अखबारी कागजों के दाम बढ़े, तो क्या होगी प्रिंट मीडिया की हालत

समाचार4मीडिया.कॉम ब्यूरो

पिछले वर्ष अखबारी कागजों के दाम कुछ कम हो गए थे, अब फिर से बढ़ना शुरु हो गए हैं और अब इसके मूल्य 600 डॉलर प्रति टन के आसपास हो चुके हैं। इसके लिए कई वैश्विक मुद्दे जिम्मेदार हैं, जिसमें कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, चिली में विनाशकारी भूकंप और इसके परिणाम स्वरुप पेपर पल्प की दरों में वृद्धि, अखबारी कागजों की मांग में विश्व भर में वृद्दि और अमेरिका में अखबारी कागजों के मूल्य में वृद्दि होने से भारत में अखबारी कागजों का आयात महंगा हो गया। लेकिन, प्रिंट उद्योग पर इसका असर अभी तक नहीं पड़ा, क्योंकि डॉलर के मुकाबले रुपया की स्थिति अभी मजबूत है।
हालांकि, इंडस्ट्री में इस बात को लेकर आशांकायें जताई जा रही है, कि अगली तिमाही में अखबारी कागजों के दाम स्थिर हो पायेंगे।
 
 वर्तमान में अखबारी कागजों के दाम प्रति टन 575 से लेकर 600 अमेरिकी डॉलर के आस-पास है, जबकि, पिछले वर्ष जुलाई 2009 में यह 460 डॉलर प्रति टन था। विशेषज्ञों के अनुसार, अभी स्थिति इतनी खराब नहीं हुई है। हालांकि, एक बार अखबारी कागजों के दाम 1000 डॉलर प्रति टन के पार कर चुका है। इंडस्ट्री के लिए ऐसी स्थिति ठीक नहीं है। वर्तमान में अखबारी कागजों के मूल्य में वृद्धि के लिए जिम्मेदार कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर हम एक नजर डालते हैं।
 
कच्चे तेल और माल भाड़ा में वृद्दि
पूरे विश्व में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्दि हुई है, जिसका सीधा असर माल भाड़ा पर पड़ा। पिछले वर्ष, जब अखबारी कागजों के दाम में कमी आई थी, तब कच्चे तेल की कीमतें प्रति बैरल 40 डॉलर थीं, जो अब दोगुणा बढ़कर 80 डॉलर हो चुका है। सकाल समूह के उप महाप्रबंधक, कागज सामग्री, हेमंत दतार ने कहा, “कच्चे तेल के दामों में वृद्धि से अखबारी कागजों के आयात पर सीधा असर पड़ता है। पिछले वर्ष से कच्चे तेल के दामों में दोगुणी वृद्दि हो चुकी है। इसका असर अखबारी कागजों के मूल्य पर पड़ा।”
 
दूसरी तरफ, विश्व के कुछ हिस्सों में ग्लोबल आर्थिक मंदी के प्रभाव से उभरने के संकेत मिलते ही, तेजी से अखबारी कागजों के मांग में वृद्धि होनी शुरु हो गई। इस बीच, अखबारी कागजों के बड़े उत्पादक देश कनाडा और यूरोप में कई कागज मिलों के बंद होने से अखबारी कागजों के दाम में वृद्धि में हुई है।
 
चिली, चाइना और अमेरिका
चिली में 27 फरवरी को आए भूकंप से देश के जंगलों पर आधारित उद्योगों पर इसका असर पड़ा, जिसके कारण पेपर पल्प के दामों में वृद्धि हुई। चिली विश्व के 8 प्रतिशत पेपर पल्प का उत्पादन करता है, और बड़े पैमाने पर इन मिलों के नुकसान से वैश्विक स्तर पर इसके मूल्य पर असर पड़ा। उत्तरी अमेरिका बड़े पैमाने पर चिली के पेपर पल्प का उपयोग करता है। और पेपर पल्प के दाम में वृद्धि से अमेरिका के न्यूज़प्रिंट के मिलों को दाम बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ा। लोकमत समूह के विज्ञापन और व्यसाय निदेशक, ज्वलंत स्वरुप ने कहा, “चिली में भूकंप से वैश्विक स्तर पर पल्प के दामों में वृद्धि हुई है। पुनर्नवीनीकरण पल्प महंगा हो गया है और यह चिंता का एक बड़ा कारण है।”
 
स्वरुप ने आगे कहा, “प्रकाशन में भारतीय उद्योग अभी शुरुआती अवस्था में है और हमारे पास इसके अलावा कोई चारा नहीं है कि हम महंगे अखबारी कागज खरीदें और दूसरे अन्य खर्चों को कम करें।”
सकाल समूह के दतार ने इस पर कहा, “अमेरिका में प्रिंट मीडिया अच्छा नहीं कर रहा है और इस्तेमाल कागजों का फिर से उपयोग काफी कम है। पुराने समाचारपत्रों का पुर्नउपयोग नहीं हो पा रहा है। इसलिए, पुनर्नवीनीकरण पल्प की कीमतें 160 डॉलर प्रति टन से 230 डॉलर प्रति टन हो चुका है।”
 
 इसके अलावा पिछले कुछ महीनों में चीन में अखबारी कागजों की मांग में बेतहाशा वृद्धि हुई है। दतार ने अखबारी कागजों के मूल्य वृद्धि के कारणों को बताते हुए कहा, “वर्ष 2006-07 में चीन अखबारी कागजों के बड़े निर्यातकों में रहा है, लेकिन इसने पिछले साल से अखबारी कागजों के निर्यात से अपना हाथ खींच लिया है और अब बहुत कम मात्रा में चीन से अखबारी कागजों का निर्यात हो रहा है, जिसने भारतीय बाजार का विकल्प सीमित कर दिया है।”
 
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