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मीडिया उद्योग के बदलते हुए स्वरूप को परखें तो यह बदलाव सबसे ज्यादा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में देखा गया है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का स्वरूप और गति दोनों पूरी तरह बदल गई है। लेकिन लोग इस बदलाव को स्वीकार कर रहे हैं तो क्या यह मान लिया जाये कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का यह बदला हुआ स्वरूप ही मीडिया का सच है। । शायद नहीं, क्योंकि ऐसा मान लेने से हम मीडिया की परिभाषित भूमिका को नाकार देंगे। एक न्यूज चैनल और पत्रकार को जनहित और जनरुचि से जुड़े मुद्दों को दिखाना जरुरी है लिहाजा इन दोनों में तालमेल बेहद अहम है।
इस संदर्भ में शाज़ी जमा का मानना है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया को जिस चश्मे से देखा जा रहा है वह गलत है, उसे बदलने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हमें जनहित और जनरुचि दोनों का ख्याल रखना पड़ता है। राखी सावंत का डांस जनरुचि का विषय है और हम एक बार दिखाते हैं तो हमारी आलोचना होती लेकिन साथ ही हम जनहित के कई विषयों को भी दिखाते हैं जिसकी ओर कोई ध्यान नहीं देता या लोग भूल जाते हैं। टीवी में सबकुछ फ्रंट पेज होता है अखबारों की तरह इसमें सप्लीमेंट नहीं होता है। लिहाजा हम जो कुछ भी दिखाते उसका सीधा असर होता है।
मीडिया के इस बदले रूख से उन पत्रकारों की चिंता बढ़ती जा रही है, जो यह मानते हैं कि मीडिया का कार्य समाज को जागरूक करना, शिक्षित करना और सामाजिक सरोकारों के प्रति संवेदनशील बनाना है। लेकिन दूसरी ओर उन पत्रकारों की भी कमी नहीं है, जो बाजारीकरण के दौर में मीडिया को व्यवसाय के रूप में देख रहे हैं. इस बहस में सबसे महत्वपूर्ण बात यह आ रही है कि वर्तमान में मीडिया की क्या भूमिका हो?
रजत शर्मा ने बताया कि आज के समय में जहां भी देखों न्यूज चैनलों की हर कोई बुराई करता रहता है। उनका आरोप होता है कि न्यूज चैनल वाले कुछ भी दिखाते रहते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है उदाहरण के तौर पर देखिए कि 26/11 की घटना का न्यूज चैनलों ने 24 घंटें तीन दिन तक न्यूज चैनल पर लाइव दिखाया। न्यूज चैनलों पर इन तीन दिनों के दौरान कोई विज्ञापन देखने को नहीं मिला। क्या कोई इसका अंदाजा लगा सकता है कि चैनलों को इससे कितने रेवन्यू का घाटा हुआ होगा। और यह केवल न्यूज चैनलों में ही हुआ प्रिंट में नहीं।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एक खास मार्केट, रीजनल मार्केट जिसका उदय भी दिन दूनी और रात चौगनी गति से हुआ इसके साथ ही रीजनल मार्केट में ग्रोथ के नये आयामों को भी छुआ। लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का यह माध्यम भी आलोचनाओं से बच नहीं पाया। रीजनल चैनल पर यह आरोप लगा कि ये लोकल पार्टियां की तरह अफवाहें फैलाने के लिए होते हैं जो चुनाव के दौरान खरी कमाई करने लिए मैदान में उतरते हैं।
सुधीर चौधरी ने बताया कि कई बार ऐसी स्थितियों से इंकार नहीं किया जा सकता कि नेशनल चैनल रीजनल चैनलों पर निर्भर रहते हैं। उन्होंने अपनी बात मैंगलोर प्लेन क्रेश का उदाहरण देते हुए स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि इस स्टोरी के लिए नेशनल चैनल पूरे तरीके से रीजनल चैनलों पर निर्भर थे।
आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का जादू लोगों के सर चढ़कर बोल रहा है, इस बात में कोई संदेह नहीं। कल प्रिंट का जमाना था, आज इलेक्ट्रानिक का और आने वाले समय में हो सकता है दोनो को पीछे छोड़ते हुए वेब मीडिया कोसों दूर निकल जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
बोरवेल में गिरे बच्चे, निठारी कांड, रुचिका या आरूषी प्रकरण जैसे एक नहीं अनेक मामले हैं जिनमें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ही पर्दा उठाया और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने संज्ञान लेकर सरकारों को कदम उठाने पर मजबूर किया है। आगे भी इसका यह सफर जारी रहना चाहिए। वैसे भी मीडिया को प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है। चूंकि प्रिंट पहले था अत: वह घर के बुजुर्ग और मार्गदर्शक की भूमिका में है। इसके बाद इलेक्ट्रानिक मीडिया आया सो वह जवान है जिसके कांधों पर बहुत भार है रही बात वेब मीडिया की सो वह अभी शैशव काल में है, और आने वाले दिनों में मीडिया का भविष्य बनेगा। कुल मिलाकर आधुनिक युग में मीडिया का स्वरूप बदलेगा ही किन्तु इस बदलते स्वरूप में प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और वेब मीडिया तीनों ही भारतीय मीडिया घराने के ही अंग हैं, इन तीनों के बीच में फर्क करने का अधिकार किसी को भी नहीं है।
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