राजनीतिक रिर्पोटिंग के बिना पत्रकारिता की कल्पना नहीं : एनके सिंह, मनोरंजन भारती, चंदन प्रताप सिंह, विनोद अग्निहोत्री

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सुप्रिया अवस्थी,
समाचार4मीडिया.कॉम
एक दौर था जब राजनीतिक रिपोर्टिंग पत्रकारिता की प्राण मानी जाती थी राजनीतिक खबरों के बिना किसी चैनल या उसके बुलेटिन की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। राजनीतिक खबरों को अन्य खबरों की तुलना में इसलिए भी अधिक महत्व मिलता रहा है क्योंकि इनके जरिए ही राजनीतिक तंत्र  को जनता के प्रति जवाबदेह और जिम्मेदार बनाया जा सकता है। लेकिन लगता है कि हिंदी समाचार चैनलों में राजनीतिक रिपोर्टिंग को पांच ‘सी’ (क्रिकेट,सिनेमा,सेलेब्रिटी,क्राइम,कॉमेडी) की नजर लग गई है। मुद्दा केवल राजनीतिक कवरेज में मात्रात्मक गिरावट का ही नहीं बल्कि राजनीतिक रिपोर्टिंग की गुणवत्ता का भी है क्योकि  हाल ही के बर्षो में राजनीतिक रिपोर्टिंग की न सिर्फ धार कुंद हुई है बल्कि वह उथली भी हुई है इसके क्या कारण हैं।
 
एन के सिंह, कंसल्टिंग एडिटर, साधना
राजनीतिक रिपोर्टिंग में समाज के प्रति जो सरोकार हुआ करता था अब वह बिल्कुल खत्म हो चुका है। अब जो लोग राजनीतिक रिपोर्टिंग में सिर्फ इसलिए आते हैं कि उन्हें पावर मिल जाए और उनका घर धन से भर जाए, न तो उन्हे संसद में होने वाली गतिविधियों से कोई मतलब है न ही जनता के सरोकारों से। राजनितिक रिपोर्टिंग में जो गंभीरता को उसको बिल्कुल अलग कर दिया गया है। कही न कही इसका कारण इंटरटेंमेंट की बढती रिपोर्टिंग और सतही ज्ञान भी है। इसको बदलना चाहिए और हम इस ट्रेड को परिवर्तित करने के लिए प्रयासरत हैं।
 
मनोरंजन भारती, राजनीतिक संपादक, एनडीटीवी इंडिया
पत्रकारिता की प्राण माने जानी वाली राजनीतिक रिपोर्टिंग में हाल ही के बर्षों में न सिर्फ धार कुंद हुई है  बल्कि वह उधली भी हुई हैं इसका एक ही कारण है कि मीडिया में जो नयी पौध आ रही है उसे पढने में बिल्कुल नहीं रुचि है और आज कल के रिपोर्टरों तो अखबार भी नहीं पढ़ते हैं। वे रिपोर्टिंग नहीं करते हैं आजकल वे सिर्फ इंवेंट को कवर करते है न उसके पास पेन होती है और न नोटपैड। इसलिए राजनीतिक पत्रकारिता में कोई गहराई नहीं होती है सबकुछ सतही स्तर पर हो रहा है।
 
चंदन प्रताप सिंह, राजनीतिक संपादक, टोटल टीवी
राजनीतिक पत्रकारिता तो सब्जी में आलू की तरह होती है इसकी धार कभी कुंद हो ही नहीं सकती है यह तो हमेशा ही सदाबहार है। लेकिन 1996-97 के बाद जो पत्रकारिता के कुकुरमुत्ते पैदा हो गए है इन्होंने राजनीतिक रिपोर्टिंग की परिभाषा ही बदल दी है।
कई चैनलों ने राजनीति पर अच्छी पकड़ रखने वाले पत्रकारों को फील्ड से हटाकर डेस्क पर बैठा दिया है। मुझे पूरा विश्वास है कि अगर आज भी संजय पोगलिया, आशुतोष और शैलेश कपास जैसे रिपोर्टर  फील्ड में आ जाए तो राजनीतिक रिपोर्टिंग की परिभाषा बदल सकती है। टीवी की राजनीतिक रिपोर्टिंग और रिपोर्टिंग की गंभीरता में जो गिरावट आई है उसके जिम्मेदार ये कुकुरमुत्ते से उगने वाले चैनल और नयी नस्ल के पत्रकार हैं जिन्हें पत्रकारिता का क ख ग भी पता नहीं है।
 
विनोद अग्निहोत्री, राजनीतिक संपादक, नई दुनिया
पहले खबर का मतलब सिर्फ राजनीतिक रिपोर्टिंग हुआ करता था लेकिन अब नयी पीढी की रुचि में परिवर्तन होने से खबरों में भी परिवर्तन आया है। अब समाज से जुड़ी हर बात खबर है फिर चाहे वो खेल, क्राइम, बिजनेस, कला, संस्कृति, विज्ञान हो। ऐसे में सिर्फ राजनीतिक रिपोर्टिंग को महत्व देना थोड़ा मुश्किल है।
राजनीतिक रिपोर्टिंग की बदहाली की जिम्मेदार आज की राजनीति भी हैं क्योंकि पहले आवाम राजनेताओं से प्रेरणा लेकर उनके बारे में पढना व उन्हें सुनना पसंद करती थी लेकिन अब न वो आवाम रही न राजनेता। और फिर टेलीविजन के दौर में भाग-दौड़ भरी जिंदगी के कारण अब राजनीतिक रिपोटिंग सिर्फ राजनेताओं के बयान तक ही सीमित रह गई है लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं हैं कि राजनीतिक रिपोर्टिंग करने वालों की धार कुंद पड़ गयी है। राजनीतिक रिपोर्टिंग को दर किनार करके कोई भी अखबार या न्यूज चैनल मीडिया में जीवित नहीं रह सकता है।
 
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