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2019 के लिए बीजेपी का कश्मीर से पहला कदम

Saturday, 23 June, 2018

अमर आनंद 

वरिष्ठ पत्रकार ।।

2019 के लिए बीजेपी का कश्मीर से पहला कदम

महबूबा से बीजेपी की राहें अलग हो चुकी हैं और पार्टी ने कश्मीर से जो राह पकड़ी हैवो सीधी 2019 को जाती है। रमजान के दौरान सीजफायर की अवधि में 100 से ज्यादा जवानों की शहादत और पत्थरबाजों के केस माफ करने के बाद बीजेपी द्वारा लिए गए इस फैसले पर देश और उसके विरोधी सवाल उठा सकते हैं, क्योंकि ये देर से लिया गया फैसला है। लेकिन किसी को भी ये मानने से इनकार नहीं होगा कि ये फैसला देर से लिया गया दुरुस्त फैसला है। सीजफायर, जवानों की शहादत और पत्थरबाजों को लेकर पिछली सरकार को कोसने वाली और सब ठीक करने के दावे के बावजूद वैसा ही दुहराने वाली बीजेपी को ये एहसास हो गया था कि घाटी में ऐसा ही चलता रहा तो दिल्ली में दुबारा मुश्किल होगी। कश्मीर के हालात को लेकर विपक्ष के हमले झेल रही बीजेपी से आम लोग तो नाराज थे ही, हिन्दुत्व की वजह से उनसे जुड़े समर्थक और संगठन भी अंदरखाने कम नाराज नहीं थे। हालांकि ये नाराजगी सोशल मीडिया में ही ज्यादा नजर आई। 

पद छोड़ने के बाद आतंकियों और अलगावावादियों के लिए नर्मियत रखने वाली महबूबा ने साफ कहा कि बीजेपी के साथ सरकार बनाने का उसका मकसद पूरा हो गया। जवानों की शहादत की कीमत पर पत्थरबाजों के केस हटवाने में सफल रही महबूबा की राजनीति और रणनीति से बीजेपी पहले से वाकिफ नहीं थी ऐसा नहीं कहा जा सकता। बीजेपी के महासचिव राम माधव ने महबूबा से रिश्ता तोड़ते हुए ये कहा कि हमे देशहित में गठबंधन तोड़ने का फैसला लिया है। सवाल ये है कि क्या ये गठबंधन का फैसला किसके हित में लिया गया था? देश के हित में? कश्मीर के हित में? जवानों के हित में या पत्थरबाजों के हित में? या सत्ता की भूखी बीजेपी ने खुद के हित में ये फैसला लिया था, जिसकी कीमत देश और कश्मीर को चुकानी पड़ी और अब देशहित का हवाला देकर वो पीडीपी से अलग हो गई। 

पीडीपी से रुख को लेकर रणनीति पिछले दिनों उसी वक्त तैयार की गई, जब राजनाथ सिंह ने बतौर गृहमंत्री कश्मीर का दौरा किया और पत्थरबाजों के केस माफ किए गए। लोगों ने अखबारों में राजनाथ सिंह के हवाले ये बयान छपा देखा कि लड़कों से गलती हो जाती है। हालांकि इस दौर में बीजेपी के राज्य के नेताओं से बैठक के बाद राजनाथ सिंह को ये जरूर महसूस हो रहा होगा कि पत्थरबाज लड़कों से गलती हुई हो या नहीं पार्टी से जरूर गलती हो रही है और ये गलती अगर सुधारी नहीं गई तो 2019 में पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है। उन्हीं गलतियों को सुधारने के लिए ईद के ठीक बाद बीजेपी की ओर से  महबूबा की पार्टी से रिश्ता तोड़ने का ऐलान कर दिया गया। 2019 के लिए बीजेपी की सियासत तो देखिए एक तरफ संपर्क फॉर समर्थन के जरिए देश भर के मुस्लिम बुद्धिजीवियों और धर्मगुरुओं से केंद्र सरकार चार साल की उपलब्धियां लेकर मिल रही है और दूसरी तरफ कश्मीर में मुस्लिम और महिला मुख्यमंत्री की सरकार से खुद को अलग कर रही है। 

घाटी के लिए बीजेपी दो काम करेगी पहला सेना को सीमा पर दुश्मनों से निपटने के लिए खुली छूट देगी और दूसरा पत्थरबाजों और आतंकियों पर कोई नर्मी नहीं बरती जाएगी जैसा कि महबूबा और बीजेपी की मिलीजुली सरकार में किया गया है। राज्यपाल शासन के बहाने बीजेपी घाटी में सिर्फ और सिर्फ वही काम करेगी, जिससे देशभक्त और कट्टर हिन्दुत्व वाली उसकी कथित छवि पर लगे दाग को धोया जा सके और 2019 में चुनावी लाभ हासिल किया जा सके। 

बीजेपी की रणनीति को करीब से देखने वाले लोग और उनके सियासी विरोधी यहां तक कहते हैं कि पार्टी 2019 में चुनाव जीतने के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध का माहौल पैदा करने की सीमा तक जा सकती है। हालांकि दोनों देशों के बीच युद्ध के फैसले तक पहुंचने में अमेरिका, यूएन और चीन जैसे कई पेंच होंगे। इसलिए ये आसान नहीं होगा, लेकिन पाकिस्तान की चीनी हिन्दुस्तान में मंगवाने वाली बीजेपी की सरकार अपने हिंदू और कथित राष्ट्रवादी समर्थकों का दिल जीतने के लिए पाकिस्तान के खिलाफ सख्त रुख अख्तियार करेगी ऐसा साफ लग रहा है। नवाज को जन्मदिन पर पाकिस्तान जाकर बधाई देने वाले और अपनी मां के लिए नवाज से भेंट में साड़ी पाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और उनकी सरकार अब पाकिस्तान के लिए राजनयिक नर्मियत से भी परहेज करेगी, ऐसा अंदाजा लगाया जा सकता है। 

नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी, महिला सुरक्षा, किसानों की खुदकुशी जैसे कई अहम मसलों पर अपनी नाकामी से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश में जुटी बीजेपी ऐसे मुद्दों को ही छेड़ना और उसे हवा देना चाहती है जिससे इस बार भी जनमत उसकी ओर आकर्षित हो। संघ की प्रेरणा से अपनी रणनीति को अंजाम तक पहुंचाने वाली बीजेपी इसके लिए राम मंदिर के मसले पर भी कुछ ठोस करेगी ऐसा अंदाजा लगाया जा रहा है। मुमकिन है 2019 से पहले सुप्रीम कोर्ट ही कोई ऐसा फैसला कर दे जिससे बीजेपी को फायदा हो या फिर राम मंदिर के निर्माण के लिए कोई सर्वमान्य हल ढूढ़ने की दिशा में कोई बड़ा कदम उठाया जाए। इनमें से कुछ भी होगा तो 30 साल से भी पुराने राम मंदिर आंदोलन के नाम पर फर्श से अर्श तक पहुंची बीजेपी के लिए उसका अर्श सुरक्षित होता नजर आएगा और देश की जनता बीजेपी सरकार की वादाखिलाफी को दरकिनार कर उसका साथ देती हुई नजर आएगी। 

 

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