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सोशल मीडिया जहां ट्रेलर है, वहीं पुस्तकालय पूरी फिल्म है: पूरन डावर

Monday, 09 April, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो।।

पुरानी पीढ़ियां किताबों को अपना दोस्त समझती थी। बुजुर्गों की मानें तो पहले के लोग दिन के कई घंटे पुस्तकालय में गुजार देते थे। लेकिन आज की युवा पीढ़ी किताबों से बहुत दूर हो चुकी है। इस पीढ़ी के कई युवा ऐसे भी हैं, जिन्होने पुस्तकालय का दरवाजा तक नहीं देखा। बदलते दौर में आज लाइब्रेरी को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, जिसके लिए पाठक को सजग रहना है, इसी उद्देश्य से आराधना संस्था द्वारा पालीवाल पार्क स्थित जॉन्स पब्लिक लाइब्रेरी में शनिवार को एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। 

किताबें झांकती हैं, बंद अलमारी के शीशों से.. गुलजार द्वारा कहीं गई यह लाइनें आज के दौर में सार्थक साबित हो रही हैं। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि के तौर पर पधारे शहर के जाने-माने उद्योगपति और समाजसेवी पूरन डावर ने कहा कि सोशल मीडिया जहां एक ट्रेलर की तरह है,  तो वहीं पुस्तकालय पूरी फिल्म की मानिंद है। उन्होंने नगर निगम से इसके सरंक्षण हेतु अंगीकृत होने पर बाह्य व्यवस्था आगरा डवलपमेंट फाउंडेशन और आंतरिक व्यवस्था आराधना संस्था को देने की भी घोषणा की। श्री डावर ने कहा कि एक जमाना था जब घंटाघर और लाइब्रेरी हर शहर की शान होती थी। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया से जहां आप किसी भी विषय पर सतही जानकारी प्राप्त करते हैं, तो किताबों के जरिए आप गहन अध्ययन कर पूरा ज्ञान अर्जित करते हैं।

संगोष्ठी का विषय प्रवर्तन करते हुए संस्थाध्यक्ष पवन आगरी ने कहा कि एनरॉयड फ़ोन और इंटरनेट की दुनियाँ में लाइब्रेरी अपने पाठकों की बाट जोह रही है, जो कि चिंताजनक है।

संगोष्ठी का बेहतरीन संचालन करते हुए संस्था महासचिव डॉ ह्रदेश चौधरी ने कहा कि लाइब्रेरी में युवा पीढ़ी का रुझान रुचिकर किताबों के माध्यम से ही संभव है।

मुख्य वक्ता के रूप में पधारे ऑनलाइन मीडिया एक्सपर्ट अभिषेक मेहरोत्रा ने कहा कि आज सोशल मीडिया और लाइब्रेरी एक दूसरे के पूरक बन चुके हैं और जो खतरा पुस्तकों पर इंटरनेटी दुनिया की वजह से मंडरा रहा था वो काफी हद तक अब टल चुका है। आज की सोशल मीडिया के दौर में मैं मानता हूं कि हमारी पढ़ने की आदत खत्म नहीं हुई है, सिर्फ रूप बदला है। पर जब यहां विषय लाइब्रेरी का है तो मेरा मानना है कि जैसा कि डार्विन थ्योरी कहती है कि सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट। तो अब समय आ चुका है कि हमारी पारंपरिक लाइब्रेरीज को मॉर्डन और अपडेट होना पड़ेगा। देश में कुछ पुस्तकालय ऐसे भी रहे हैं, जिन पर हम सभी को नाज़ होना चाहिए. मसलन करनाल का पाश पुस्तकालय, जिसे पुलिसकर्मी आम लोगों के लिए चलाते थे. यह अपने आप में ऐसा इकलौता पुस्तकालय था, जिसके एक हजार आजीवन सदस्यों में से सात सौ सदस्य पुलिस वाले थे. इसे करनाल पुलिस के जवानों ने उग्रवादियों से लड़ते हुए शहीद हुए अपने चार साथियों की याद में बनाया था. बाद में यहाँ एक मेडिकल कॉलेज खोलने को लेकर काफी विवाद हुआ. ठीक ऐसे ही रेड लाइट एरिया में रहने वाली महिलाओं के लिए बिहार के मुजफ्फरपुर में एक महिला द्वारा जुगनू नामक पुस्तकालय चलाया जाता था. कहने का मतलब है कि जब व्यक्तिगत प्रयासों से इतने अच्छे पुस्तकालयों को आकार दिया जा सकता है, तो फिर सरकार के पास तो पर्याप्त संसाधन हैं.

आगरा डेवलपमेंट फाउंडेशन के के.सी.जैन के कहा कि लाइब्रेरी अध्ययन करने के साथ-साथ विचार विमर्श का भी केंद्र होती है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया गंभीर चिंतन करने का प्लेटफॉर्म नहीं है।

संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राजेन्द्र मिलन और विशिष्ट अतिथि के सी जैन ने पुस्तकालय संरक्षण हेतु की जा रही आराधना संस्था की इस पहल की सराहना की।

धन्यवाद ज्ञापन संस्था उपाध्यक्ष संजय बैजल ने किया। इस अवसर पर संस्था के घरों से एकत्रित करीब 200 साहित्यिक पुस्तकें भी जॉन्स पब्लिक लाइब्रेरी को उनके लाइब्रेरियन राजीव सिंह के माध्यम से दान दी गईं।

संगोष्ठी में आनंद राय, डॉ यशोयश, शैलेन्द्र नरवार, धनवान गुप्ता, ज्ञानेश शर्मा, अंजलि स्वरूप, रश्मि गुप्ता, रेनू गर्ग, संगीता अग्रवाल, दीप्ति भार्गव, अलका अग्रवाल, अर्चना सिंघल, मीना सिंह, पूनम द्विवेदी, कुसुम रावत, मीरा देवी, नीलम गुप्ता, प्रेमलता मिश्र, भावना मेहरा, ललिता करमचंदानी, पूजा अग्रवाल, मनीषा बघेल प्रमुख रूप से मौजूद थे।




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