मीडिया में पूंजी का प्रवेश नई बात नहीं
दिलीप चेरियन, मीडिया विश्लेषक
वैश्विक स्तर पर हमने देखा है कि जब बड़ी पूंजी मीडिया में प्रवेश करती है तो उसका किस तरह से असर होता है, वास्तव में हम क्या कर रहे हैं, हम खुद को दोहरा रहे हैं।
आज, विश्व भर में मीडिया में अल्पाधिकार की प्रवृति दिखाई दे रही है, चाहे वह सिल्वियो बर्लुस्कोनी हो या रूपर्ट मर्डोक। सच्चाई यह है कि वे ना सिर्फ बड़े पैमाने पर मीडिया को प्रभावित करते हैं बल्कि राजनीति को भी प्रभावित करते हैं। क्या हम उसी रास्ते पर चल रहे हैं? इस समय, इसका जवाब हां लगता है। यह अच्छा है? इस प्रश्न का सार्वभौमिक जवाब नहीं है, क्योंकि यह ना सिर्फ समाचार की गुणवत्ता को प्रभावित करता है बल्कि यह राजनीति को भी उतना ही प्रभावित करता है।
इस तरह की डील में बड़े पैमाने पर पूंजी का प्रवेश कोई नया या कोई समाचार नहीं है। इस केस में, विदेशी निवेश और घरेलू निवेश में एक बड़ा फर्क है। क्योंकि 4जी के कारण, क्योंकि यही व्यावसायिक घराना, पाइप का मालिक है, कंटेंट का मालिक है, यहां एकाधिकार का एक अन्य मुद्दा हो सकता है। अगर मैं मालिक होता तो इस तरह की पारदर्शी व्यवस्था करता कि लोगों में किसी तरह का कोई संदेह ना रहे।
यहां चिंता का कारण है, सेल्फ रेगुलेशन की जरूरत है। एक देश के तौर पर हम दो कारणों से कानून बनाने में सक्षम नहीं है। पहला कारण, व्यावसायिक घरानों का योजनाओं को प्रभावित करना, दूसरा कारण वे राजनीतिज्ञ हैं जो मीडिया हाउसों के मालिक हैं। आप देख रहे हैं कि एक गठबंधन है जो जनता से निपटने में असमर्थ है। आप संसद में कभी नहीं देखेंगे कि वे अच्छी तरह से रेगुलेशन करें, क्योंकि खुले तौर पर सभी पक्षों का हित उसमें निहित है।
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