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अपनी ही कही गई बात को भय्यू जी महाराज ने झुठला दिया, बोले वरिष्ठ पत्रकार निर्मलेंदु

Thursday, 14 June, 2018

निर्मलेंदु

कार्यकारी संपादक

राष्ट्रीय उजाला ।।

भय्यू जी महाराज ने कष्टदायक कदम क्यों उठाया?

मानव प्रकृति में दोनों प्रवृत्तियां रही हैं, एक तरफ क्रोध और लोभ, तो दूसरी तरफ प्रेम और त्याग। भय्यू जी महाराज भी प्रेम और त्याग की प्रतिमूर्ति थे। सादगी की प्रतिमूर्ति, ममत्व, स्नेह से लबालब अंत:करण एवं समाज की हर पीड़ा, जिनकी निज पीड़ा थी, ऐसे व्यक्ति का जाना कष्टदायक है। समझ में नहीं आया कि वह व्यक्ति, जो दूसरों की मानसिक पीड़ा हरने की आजीवन कोशिश करते रहे, वे ऐसा कदम उठाएंगे, कल्पना से परे है। मैं एक बार उनसे मिला था। अन्ना आंदोलन के दौरान। उनसे मिलने के बाद मैं अभिभूत था। मुझे लगा कि किसी दिव्य पुरुष से मिला, लेकिन जब मैंने यह पढ़ा कि उन्होंने आत्महत्या की, तो मेरे मन में एक ही विचार आया कि कोई भी व्यक्ति, किस मानसिक पीड़ा में इस तरह का कदम उठा सकता है

दरअसल, खबरें यही आ रही हैं कि पारिवारिक कलह से डिप्रेशन में भय्यू जी। कुछ लोगों का मानना है कि भय्यूजी महाराज के ऐसा बड़ा कदम उठाने के पीछे पारिवारिक कलह वजह है। नवंबर 2015 में भय्यू जी महाराज की पहली पत्नी माधवी का निधन हो गया था। उन्होंने 30 अप्रैल 2017 को डॉक्टर आयुषी शर्मा से दूसरी शादी की थी। सूत्रों के मुताबिक, उनकी पहली बीवी से हुई बेटी को लेकर उनके और उनकी दूसरी पत्नी के बीच झगड़ा होता रहता था और यही वजह है खुदकुशी की।

कभी कपड़ों के एक ब्रैंड के लिए मॉडलिंग कर चुके भय्यू जी महाराज का देश के दिग्गज राजनीतिज्ञों से संपर्क था। वे एक नए किस्म के संत की छवि गढ़ने में जुटे हुए थे। एक साफ सुथरा संत। उनकी पहली पत्नी का पहले ही देहांत हो चुका था। 2011 में लोकपाल बिल को लेकर अनशन पर बैठे अन्ना हजारे को जूस पिलाने के बाद वह चर्चा में आए थे। भय्यू जी महाराज तब चर्चा में आए थे जब 2011 में अन्ना हजारे के अनशन को खत्म करवाने के लिए तत्कालीन केंद्र सरकार ने उन्हें अपना दूत बनाकर भेजा था। इसी के बाद ही अन्ना ने उनके हाथ से जूस पीकर अनशन तोड़ा था।

केवल यही नहीं, पीएम बनने के पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी सद्भावना उपवास पर बैठे थे। उस उपवास को तुड़वाने के लिए उन्होंने भय्यू महाराज को आमंत्रित किया था। कहते हैं कि प्रतिभा अपनी राह स्वयं निर्धारित कर लेती है और अपना दीप स्वयं ले चलती है। ठीक इसी तरह भैय्यू जी भी अंधेरे को चीर कर चलते थे। बड़े बुजुर्ग कह गए हैं कि बुद्धि से पैसा कमाया जा सकता है, पैसे से बद्धि नहीं। महाराज ने भी बुद्धि से अपना साम्राज्य बनाया, एक ऐसा साम्राज्य, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, शिवसेना के उद्धव ठाकरे, मनसे के राज ठाकरे, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, अनुराधा पौडवाल समेत कई हस्तियां उनके आश्रम आ चुके हैं।

सच तो यही है कि कोई भी व्यक्ति ऊंचे स्थान में बैठकर ऊंचा नहीं हो जाता, बल्कि हमेशा अपने गुणों से ही वह ऊंचा होता है। कभी कभी हमारे दिमाग में कोई ऐसा डर बैठ जाता है, जिसके कारण हम इस तरह से अपने आपको खत्म करने की कोशिश करते हैं और यह हम सब जानते और मानते भी हैं कि सभी प्रकार के डरों में सबसे बड़ा डर बदनामी का होता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि उन्हें किस तरह की बदनामी का डर सता रहा था।

उन्होंने ही अपने प्रवचन में एक बार कहा था कि डर को नजदीक आने दो, अगर यह नजदीक आ जाए, तो इस पर हमला कर दो। अपनी ही कही गई बात को उन्होंने झुठला दिया। वह डर पर हमला नहीं कर सके। डर का डंट कर मुकाबला नहीं कर सके। डर के आगे नतमस्तक हो गए। यह भी लोग कहते हैं कि बहुत से गुणों के होने के बाद भी सिर्फ एक दोष सब कुछ नष्ट कर सकता है, तो वह एक दोष उनका क्या था? किस बात का डर था उन्हें? उन्होंने एक बार कहा था कि मूर्ख लोगों से वाद विवाद नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से हम अपना ही समय नष्ट करते हैं। लेकिन दुख तो इसी बात का है कि आज वही व्यक्ति, जो लोगों को उपदेश दिया करते थे, हमारे बीच नहीं हैं। ऐसा जीवन जीने वाले युगद्रष्टा ने आत्महत्या क्यों की, यह एक पहेली बनकर रह गई है।

 

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