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इंडिया टीवी के पत्रकार ने बताया- टीवी जर्नलिस्ट पर कैसा होता है थर्ड डिग्री टॉर्चर का तनाव

Published At: Monday, 27 November, 2017 Last Modified: Monday, 27 November, 2017

हाइपर टेंशनब्लड प्रेशरडिप्रेशनशुगर और स्लिप डिस्क जैसी परेशानियां हर दूसरे टीवी जर्नलिस्ट में अब आम हो चली है। टीवी जर्नलिस्ट पर किस तरह दफ्तर से थर्ड डिग्री तनाव दिया जाता हैइंडिया टीवी के संवाददाता पुष्पेंद्र वैद्य की किताब ‘द ट्रूथ बिहाइन्डऑनएयर’ का एक अंश पढ़ कर समझा जा सकता है कि ये थर्ड डिग्री टॉर्चर का तनाव कैसे होता है। पत्रकार द्वारा फेसबुक पर शेयर किया गया किताब का यह अंश सोशल मीडिया पर अब तेजी से वायरल हो रहा है, जिसे आप नीचे पढ़ सकते हैं-

टीवी जर्नलिस्ट पर थर्ड डिग्री टॉर्चर

पूरे दिन शूटस्क्रिप्टस्टोरी आइडियाकॉन काल और खबरों की भीड़ के बाद रात करीब साढ़े 11 बजे ही घर लौटा था। बात 11 अप्रैल 2016 की है। मैं सेहत की खातिर  आमतौर पर देर रात खाना नही खाता हूं। लेकिन उस दिन सुबह के टिफिन के बाद व्यस्तता के चलते पूरे दिन पेट में सिवाय ग्रीन टी के कुछ भी नहीं गया था। शाम होते-होते ही मानसिक थकान इतनी ज्यादा हो गई थी कि पेट में बड़े-बड़े चूहे दौड़ रहे थे। नियम तोड़ते हुए मैने घर आते ही खाना खाया और अपने फ्लैट के सामने कैम्पस में ही टहलने लगा। इसी दौरान रात करीब सवा बारह बजे विदिशा के सहयोगी अभिनव चतुर्वेदी का फोन आया। सरकोई एक्सीडेंट हो गया है ग्यारसपुर के पास। किसी लड़की की मौत हुई है। मुझे अभी पता चला है। उसका शव विदिशा ले आये हैं... मैंने कहा डिटेल पता करो।

देर रात पता चला कि जिसकी मौत हुई है उसका नाम वीनू पालीवाल है जो कि हार्ले डेविडसन पर सवार थी। वीनू बाइक राइडर थी। वह कश्मीर से कन्याकुमारी अपने साथियों के साथ जा रही थी। सुबह वह लखनऊ से निकली थी और भोपाल से पहले उसका विदिशा जिले में सड़क के अंधे मोड़ पर तेज रफ्तार की वजह से एक्सीडेंट हो गया। बाद में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। देर रात इस खबर में विजुअल एलिमेंट कुछ नहीं था। घटना स्थल पर बाइक अंधेरे में और शव मर्चुरी में था। मैंने उसी वक्त दफ्तर को खबर बताई और स्ट्रिंगर को अलर्ट कर दिया। दफ्तर ने कहा स्ट्रिंगर से खबर करवा लो। मैने स्ट्रिंगर से कहा कि सुबह घटना स्थल के शॉट्सवीनू के दोस्तों और पुलिस की बाइटमर्च्यूरीशव के लॉन्ग शॉट्स करके प्रॉयरटी पर भिजवा देना। यह सब करते हुए रात के दो बज चुके थे।

झपकी लगी ही थी कि अचानक दफ्तर की रात पाली वाले बॉस का फोन आया। इस खबर पर हमारे पास चलाने के लिये कुछ नहीं है। सुबह के पहले बुलेटिन में हेडलाइन चलाना है। मैंने उन्हें बताया कि आप वीनू के घर वालों और दोस्तों की जयपुर में उनके घर से बाइट करवा लीजिये और फेसबुक से फोटो ले लीजिये। मेरा फोनो ले लीजिये। मैं एक्सीडेंट की डिटेल जानकारी बता दूंगा। इतना सुनते ही साहब आगबबूला हो गये और बगैर कुछ सुनें उन्होंने मुझे सुनाना चालू कर दिया। घटना तुम्हारे यहां हुई है। तुमने कुछ नही भेजा और हमें बता रहे हो कि क्या करना है। इस तनातनी के चलते मेरी नींद टूट चुकी थी। मैंने लैपटॉप खोला और वीनू की फेसबुक से निकालकर तस्वीरें भेज दी।

सुबह के पांच-साढ़े पांच बजे थे कि फिर फोन घनघनाया- तुम्हारे यहां से घटना स्थल कितनी दूर है... मैंने कहा- यही कोई 90-100 किलोमीटर होगा... ठीक है बताते हैं। दस मिनट ही हुआ होगा और बड़े साहब (संपादक) का फोन आ गया। फोन की स्क्रीन पर नाम देखते ही मेरी नींद पूरी तरह गायब हो गई थी। साहब बगैर कुछ कहे सीधे मुझ पर बरसना शुरू हो गये। इतनी बड़ी खबर और हमारे पास अभी तक चलाने के लिये कुछ नहीं है। इस खबर में हाईप्रोफाइल लेडीहार्ले डेविडसन और मौत की कितनी बड़ी खबर छुपी है। आज देश की सबसे बड़ी खबर यही है और तुम घर में चादर ताने चैन की नींद सो रहे हो। उनकी गुस्से भरी तेज चिल्लाने की आवाज के आगे मेरा कुछ भी बोलना व्यर्थ था। ऐसे वाकये मेरे साथ कई बार हो चुके थे इसलिये मुझे पता था कि गलती हो या ना हो फिलहाल सुनने में ही समझदारी है।

टीवी पत्रकारिता में कई ऐसे बॉस होते हैं जो अपना बंदा फिट करने के लिये जानबूझकर किसी न किसी को निशाने पर ले लेते हैं। बस तलाश बहाने की होती है। साहब ने मुझ पर इस खबर को चूक जाने से लगाकर गंभीर लापरवाही के सारे आरोप हाथों हाथ मढ़ डाले। साहब ने तमतमाते हुए कहा कि एक घंटे में मुझे स्पॉट से वाकथ्रू चाहिए। याद रहे किसी और चैनल ने वाकथ्रू कर दिया तो समझो आज तुम्हारी खैर नहीं। मैं बुरी तरह तनाव में आ चुका था। तनाव इस बात का था कि लापरवाही के मनगढंत आरोप मढ़े जा रहे थे।

12 अप्रैल की अलसुबह इस फोन के बाद पसीना छूटने लगासिर की नसें मानों फटने लगी। मैंने इसी तनाव में बीच कैमरामैनड्राइवर को लाइनअप किया। जैसे-तैसे भागते-दौड़ते तैयार हुआ। ड्राइवर को बोला गाड़ी जितनी तेज चला सकते हो चलाओ... गाड़ी के चक्के पूरी रफ्तार से दौड़ रहे थे। लेकिन साहब थे कि मुझे हवा की गति से जाने की हिदायत हर 10 मिनट में देते हुए लोकेशन ले रहे थे। हादसे की एक-एक बारीकी के सवाल इस तरह कर रहे थे जिनके जवाब मेरे लिये शायद पूरे मामले की जांच के बाद भी मुनासिब नहीं थे। मैं विदिशा पहुंचा। हॉस्पिटल में वीनू का एक दोस्त जो कि दूसरी बाइक पर सवार थाउससे बात करने की कोशिश की लेकिन उसने मीडिया से दूरी बनाते बात करने से मना कर दिया। लेकिन साहब बार-बार फोन पर कहते रहे तुम कर क्या रहे होउसके दोस्त से ही तो सारी कहानी निकलेगी। तुम किसी तरह उसके मुंह में माइक डाल दो कुछ तो बोलेगा। तुम ठीक से कोशिश ही नहीं कर रहे होगे।

कुछ ही देर में साहब के खास दरबारी छोटे साहब को फोन आ गया। यार ‘तुम्हें तो रात में ही स्पॉट पर निकल जाना चाहिए था। ये बताओ पूरी घटना क्या है?’ अब छोटे साहब को कौन कहे कि मैंने सबकुछ रात में ही बता दिया था लेकिन हरी झंडी सुबह मिलीसाहब पूरी घटना पूछ रहे थेमन तो हुआ कि कह दूं सारी घटना लिख कर डेस्क पर भेज दी है आप पढ़ लोलेकिन साहब तो साहब हैं। मैंने आपाधापी के बीच काम रोककर 10 मिनट तक साहब को पूरी घटना बताई। घटना सुनते हुए अचानक साहब बोले- अरे तो भाई उसके घर वालेदोस्तरिश्तेदार कोई तो होगें उनसे बात करो। मैंने कहा सर ये लोग जयपुर के रहने वाले हैं और घटना के बाद भोपाल के लिये रवाना हो गये हैं... तो इन्हें पकडों ना यार कब तक पहुंचेंगे ये वहां। हां, सर मैं कोशिश कर रहा हूं यहां मौजूद उसके दोस्त से बात करने की... वो हादसे के वक्त उसके आगे ही चल रहा था। अरे यार तो उससे बात करो ना... सर वो बात नहीं कर रहे हैं... तो कैसे होगा यार... देखो 8 बजे के बुलेटिन का टाइम भी हो गया है... क्या चलाएगें अब। तुम समझते नहीं हो… सर पूछ रहे हैं बार-बार। अब मेरा ब्लडप्रेर और भी बढ़ता जा रहा था। वीनू के दोस्त से साहब के बताये मुताबिक दोबारा जबरन बात करने की कोशिश की तो उसने हमें झिड़क दिया... ‘कुछ तो शर्म करो यार तुम्हारे घर में कोई मर जाएगा तो तुम पहले उसकी शूटिंग कर इंटरव्यू दोगे क्या।’ वाकई शर्मिंदा तो हम भी थे लेकिन क्या करें। दफ्तर का तनाव इस कदर हावी था कि खबर के लिये कुछ भी करने पर आमादा थे। मर्चुरी के बाहर ही कुछ पुलिस अफसरों का टिक-टेक किया। इसी बीच हमने वीनू के दूसरे दोस्त को किसी तरह मना लिया। उसने हमसे कैमरे पर हादसे के बारे में बात की। हमने तुरंत छोटे साहब को बताया कि वीनू के एक दोस्त का टिक-टेक मिल गया है। छोटे साहब भी नाराज तो थे ही कहा हां ठीक है कर लिया तो भेज दो।

विजुअल बाइट भेजकर हम स्पॉट के लिये रवाना हो गये। तनाव के कारण मेरी सांसे फूल रही थी। पानी पी-पी कर पसीना पोछता जा रहा था। स्पॉट पर पहुंचे... पूरी घटना को कैमरे पर बताया। लेकिन बदकिस्मती देखिये यहां इंटरनेट नहीं था। हम कुछ जुगाड़ करते इससे पहले ही फिर बड़े साहब का फोन आ गया... मैंने कहा सर शूट तो हो गया है लेकिन यहां इंटरनेट नहीं है। वे गरजे- ‘अच्छा ये भी ठीक बहाना है। आजकल गांव-गांव इंटरनेट हो गया है और तुम्हें इंटरनेट नहीं मिल रहा है।’ फिर ढेर सारी धौंस के साथ तल्ख अंदाज में कहा गया कि ऐसे काम करोगे तो हमे सोचना पड़ेगा।

मैंने ड्राइवर से कहा फिर विदिशा की तरफ गाड़ी दौड़ाओ... माइल स्टोन पर लिखा था विदिशा 32 किलोमीटर... गाड़ी हवा से बाते कर रही थी पर मेरा मन बहुत विचलित था। सिर की नसे चटक रही थी... दिमाग गुम हो गया था... शरीर थक कर चूर हो रहा था और आंखे नींद की वजह से भारी-भारी हो रही थी। मैं भीतर ही भीतर खुद से बाते कर रहा था आखिर टीवी में ये मारकाट के मायने क्या हैं... कुछ दिनों पहले जब ट्रैक्टर-ट्रॉली पलटने पर पांच ग्रामिणों की मौत की खबर दी थी तो उसे जगह मिलना तो दूर टिकर तक नहीं चलाया गया... क्या मीडिया भी अमीर-गरीब में फर्क करता है और वह सिर्फ हाईप्रोफाइल लोगो के लिये ही है। मीडिया का भटकाव और रिपोर्टर्स पर तनाव का थर्ड डिग्री टॉर्चर ही पत्रकारिता है... क्या मैं यही करने आया था... सवाल-दर-सवाल कौंध रहे थे। मुझे खुद पर ही कोफ्त हो रहा था।

दोपहर तक खबर ऑन एयर थी। बड़े साहब का फोन आया... मैंने बहुत बुझी आवाज में हैलो किया... उधर से आई आवाज में इस बार तल्खी के बजाय खनक थी... देखा किसी चैनल के पास रिपोर्टर का स्पॉट से वाकथ्रू नहीं था सिवाय हमारे... उनकी बातों में रिपोर्टर की मेहनत का कोई मोल नहीं था बल्कि खुद की तारीफ की ठसक थी।

(साभार: पुष्पेंद्र वैद्य की फेसबुक वॉल से)

 


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