क्यों गए सहारा से संजीव श्रीवास्तव ?

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समाचार4मीडिया.कॉम ब्यूरो

संजीव श्रीवास्तव अब सहारा परिवार का हिस्सा नहीं रहे, लेकिन अपने पीछे वे एक सवाल छोड़ गए हैं कि आखिर जिस लाव-लश्कर के साथ संजीव को यहां लाया गया था, वह किन कारणों के चलते चार महीनों के भीतर ही यहां से चला गया। सवाल खड़े होने की एक वजह और भी है कि संजीव श्रीवास्तव के काम को सराहा भी जा रहा था और अगर वे बेहतर काम कर रहे थे तो उन्हें जाना क्यों पड़ा?
 
मीडिया में एक बात हमेशा देखी जाती है कि जब भी किसी संस्थान में नए निजाम आते हैं, तो हमनवाजों का एक लश्कर भी साथ में आता है। सहारा में भी ऐसा हुआ। संजीव श्रीवास्तव जब बीबीसी से सहारा आए तो उनके साथ भी बीबीसी के उनके कई सहयोगियों ने सहारा की राह पकड़ी। इधर एक निजाम और थे स्टार न्यूज से आए उपेंद्र राय। उन्होंने भी अपने चहेतों को सहारा से जोड़ना शुरू किया और इसमें पहला बड़ा नाम था रजनीकांत। रजनीकांत स्टार में प्रोड्यूसर थे और उन्हें सहारा में एग्जीक्युटिव प्रोड्यूसर और आउटपुड हेड के तौर पर लाया गया। उपेंद्र चाहते थे कि सहारा के पांचो चैनल ( नेशनल, एनसीआर, यूपी, बिहार और एमपी) का आउटपुड हेड रजनीकांत को बनाया जाए। जबकि नेशनल के हेड के तौर पर यह सारी जिम्मेदारी पहले संजय बराग्टा देखते थे। उपेंद्र जब रजनीकांत को लेकर आए तो उन्होंने कहा कि संजय बराग्टा रजनीकात के अंडर में काम करेंगे।
 
संजय बराग्टा सहारा के पुराने आदमी हैं और पुण्य प्रसून एंड टीम के जाने के बाद चैनल की जिम्मेदारी वही देख रहे थे। जाहिर-सी बात है कि बाहर से किसी नए आदमी को उनके ऊपर लाना उन्हें नागवार गुजरेगा। संजय बराग्टा पहले बीबीसी में संजीव श्रीवास्तव के साथ काम कर चुके थे औऱ उनके संजीव से संबंध भी अच्छे हैं, इसलिए संजीव चाहते थे कि संजय बराग्टा नेशनल के हेड बने रहें और रजनीकांत उनके अंडर में काम करें। यहीं से उपेंद्र राय और संजीव श्रीवास्तव के बीच एक दरार पैदा होना शुरू हो गई।
 
रजनीकांत शुरुआत में बड़े ऐक्टिव दिखे, लेकिन कुछ दिनों बाद कमान संजय बराग्टा के हाथ में आ गई। उपेंद्र राय जिन लोगों को लेकर आ रहे थे उनमें से ज्यादातर लोग टीवी के अनुभव वाले थे। उपेंद्र सीएनबीसी आवाज से मयंक मिश्रा को लेकर आए तो उन्हें सहारा का बिजनेस हेड बनाया गया, अमर उजाला चंडीगढ़ के कार्यकारी संपादक देवेंद्र शास्त्री को लेकर आए, तो उन्हें कंटेट हेड बनाया गया। टेलीविजन का अनुभव रखने वाले ऋतेश वर्मा और उपेंद्र वर्मा को लेकर आए तो सहारा न्यूज चैनल में जगह मिली। लेकिन संजीव श्रीवास्तव जिन लोगों को लेकर आए उनमें से ज्यादातर लोग बीबीसी हिंदी वेबसाइट वाले लोग थे। पाणिनि आनंद और आलोक कुमार को जब बीबीसी से लाया गया तो उन्हें सहारा न्यूज चैनल में जिम्मेदारी देने की बात की गई थी। उपेंद्र राय का कहना था कि संजीव जिन लोगों को ला रहे हैं उनमें से ज्यादातर लोग वेब का अनुभव रखने वाले लोग हैं और उन्हें टीवी में जगह दी जा रही है। उप्रेंद्र राय ने अपनी यह बात सहारा प्रबंधन के सामने रखी तो जिन पाणिनी आनंद को सहारा न्यूज चैनल के लिए लाया जा रहा था उन्हें सहारा वेब पोर्टल का हेड बना दिया गया। फिर भी संजीव श्याम सुंदर और शिवकांत शर्मा जो कि बीबीसी वेबसाइट में थे उन्हें सहारा न्यूज चैनल में रखवाने में कामयाब हो गए।
 
इस पूरे प्रकरण के बाद सहारा प्रबंधन ने संजीव श्रीवास्तव के अधिकारों में कमी करते हुए यह नसीहत भी दी कि आप दोनों को साथ मिलकर काम करना है। उपेंद्र राय के बारे में कहा जाता है कि उद्योग जगत में उनकी अच्छी पकड़ है। अंबानी बंधुओ से उनके अच्छे संबंध हैं और इनकम टैक्स जैसे महकमों में उनकी पकड़ के चलते वे सहारा के लिए फायदेमंद साबित होते हैं। इसलिए सहारा प्रबंधन उनके पक्ष में ही रहा।
 
यह मनमुटाव धीरे-धीरे बढ़ते गए। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन्हीं मनमुटावों के कारण संजीव श्रीवास्तव और उपेंद्र राय के 14 साल पुराने रिश्ते कमजोर पढ़ने लगे। जब संजीव सहारा आए तो एक मीटिंग में उपेंद्र राय ने उनका परिचय कराते हुए कहा था कि संजीव श्रीवास्तव न केवल मेरे बड़े भाई हैं, बल्कि मेरे गार्जियन भी हैं और पिछले 14 सालों से ऐसा कोई दिन नहीं गया जब मैंने इनसे फोन पर बात न की हो औऱ सलाह न ली हो। जब हमने संजीव श्रीवास्तव से इस बारे में बात तो उन्होंने कहा कि सहारा में जो कुछ भी हुआ उसमें जो दुख मिला वह भी मेरा अपना है, जो सुख मिला वह भी मेरा अपना है। अपने जीवन के पचास सालों में मैंने कभी किसी को यह नहीं कहा कि वह बुरा है, वह अच्छा है। जो कुछ भी हुआ वह मैं व्यक्तिगत रूप से आपको बता सकता हूं, लेकिन इसे सामाजिक करने का कोई मतलब नहीं है  
(स्टोरी सहाराकर्मियों से बातचीत पर आधारित)
 
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जिस तरह से एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकती, एक पिजड़े में दो शेर नहीं रह सकते ठीक उसी तरह एक बड़ी कंपनी में दो दिग्गज एक साथ नहीं रह सकते है। आपकी खबर के माध्यम से मीडिया का एक और भयानक सच सामने आया है। पर सवाल यह उठता है कि जब मीडिया के लोग आपस में एक दूसरे के साथ सामंजस्य नहीं रख पा रहे है तो ये लोग अपने पेशे और समाज के साथ कैसे न्याय कर पायेंगे ?

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कहते है कि न्यूज चैनल कचरा, पत्रकार बंदर और संपादक मदारी है समाचार4मीडिया की यह खबर पढ़कर यह सभी बातें सच नजर आ रही हैं।