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जिन्ना पुण्यतिथि: कुलदीप नैयर का अलग नजरिया, वीरेंद्र ने माना आधुनिक भारत के रचियता

Published At: Tuesday, 11 September, 2018 Last Modified: Tuesday, 11 September, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की आज बरसी है। उनका निधन 11 सितंबर, 1948 को कराची में हुआ था। जिन्ना भारतीय राजनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। उनके नाम पर जब तब विवाद होता रहता है, कुछ वक्त पहले अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उनकी तस्वीर को लेकर खूब हंगामा हुआ था। जिन्ना की वजह से कई नेताओं की सियासत खत्म हो गई, तो कई की राजनीति जिन्ना के नाम पर ही चमकी।

जिन्ना के बारे में कहा जाता है कि वो कट्टरवादी थे और भारत को नफरत की नजर से देखते थे। हालांकि, स्वर्गीय वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का सोचना अलग था। भारत और पाकिस्तान के बीच मधुर रिश्तों के पक्षधर नैयर मानते थे कि जिन्ना काफी सुलझे हुए इंसान थे और दोनों मुल्कों में भाईचारे की भावना रखते थे। 2006 में हरिद्वार प्रेस क्लब की नवगठित कार्यकारिणी के शपथ ग्रहण के मौके पर आयोजित संगोष्ठी में कुलदीप नैयर ने बताया था कि जिन्ना से उनकी मुलाकात लाहौर के एक कॉलेज में हुई थी, जहां वो बंटवारे की प्रक्रिया के दौरान आए थे।

नैयर भी उसी कॉलेज में पढ़ते थे और उन्हें मोहम्मद अली जिन्ना से सवाल पूछने का मौका भी मिला। इस दौरान उन्होंने पूछा था कि बंटवारा होने पर दोनों देशों के संबंध कैसे होंगे? इस पर जिन्ना ने कहा था कि ‘ये छोटे और बड़े भाई की तरह होंगे, एक दूसरे के सुख दुख के साथी बनेंगे। यदि कोई तीसरा देश हिन्दुस्तान पर हमला कर देता है तो पाकिस्तान की सेना आगे बढ़कर हिन्दुस्तान के लिए लड़ेगी’। नैयर मानते थे कि यदि जिन्ना लंबे समय तक पाकिस्तान की कमान संभालते, तो शायद दोनों मुल्कों के बीच इतनी तल्खी नहीं होती।

वैसे, जिन्ना और भारत को लेकर उनकी भूमिका पर कई किताबें भी लिखी जा चुकी हैं। पिछले साल ‘रिटर्न ऑफ दि इंफिडेल’ नाम से एक किताब बाजार में आई थी, जिसे अंग्रेजी समाचार पत्र द हिंदू के कंसल्टिंग एडिटर और वरिष्ठ पत्रकार वीरेन्द्र पंडित ने लिखा है। यह किताब संभवतः कुलदीप नैयर की सोच से जुदा है और इतिहास की एक नई तस्वीर पेश करती है। किताब कहती है कि महात्मा गांधी नहीं बल्कि जिन्ना आधुनिक भारत के रचियता थे। इसके पीछे पंडित ने बाकायदा तर्क भी दिए हैं और वो ये हैं कि यदि जिन्ना मुसलमानों के लिए एक अलग राष्ट्र की मांग पर अड़े नहीं रहते तो साल 2050 तक अविभाजित हिन्दुस्तान में मुसलमानों की आबादी 75 करोड़ हो जाती और यह विश्व में सबसे बड़ा मुस्लिम देश बन जाता। इस लिहाज से जिन्ना एक महान हिन्दुस्तानी थे, जिन्होंने हिन्दुस्तान को हिन्दुस्तान ही रहने दिया, उसे मुस्लिम देश होने से बचा लिया।

किताब के अध्याय ‘द पाइप्ड पाइपर’ में कहा गया है कि जिन्ना में हर वो खूबी थी जो उनके अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी यानी महात्मा गांधी में नहीं थीं। हालांकि जिन्ना और गांधी का समीकरण एक और एक, दो का था, दोनों मिलकर एक दूसरे को पूरा करते थे और वो उस कहानी के प्रमुख किरदार थे जिसमें हिन्दुस्तान में इस्लाम का उत्थान और पतन हुआ।

वीरेन्द्र पंडित यहां तक मानते हैं कि महात्मा गांधी ने यह दिखावा किया था कि वह बंटवारे के हक में नहीं थे लेकिन कहीं गहराई में उन्हें इस बात को लेकर संतोष था कि बंटवारे के बाद हिन्दुस्तान एक ऐसा देश होगा जो अपनी हिन्दू विरासत और मूल्यों के अनुसार जीवन जी सकेगा। गांधी ने जिन्ना को पाकिस्तान की मांग करने के लिए प्रोत्साहित किया और इसके गठन के साथ ही हिन्दुस्तान का मध्ययुगीन काल समाप्त हो गया।

बहरहाल यह चर्चा का विषय है और हमेशा चर्चा का विषय ही रहेगा कि भारत और पाकिस्तान का बंटवारा दोनों मुल्कों की बेहतरी के लिए था या इसमें जिन्ना की क्या भूमिका थी या जिन्ना को भारत में किस रूप में देखा जाए? इतिहास और उससे जुड़े किरदारों को लेकर हर किसी के अपने अलग विचार और सोच होती है। जैसी कि कुलदीप नैयर की थी या वीरेन्द्र पंडित की है।



पोल

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