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14 को जिनका खून न खौला, खून नहीं वो पानी है-26 पर जो न नाज करे,उस पर चर्चा बेमानी है

Published At: Wednesday, 27 February, 2019 Last Modified: Wednesday, 27 February, 2019

प्रमिला दीक्षित।।

चौदह का सूरज अस्त हुआ तो हिंदुस्तान का कलेजा पस्त करके। एक-दो नहीं,40 जवानों की अर्थी का बोझ हर कंधे पर भारी था। इस ग़म की तेरहवीं पर छब्बीस का सूरज जो खबर लेकर उगा, उससे हर कलेजे को ठंडक पहुंची। सेना के पराक्रम से हर भारतीय फख्र से झूम उठा। वो जो भारतीय एंकरों पर अति उत्साह का आरोप लगा रहे थे, कुछ भी कहें, बात जब देश के स्वाभिमान की रही तो इस खबर पर हर चैनल के एंकर की आवाज़ में वो उत्साह, वो सुकून साफ़ महसूस हो रहा था।

‘एबीपी’ पर सुबह रोमाना की चहक कुछ अलग ही थी। ‘आजतक’ शायद डेवलप होती ख़बर पर संयम रखना चाहता था, इसलिए देर तक ‘आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है’ की हुंकार भी भरता रहा। पाकिस्तान में घुसकर मारा है, ये समझने में हर किसी को वक्त लगा और जब तक समझ आया ये भी समझ आ चुका था-भैया इस बार इसकी आधिकारिक पुष्टि वहीं से हुई है। हां, यहां से इस बार सबूतों की मांग थोड़ी ठंडी रही।

'रिपब्लिक भारत' ने जनता की भावनाओं को जमकर पकड़ रखा है, शायद ही किसी एंकर-रिपोर्टर ने कहा कि भारतीय सेना का हमला या भारतीय सेना की कार्रवाई, हर एंकर कह रहा था-हमने पाकिस्तान पर इतने बजे हमला किया, हमने पाकिस्तान को जवाब दिया!

‘ज़ी न्यूज’ ने घोषित ही कर दिया कि जोश हाई रखना है तो ‘ज़ी न्यूज़’ देखिए। हालांकि ‘ज़ी’ पर ही कुछ रोज़ पहले एक एंकर कारगिल योद्धा से पूछ चुकी थी-‘आपने कभी जवानों की लाश नही देखी क्या?’ और अब बालाकोट के बाद दूसरी एंकर टीवी पर ही आगे की रणनीति भी बनवाने लगी, जैसे सर्जिकल स्ट्राइक के भी कोई ऑफिशियल पॉर्टनर हों!

सोशल मीडिया पर जोश हाई रहा और जैश डैड। हालांकि, पहले एंकर को ‘वॉर मांगर्स’ कहने वाले अब खुद 'पीस मांगर्स' की भूमिका में आने लगे। लेकिन हवा का रुख़ समझ आ गया तो ऐसे कई अकाउंट शांत ही रहे। हां, अरविंद केजरीवाल का देशहित में बलिदान भी ट्रोलिंग का पात्र बना।

प्रधानमंत्री ने रैली बाद में की, सोशल मीडिया पर कई ने उनके एक बार फिर प्रधानमंत्री बनने की आशंका और कई ने उम्मीद पहले ही जता दी। अखबारों को देखें तो ज्यादातर हिंदी अख़बारों का चोला आज बसंती है। अंग्रेजी अख़बारों में कुछ ने पुलवामा वाले पाप धोए हैं, भूल सुधार की है।

हां, 'टेलीग्राफ' की निजी निराशा उसकी हेडलाइन में साफ दिखी, जिसका भावार्थ है बदले और हमले की भूख पूरी हो गई, अब संभलकर। भारत के दावे के साथ-साथ पाकिस्तान के पक्ष को भी बराबर अहमियत दी है।

खैर, कमियां किस घर में नहीं होती? अब कोई सवाल करे, शंका जताए, लाशें गिनवाए, लेकिन जिनका सीना छलनी हुआ था पुलवामा से, उनकी आत्मा को कुछ शांति मिली है। अनेकता में एकता, यही तो हिंद की विशेषता है। कुछ इस बात पर शर्मिंदा हैं कि अफ़ज़ल के ‘क़ातिल’ जिंदा हैं-तो कुछ को अब नाज़ है पुलवामा का क़ातिल बरबाद है!

(ये लेखिका के निजी विचार हैं)



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