रह गया है। नहीं, हम डॉट कॉम संकट जैसी किसी घटना की बात नहीं कर रहे जिसने सन 1997 से 2000 के बीच इंटरनेट की दुनिया में जलजला पैदा कर दिया था। लाखों-करोड़ों वेबसाइटें बंद हो गई थीं और उनमें लगा अरबों खरबों डॉलर का निवेश स्वाहा हो गया था। उन वेबसाइटों की एक बड़ी समस्या यह थी कि उनमें खर्च तो असीमित था लेकिन आमदनी का कोई जरिया नहीं खोजा गया था, सिवाय वेंचर कैपिटल या बाहरी निवेश के। लगभग वही स्थिति जो आज स्टार्ट-अप के क्षेत्र में यदा-कदा देखने को मिल जाती है। उस समय गूगल ऐडसेंस नहीं था जिसने लाखों वेबसाइटों के लिए आय का जरिया पैदा किया है। हां, कुछ छोटे विज्ञापन वितरण माध्यम ज़रूर थे लेकिन ऐडसेंस का जो विस्तार है उसके आगे वे शिशुओं के समान थे। सो डॉट कॉम संकट के दौरान परिस्थितियाँ अलग थीं। तब सब कुछ उम्मीद पर चल रहा था और वेबसाइटों में कन्टेन्ट की प्रधानता थी, किसी भी कीमत पर ज्यादा से ज्यादा यूजर्स तक पहुँचने का जुनून था। विशिष्टता (यूनीकनेस) और लंबे समय तक बाजार में टिके रहने की क्षमता पर सब कुछ निर्भर ना जा रहा था, इस उम्मीद में कि जब कंसोलिडेशन होगा तब जो संस्थान बचे रहेंगे, उनमें हम भी होंगे। यह भी उम्मीद थी कि वेंचर संस्थान निरंतर निवेश करते रहेंगे। सो वे दिन दूसरे थे। आज हजारों वेबसाइटें बहुत बड़े प्रिंट मीडिया या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थानों जितनी ही बड़ी हो गई हैं, बल्कि कहा जा सकता है कि बहुत सी उनसे भी बड़ी।


तो नई खबर क्या है? आशंका है कि डिजिटल मीडिया भी आने वाले वर्षों में लगभग उसी तरह के संकट का शिकार हो सकता है जिसका प्रभाव पश्चिमी प्रिंट मीडिया पर देखने को मिला था। यहां भी चिंता पाठकों की वृद्धि दर में कमी आने, विज्ञापनों से अपेक्षित आय न होने, एक खास किस्म के विज्ञापन माध्यम पर निर्भरता और लोगों तक पहुँचने के नए माध्यम उभरने के कारण पैदा हो रही है। दुनिया की कुछ बेहद मशहूर और लोकप्रिय कंटेंट वेबसाइटों- मैशेबल.कॉम (Mashable.com), वाइस.कॉम (Vice.com) बज़फीड.कॉम (Buzzfeed.com) से आई कुछ निराशाजनक खबरों से तो यही लगता है।


मैशेबल की आय में भारी कमी आई है और वह जिफ डेविस के हाथों बिकने जा रही है। वह भी महज 5 करोड़ डॉलर में। उसकी यह जो कीमत आँकी गई है वह एक साल पहले आंकी गई कीमत (25 करोड़ डॉलर) का महज बीस फीसदी है। उस वक्त एक कंपनी ने मैशेबल में 1.5 करोड़ डॉलर का निवेश किया था। निवेशक ने यकीनन अच्छा फायदा होने की उम्मीद बांधी होगी लेकिन यहां तो उसके निवेश की मौजूदा कीमत घटकर बीस फीसदी पर आ गई है, यानी महज 30 लाख डॉलर।


बज़फीड हालांकि अभी भी फायदे में है लेकिन उसके राजस्व में 15 से 20 फीसदी की कमी आई है। उधर वाइस मीडिया के का वास्तविक राजस्व पहले अनुमानित लक्ष्य की तुलना में 80 करोड़ कम रहने का अनुमान है। इन खबरों को आईटी क्षेत्र की मशहूर वेबसाइट गीगाओम के साथ घटे हालात के साथ जोड़कर देखा जा सकता है जो सन 2015 में अपने कर्जे चुकाने में नाकाम रहने के कारण बंद हो गई थी। उसे कर्जदारों ने अधिग्रहीत कर लिया था और तमाम स्टाफ कंपनी छोड़कर दूसरे कामों में लग गया था। नए मालिकों ने गीगाओम को फिर से चालू तो कर दिया लेकिन आज वह अपने मूल रूप की दस फीसदी भी नहीं है।


हम चाहें तो इन संकेतों को अनदेखा कर सकते हैं लेकिन कहीं तो आग लगी है, कहीं तो धुँआ उठ रहा है। ये दुनिया की बेहद लोकप्रिय और आधुनिक वेबसाइटें हैं जिनके आगे न आर्थिक चुनौती रही है और न ही तकनीकी चुनौती। उनके सामने अच्छी प्रतिभाओं और अच्छे कन्टेन्ट की भी कमी नहीं रही। नवोन्मेषी प्रबंधन और आधुनिक सोशल माध्यमों का असरदार इस्तेमाल उनकी खासियत है। तब क्या वजह है कि इन वेबसाइटों की तरफ से इस तरह के निराशाजनक संकेत आ रहे हैं?


इस उभरते संकट की मूल वजह उनका आय के प्रधान माध्यम के रूप में डिजिटल विज्ञापनों पर निर्भर होना माना जा रहा है। हकीकत यह है कि ऑनलाइन माध्यमों पर गूगल और फेसबुक का दबदबा लगभग एकाधिकार की तरफ बढ़ रहा है। डिजिटल विज्ञापनों पर इस साल दुनिया भर में हुए कुल खर्च का साठ फीसदी हिस्सा इन दोनों के हिस्से में चल गया। बाकी चालीस फीसदी में दुनिया के तमाम डिजिटल मीडिया संस्थान हैं। पाठकों की रुचि में भी बदलाव आ रहा है और लॉन्ग फॉर्म कन्टेन्ट (लंबे-चौड़े आलेखों) में दिलचस्पी खो रहे हैं। खोज, संचार और सोशल नेटवर्किंग और वीडियो जैसे माध्यमों में उनका अधिक समय जा रहा है और इसी के लिहाज से विज्ञापन भी ज्यादातर उसी दिशा में बह रहे हैं। यह विज्ञापनदाताओं के भी हित में है क्योंकि कम ठिकानों पर विज्ञापन देकर भी वे अच्छी खासी संख्या में लोगों तक पहुँच जाते हैं और उसके प्रभाव को बेहतर ढंग से माप भी सकते हैं। मार्केटिंग की दुनिया में एनालिटिक्स पर निर्भरता बढ़ी है और डिजिटल विज्ञापनों के मॉडल विकास की प्रक्रियाओं से गुजर रहे हैं। अब विज्ञापनदाता सीधे-सीधे परिणामों की मांग करने लगे हैं, जैसे यह कि एक लाख रुपए के विज्ञापन देने पर उनका ऐप्प कितने बार डाउनलोड किया जाएगा या फिर किसी उत्पाद की बिक्री में कितना इजाफा होगा।


इधर एडसेंस जैसे विज्ञापन वितरण माध्यमों पर डिजिटल मीडिया संस्थानों की निर्भरता लगातार बढ़ रही है। इसे वे अपनी आय के स्थायी माध्यम के रूप में नहीं ले सकते क्योंकि एक तो यह उनके ही एक प्रतिद्वंद्वी के माध्यम से आ रहा है और दूसरे गूगल के एल्गोरिद्म, विज्ञापनों की दरों, परिणामों के आकलन के तौर-तरीकों आदि में बदलाव आता रहता है जो एडसेंस जैसी आय को अनिश्चित बना देता है। बात घूम-फिरकर फिर वहीं आ जाती है कि डिजिटल मीडिया माध्यमों ने अलग से आय के जरिए पैदा किए या नहीं। उन्होंने एडसेंस से इतर विज्ञापनों के स्रोत बनाए या नहीं। अफसोस कि ज्यादातर वेबसाइटों, पोर्टलों आदि ने इस दिशा में कोई बड़ी कामयाबी हासिल नहीं की है। क्या यह स्थिति आपको 1997-2000 के डॉट कॉम ध्वंस की याद दिलाती है?


अब इन सारी बातों का इसका अर्थ यह नहीं है कि डिजिटल मीडिया का अस्तित्व खतरे में है। फिलहाल तो नहीं, लेकिन नई संभावनाएं पैदा करने के लिए काम करने की ज़रूरत है। यहां आशय यह है कि डिजिटल मीडिया में विज्ञापनों का जबरदस्त कंसोलिडेशन हो रहा है और 60 फीसदी विज्ञापन सिर्फ दो संस्थानों को जा रहे हैं। बाकी 40 फीसदी में दुनिया के करोड़ों डिजिटल मीडिया संस्थान हैं। कल को व्हाट्सऐप भी कोई ऐसा मॉडल लाता है जिसमें विज्ञापनों के प्रसारण की व्यवस्था हो तो इस बाकी बचे 40 फीसदी में से भी थोड़ा उसकी तरफ चला जाएगा। डिजिटल मीडिया में सक्रिय हम जैसे लोगों ने एक बड़ी उम्मीद बांधी हुई है, यूजर्स की संख्या बढ़ने से। हमें लगता है कि यूज़र बढ़ेंगे, गुणवत्ता बढ़ेगी, लोकप्रियता बढ़ेगी तो ऐड-सन्स विज्ञापनों पर ज्यादा क्लिक आएंगे और वेबसाइटों की कमाई बढ़ेगी। वह संभावना खत्म नहीं हुई है। डिजिटल विज्ञापनों पर खर्च बढ़ना भी लाजिमी है। लेकिन वह राजस्व जाएगा किस तरफ? क्या छोटे संस्थानों के पास? शायद नहीं, क्योंकि इस बीच डिजिटल मीडिया में विज्ञापन लेने-देने, परिणामों का आकलन करने आदि के तौर-तरीके बदल रहे हैं। दूसरे कन्टेन्ट के क्षेत्र में भी भारी shake up चल रहा है।


इन सब बातों पर बाद में कभी चर्चा करेंगे, मगर फिलहाल बड़ा मुद्दा यह है कि पूरी दुनिया के लिए जो सिर्फ 40 फीसदी हिस्सा बच जाता है वह और कम होता चला गया तो क्या करेंगे? दूसरे, इस 40 फीसदी का भी विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि इसका अधिकांश हिस्सा कुछ हजार संस्थानों तक चला जाता है और बाकी लाखों दूसरे संस्थानों की आय बेहद कम है। और कंसोलिडेशन की प्रक्रिया जारी रही तो वह और भी सिकुड़ती चली जाएगी। उस परिस्थिति के आने से पहले हमारी वेबसाइटों को आय के वैकल्पिक माध्यम तैयार करने पर ध्यान देना होगा।


उम्मीद है कि मैशेबल, बज़फीड, वाइस मीडिया और गीगाओम में जो कुछ घटित हो रहा है और डिजिटल विज्ञापनों की दुनिया में जो केंद्रीकरण हो रहा है, उसे अनदेखा करने की गलती डिजिटल मीडिया नहीं करेगा।


(लेखक  डिजिटल मीडिया व तकनीक के विशेषज्ञ हैं)।


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