कहां गई हिन्दी की बाल पत्रिकाएं?
सुप्रिया अवस्थी
समाचार4मीडिया.कॉंम
बाल-पत्रकारिता की स्थिति एवं हिन्दी बाल-साहित्य की स्थिति प्रारंभिक काल से ही काफी सुदृढ़ रही है। आज हिन्दी का कोई भी ऐसा दैनिक या साप्ताहिक पत्र नहीं हैं, जिसमें बाल साहित्य को प्रमुखता से स्थान न मिलता हो। कई स्थापित पत्रिकाओं ने तो समय-समय पर बाल-साहित्य पर विशेषांक भी निकाले हैं। ये सारी बातें स्वयमेव बाल साहित्य की समृद्धि और सामर्थ्य की द्योतक हैं। लेकिन इन सब के बावजूद बाल-पत्रिकाओं के पाठकों की संख्या दिन, प्रति-दिन घटती जा रही है। इंडियन रीडरशिप सर्वे के आंकड़े भी बाल-पत्रिकाओं की दशा-दिशा पर सवाल उठा रहे है? इसलिए बाल-पत्रिकाओं की इस चिंताजनक स्थिति पर हमने राय ली, पत्रिका से जुड़े कुछ दिग्गजों से --
‘नेशनल बुक ट्रस्ट’ के एडिटर, पंकज चतुर्वेदी ने कहा, “बाल पत्रिकायें घट नहीं रही है, बल्कि इनकी प्रसार संख्या क्षेत्रीय स्तर पर कम हो रही है। भीलबाड़ा से एक बच्चों की पत्रिका निकलती है, हालांकि अच्छी मैगजीन है, पर अपने क्षेत्र तक ही सीमित होकर रह गयी है। वो फिर ‘चकमक’ हो या फिर ‘बाल हंस’। इसका मुख्य कारण यह भी है कि बड़े समूहों का पत्रिका के प्रकाशन में दखल कम हो रहा है और क्षेत्रीय दखल बढ़ रहा है। कुछ सरकारी पत्रिकाएं है उनकी भी यही दशा है। हालांकि ‘बाल भाषा’ एक ऐसी सरकारी पत्रिका है जिसकी रीडरशिप और सर्कुलेशन बहुत अच्छी है, लेकिन वहां एक अच्छे संपादक की कमी है।”
‘चंपक’ के प्रोडक्शन हेड, अवधेश कुमार झा ने कहा, “आजकल इलेक्ट्रॉनिक्स और एनीमेशन ने बहुत हद तक बच्चों की पत्रिकाओं पर अपना कब्जा कर लिया है। लेकिन ‘चंपक’ के मामले में यह कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि ‘चंपक’ ने हिंदी की सर्वश्रेष्ठ दस बाल-पत्रिकाओं में उपस्थित होकर यह साबित कर दिया हैं कि अब भी बाल-पत्रिकाओं को पढ़ने वाले पाठक उपलब्ध हैं। पहले की तुलना में अब पत्रिका पढ़ने वाले पाठकों में कमी आयी है।”
‘बालहंस’ के एडिटर, मनीष कुमार चौधरी ने कहा कि बाल-पत्रिकाओं की संख्या बिल्कुल नही घट रही है। हालांकि आईआरएस सर्वे में सिर्फ एक मैगजीन थी लेकिन इसका आंकलन इस बात से बिल्कुल नहीं लगाना चाहिए कि बाल पत्रिकाओं की संख्या घट रही है। इस समय ‘बाल हंस’ की रीडरशिप 17 लाख के उपर है जो यही दर्शाता है कि अभी भी मैगजीन पढ़ने वाले पाठकों की अच्छी संख्या है। इसका दूसरा कारण यह भी है कि बच्चों का रुझान अन्य कई क्षेत्रों में बढ़ रहा है और बच्चे अपने मनोरंजन की खुराक अब अन्य कई क्षेत्रों से लेने लगे हैं।”
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टिप्पणी
हिन्दी की पत्रिकाओं को
हिन्दी की पत्रिकाओं को सामाग्री में बदलाव लाना होगा पर यह बदलाव टीवी से प्रभावित नहीं होना चाहिए जैसा की आजकल हो रहा है। अखबारों में बच्चों का कोना होता तो है लेकिन 80% पेज पर विज्ञापन होते हैं और बाकी पेज पर पहेलियाँ, रास्ता खोजो और बिन्दु मिलाओ। सदियों पुराने कंटेन्ट को आखिर कब तक बेचोगे? आज बच्चे नया चाहते है तो इसका मतलब यह नहीं की उन्हें कुछ भी उल्टा सीधा दे दो। साहित्य अगर अच्छा होगा तो पढ़ा जाएगा। पश्चिम की दुनियाँ हमसे कहीं अधिक भौतिक है और टीवी विडियो की घुसपैठ कहीं व्यापक लेकिन आज भी हैरी पॉटर के ज़बरदस्त पाठक हैं। हाँ अगर आप इसे घटिया साहित्य मानें और खारिज कर दें तो यह आपकी समस्या है। थकी विषय वस्तुओं और पौराणिकता से बाहर निकालने की जरूरत है। बच्चों को समझें तो पत्रिकाएँ भी बिकेंगी।