जो लोग टेलिविजन नहीं समझते हैं, वही ऐसी बात कर सकते हैं: सुप्रिय प्रसाद, आजतक

Monday, 05 March, 2018

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

'इंडिया टुडे' और 'आज तक' के फेसबुक लाइव कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई और हिंदी न्यूज चैनल 'आजतकके मैनेजिंग एडिटर सुप्रिय प्रसाद ने हाल के दिनों में फिल्‍म अभिनेत्री श्रीदेवी की मौत के बाद मीडिया की व्‍यापक कवरेज को लेकर चर्चा की और तमाम सवालों के जवाब दिए।


राजदीप सरदेसाई का कहना था कि श्रीदेवी सुपर स्‍टार थीं। वह लाखों दिलों की धड़कन थी और अपनी अदाकारी के दम पर फिल्‍म इंडस्‍ट्री पर राज करती थीं। ऐसे में जब दुबई के एक होटल में मात्र 54 वर्ष की उम्र में पिछले दिनों उनकी मौत हो गई तो तमाम तरह के सवाल उठे। पहले यह खबर आई कि दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हुई है। बाद में यह स्‍पष्‍ट हुआ कि शराब के नशे में बाथटब में डूबने से उनकी मौत हुई है। जो भी हो, श्रीदेवी की मौत कई दिनों तक मीडिया की सुर्खियां बनी रही और मीडिया ने लगभग सभी एंगल से इस घटना पर स्‍टोरी कीं।


कुछ मीडिया संस्‍थान तो कवरेज के मामले में कुछ ज्‍यादा ही आगे बढ़ गए और होटल के रूम से बाथटब तक न जाने कहां-कहां से कौन-कौन सी स्‍टोरी निकाल लाए। ऐसे में कार्यक्रम के जरिय सरदेसाई ने सुप्रिय प्रसाद से जानना चाहा कि क्‍या इस मामले में मीडिया ने अपनी सीमाओं से बढ़कर कवरेज की और इसे कुछ ज्‍यादा ही विस्‍तार दिया।


सरदेसाई ने यह भी पूछा कि 'आज तक' चैनल पर प्रसारिता कार्यक्रम की जो एक इमेज, जो सोशल मीडिया पर काफी चली कि 'मर्डर इन बॉथ टब' या चैनल ने बाथटब की जो पिक्‍चर दिखाई है तो लोग कहने लगे हैं कि देखिए चैनल ने श्रीदेवी की मौत को मसाला बना दिया।सरदेसाई के सवाल के जवाब में सुप्रिय प्रसाद का कहना था, 'पिछले दिनों यही खबर सबसे ज्‍यादा चर्चा में थी। लोग इस घटना के बारे में जानना चाहते थे। ऐसे में लोगों को जब ये सूचना मिली कि बाथटब में डूबने से श्रीदेवी की मौत हुई है तो उनके अंदर इस बारे में और विस्‍तार से जानने की उत्‍सुकता पैदा हो गई कि आखिर कैसे मौत हुई, पुलिस किस तरह की जांच कर रही है आदि।'


सुप्रिय प्रसाद का कहना था, 'हमारा चैनल 'आज तक' पूरे देश में देखा जाता है। ग्रामीण क्षेत्र हों अथवा शहरी, यह सबकी पसंद बना हुआ है। चूंकि बाथटब को लेकर सवाल उठ रहे थे और हर आदमी को ये नहीं पता कि आखिर बाथटब होता क्‍या है, कैसे कोई इसमें डूबकर मर सकता है। इसलिए उनके चैनल ने न सिर्फ बाथटब पर स्‍टोरी की बल्कि लोगों को इसके बारे में विस्‍तार से जानकारी दी। मुझे लगता है कि टेलिविजन पर किसी चीज को विजुअल दिखाना कोई बुराई नहीं है, खासकर जब वह बड़ी खबर हो और लोग इससे जुड़े हर पहलू कोे बारे में जानना चाहते हों। इसे गलत तरीके से भी नहीं पेश किया गया और जो लोग टेलिविजन नहीं समझते हैं, वही ऐसी बात कर सकते हैं।'


राजदीप द्वारा यह पूछे जाने पर कि जब श्रीदेवी की मौत की खबर आई और सभी को लगा कि दिल का दौरा (कार्डियक अरेस्‍ट) से उनकी मौत हुई है ऐसे में चैनल्स श्रीदेवी को लेकर अन्‍य फिल्‍म स्‍टार की तरह पुराने गाने आदि चलाने लग गए थे। इस पर सुप्रिय प्रसाद का कहना था कि उनके चैनल पर ह्दयरोग विशेषज्ञ डॉ. त्रेहन को बुलाया गया था और उनसे कार्डियक अरेस्‍ट पर काफी बातचीत की गई थी ताकि लोग जान सकें कि यह होता क्‍या है और इससे कैसे मरीज की जान जा सकती है। इत्‍तेफाक से जब मशहूर गायिका लता मंगेशकर का फोनो चल रहा था त‍ब उन्‍होंने भी डॉ. त्रेहन से इसके बारे में काफी चर्चा की।


सुप्रिय प्रसाद ने आगे कहा, दरअसल, लोग डरे-सहमे भी थे और परेशान भी आखिर मात्र 54 साल की उम्र में कैसे श्रीदेवी का निधन हो गया। लेकिन जब पोस्‍टमॉर्टम रिपोर्ट में यह स्‍पष्‍ट हुआ कि श्रीदेवी की मौत कार्डियक अरेस्‍ट से नहीं बल्कि बाथटब में डूबने से हुई है तो फिर लोग इसके बारे में जानने के लिए व्‍याकुल हो उठे। ऐसे में हमने तो उस होटल के कमरे से मिलती-जुलती तस्‍वीर दिखाकर या बाथटब दिखाकर ये बताने की कोशिश भी की कि बाथटब कैसा था और किस तरह उसमें कोई डूब सकता है।


राजदीप का कहना था कि कई लोग आरोप लगा रहे हैं कि यह एक तरह से न्‍यूज की मौत है। चैनलों ने एक तरह से न्‍यूज को खत्‍म कर दिया और सिर्फ सनसनी फैलाने के लिए इस तरह की खबरें दिखाई गईं ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा टीआरपी बटोरी जा सके। इस पर सुप्रिय प्रसाद ने कहा, 'आज तो लोग टीआरपी की बात कह रहे हैं लेकिन जब प्रसिद्ध अभिनेता अमिताभ बच्‍चन फिल्‍म 'कुली' की शूटिंग के दौरान घायल हुए थे, उस समय तो कोई चैनल नहीं था, तब भी इसकी कवरेज बहुत हुई थी। लगभग सभी अखबारों ने इस खबर को उस दिन लीड लगाया था और पूरे देश में सिर्फ अमिताभ बच्‍चन की ही चर्चा हो रही थी। ऐसे में यह कहना तो बिल्‍कुल गलत है कि ये सब टीआरपी के लिए किया गया। यह तो स्‍वाभाविक प्रक्रिया थी क्‍योंकि लोग इस बड़ी खबर के हर पहलू से रूबरू होना चाहते थे।'


सुप्रिय प्रसाद के जवाबों से सहमत न होते हुए सरदेसाई का कहना था कि यह सिर्फ लोगों को जानकारी देने का मामला नहीं था। अपने घर में काम करने वाली लड़की का उदाहरण देते हुए सरदेसाई ने कहा कि वह लड़की पूछ रही थी कि क्‍या श्रीदेवी की मौत शराब पीने से हुई थी, क्‍योंकि इस बात को टेलिविजन चैनल बता रहे हैं। सरदेसाई का पूछना था कि आखिर चैनलों को क्‍यों यह पूछने की जरूरत पड़ती है कि बोनी कपूर उस दौरान कहां थे, आखिर 15 मिनट बाद वह क्‍यों आए। क्‍यों नहीं चैनलों को सिर्फ दुबई पुलिस द्वारा दी गई जानकारी तक सीमित रहना चाहिए थे, अपनी तरफ से इस तरह के अनुमान अथवा सवाल क्‍यों उठाए गए?


इस पर सुप्रिय प्रसाद का कहना था, 'लोगों को शुरुआत में खबर पूरी तरह पता नहीं थी, ऐसे में लोगों के मन में तमाम तरह के सवाल उठ रहे थे और वे इसके बारे में पूरी जानकारी चाहते थे। इनमें कई सवाल तो ऐसे थे जिनमें लोग अपने मन में अनुमान लगा रहे थे। दुबई के 'गल्‍फ टाइम्‍स' और 'खलीज टाइम्‍स' से जो जानकारी मिल रही थी, वह लोगों तक पहुंचाई जा रही थी और लगभग सभी अखबार और चैनल ऐसा कर रहे थे। ऐसे में हम भी सभी पहलुओं को लेकर सटीक जानकारी देने का प्रयास कर रहे थे और इसमें सनसनी फैलाने वाली जैसी कोई बात नहीं थी। बहुत ही संवेदनशील तरीके से इस मामले को डील किया गया।'  


राजदीप का सवाल था कि क्‍या पूरी ब्रॉडकास्‍ट मीडिया ने इस मामले को संवेदनशील तरीके से लिया है या कंप्‍टीशन की वजह से हर चैनल इसमें थोड़ा सा मसाला डालना चाहता था, इस पर सुप्रिय का कहना था, 'हर चैनल का इस खबर को लेकर ट्रीटमेंट अलग-अलग हो सकता है लेकिन जब ये खबर मिली कि दो दिन हो गए हैं और श्रीदेवी का पार्थिव शरीर अब तक भारत नहीं आ सका था तो लोगों के मन में स्‍वभाविक रूप से यह सवाल उठ रहा था कि आखिर माजरा क्‍या है, कहीं इसके पीछे 'कुछ और' तो नहीं है। ऐसे में सभी चैनल अपने-अपने तरीके से और अपने सूत्रों के आधार पर इसके बारे में बता रहे थे लेकिन चैनल ने 'लक्ष्‍मणरेखा' पार नहीं की।'


प्राइवेसी का मुद्दा उठाते हुए सरदेसाई का कहना था कि यह बात अक्‍सर उठती है कि जब तक चैनलों के पास ठोस सूचना नहीं हो, खासकर किसी की मौत के मामले में तो इस तरह से सीमाओं से आगे बढ़कर मीडिया को कवरेज नहीं करनी चाहिए। सुप्रिय पसाद का कहना था कि यदि किसी व्‍यक्ति की मौत सामान्‍य परिस्थितियों में होती है तो कभी भी इस तरह के सवाल नहीं उठाए जाते हैं। यदि पहले दिन ही यह स्‍पष्‍ट हो जाता कि कार्डियक अरेस्‍ट की वजह से अभिनेत्री की मौत हुई है तो इस के सवाल उठते ही नहीं। आज जब सब कुछ स्‍पष्‍ट हो गया है तो कोई भी इस मामले में किसी तरह का सवाल नहीं उठा रहा है। खबरें जिस तरह से डेवलप होती जाती हैं, उन्‍हें ट्रीट करने का तरीका भी बदलता जाता है।


मामले की लगातार कवरेज के बारे में सुप्रिय प्रसाद का कहना था, 'जब भी इस तरह की बड़ी खबर होती है तो लगातार कवरेज होती है। इसका कारण ये भी है कि टेलिविजन को लोग कम देखते हैं। टेलिविजन चैनल देखने का जो औसत समय है वह एक शख्स के लिए 14 से 15 मिनट है। दिन भर में लोग सिर्फ 15 मिनट ही टीवी देखते हैं, यदि साप्‍ताहिक रूप से देखें तो परिवार में बहुत कम टीवी देखा जाता है। ये तो उन लोगों को लगता है जो टीवी से जुड़े हुए हैं कि लगतार कवरेज हो रही है। दरअसल, अलग-अलग समय पर टीवी देखने वालों के लिए इस तरह की कवरेज की जाती है और खबर के विभिन्‍न पहलुओं से अवगत कराया जाता है।'


सरदेसाई द्वारा यह पूछे जाने पर कि लोग इस तरह के सवाल उठा रहे हैं कि बिहार में हिट एंड रन की इतनी बड़ी दुर्घटना हुई, जिसमें नौ लोग मारे गए। इनमें भाजपा का एक नेता भी शामिल है, जो फरार है, आखिर टीवी चैनल इस खबर को इतनी प्रमुखता क्‍यों नहीं दे रहे हैं। जब जज लोया की मौत हुई और यह मामला उजागर हुआ, तब भी मीडिया ने इतने सवाल क्‍यों नहीं उठाए।


सुप्रिय प्रसाद का कहना था, 'ऐसा नहीं है, जहां तक भाजपा नेता की बात है तो चैनल ने सुबह करीब आधा घंटा और दोपहर में भी आधा घंटा इस पर कार्यक्रम दिखाया और पांच से छह बजे के बीच 'दंगल' शो में भी इस मुद्दे को उठाया गया। ऐसा नहीं है कि किसी खबर को किसी भी कारण से रोका जा रहा हो। जो खबर महत्‍वपूर्ण होती है, उसी हिसाब से उसे दिखाया जाता है। मुंबई में जब 26/11 का हमला हुआ था तो वे इतनी बड़ी घटना थी कि उसी समय जब पूर्व प्रधानमंत्री विश्‍वनाथ प्रताप सिंह की मौत की खबर आई, तो वे खबर किसी ने विस्‍तार से नहीं दिखाई और सिर्फ टिकर पर चलकर रह गई।'


कार्यक्रम के दौरान यह सवाल पूछे जाने पर कि इस मामले को मर्डर मिस्‍ट्री के रूप में देखा गया और उसी के अनुसार चैनल अपनी कवरेज करने लगे, सुप्रिय प्रसाद ने बताया कि शुरुआत में जब ये खबर आई कि श्रीदेवी के पार्थिव शरीर को कितने बजे अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा और कब उनका अंतिम संस्‍कार होगा, तब तक चैनल काफी सामान्‍य कवरेज कर रहे थे लेकिन जब इस तरह की बात आई कि जांच के लिए पब्लिक प्रॉसीक्‍यूटर को भेजा गया है और जांच के बाद शव भारत भेजा जाएगा और पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है तब चैनलों ने जो खबर लगातार अपडेट हो रही थी, उसी हिसाब से कवरेज दिखाई। इसमें ऐसा कुछ नहीं था, बल्कि चैनल तो इस कोशिश में थे कि लोगों तक ज्‍यादा से ज्‍यादा अपडेट दी जाए।


इसी दौरान ये सवाल भी पूछा किया कि आज इतने समय बाद क्‍या टेलिविजन एक तरह से टैबलॉयड अखबार की तरह बनकर रह गया है जो इस तरह की खबरों को प्राथमिकता देता है, सरदेसाई का यह भी कहना था कि उन्‍हें व सुप्रिय को टीवी में लगभग 25 साल हो गए हैं। उनका पूछना था कि क्‍या टीवी चैनल इसलिए इस तरह कवरेज करते हैं कि आखिर कौन सी खबर बिकती है, उसी हिसाब से कवरेज दी जाए। 


इस सवाल के जवाब में सु्प्रिय प्रसाद ने कहा, 'भारत में हमेशा से वॉलिबुड का वर्चस्‍त रहा है। लोगा इस इंडस्‍ट्री से जुड़ी खबरें देखना और पढ़ना चाहते हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ श्रीदेवी की घटना में इस तरह की कवरेज हुई हो पहले भी अमिताभ बच्‍चन की खबर हो या राम रहीम की, इस तरह की बड़ी खबरों को हमेशा प्राथमिकता दी जाती रही है। सुनंदा पुष्‍कर की मौत के मामले में भी चैनलों ने लगातार कवरेज की थी। जब भी कोई बड़ी घटना होती है तो उसी के अनुसार उसे कवर किया जाता है, ऐसी ही कवरेज भाजपा नेता प्रमोद महाजन हत्‍याकांड के समय की गई थी। इस मामले को लगतार तीन दिन तक कवर किया गया था। यही नहीं, तमिलनाडु में आई सुनामी को भी इसी तरह कवर किया गया था।'


कार्यक्रम के अंत में जब यह पूछा गया कि जब सेना का कोई जवान मरता है, तब भी क्‍या इसी तरह की कवरेज की जाती है, राजदीप सरदेसाई का कहना था कि इस तरह की तुलना करना ठीक नहीं है। जब सीमा पर गोलीबारी होती है, तो वहां पर भी रिपोर्टर कवरेज के लिए जाते हैं। उन्‍होंने कहा कि बॉर्डर पर जब भी कोई बड़ी घटना होती है, जैसे कि पिछले दिनों सर्जिकल स्‍ट्राइक हुई थी, उसे भी सभी चैनलों ने लगातार दिखाया था। इस पर सुप्रिय प्रसाद ने भी इस बात से सहमति जताते हुए पंजाब के पठानकोट में हुए आतंकी हमले का उदाहरण दिया। उनका कहना था कि चूंकि उस दिन दो जनवरी के कारण कई तरह के नए साल के कार्यक्रम थे लेकिन उन कार्यक्रमों को रोककर पठानकोट की कवरेज की गई।


इसके बाद सरदेसाई ने कहा, 'खबरों के ट्रीटमेंट को लेकर मेरा मत सुप्रिय प्रसाद से अलग है। मैं मानता हूं कि खबरों को टेलिविजन पर टैबलॉयड के अंदाज में नहीं दिखाना चाहिए जबकि सुप्रिय प्रसाद का मानना है कि खबरों के महत्‍व के अनुसार उसे अलग-अलग तरीके से देखा जाना चाहिए।' आखिर में सरदेसाई का कहना था कि लोग सिर्फ टेलिविजन की खबरों की बात करते हैं, वे ये नहीं जानते कि न्‍यूजरूम में खबरों को लेकर क्‍या स्थिति होती है। इस तरह की बड़ी खबरों में जो भी छोटी-छोटी बात निकलती है, वह भी लोगों के सामने रखनी पड़ती है।

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