लगता था कि हम मुंबई में नहीं इराक में रिपोर्टिंग कर रहें हैं
किशोर मालवीय, कंसल्टिंग एडिटर, सीएनईबी, ने 26/11 हमले के दौरान मुंबई से लाइव रिपोर्टिंग की थी। समाचार4मीडिया से उन्होंने उस हमले का मंजर साझा किया
ताज होटल का जो माहौल था, वह बड़ा भयावह था। वहां पूरी बिल्डिंग से धुआं निकल रहा था और खिड़कियों से आग की लपटें निकल रहीं थी। रह-रह कर ग्रेनेड फटने और अंदर से फायरिंग की आवाजें आ रही थीं। बाहर पुलिस और मीडिया के लोग खड़े थे कि अचानक एक ग्रेनेड हमारे सामने आकर गिरा। एक पल को लगा कि आज जान नहीं बचेगी। हम लोगों को लेटने के लिए कहा गया और सब वहीं लेटे रहे। जब-जब विस्फोट होता था तो पूरा इलाका हिल जाता था। सारा दिन और रात यही मंजर रहा।
सबसे खतरनाक हाल, वहां नरीमन हाउस का था, जिसमें आतंकी घुसे हुए थे। नरीमन हाउस बहुत बड़ी बिल्डिंग नहीं है और वहां खाली जगह कम है। वह पुरानी दिल्ली जैसी जगह है। वहां बाहर खतरे का डर कम था, असली खतरा तो अंदर था। उसका एहसास तो अंदरवाले ही कर सकते थे। नरीमन हाउस के बगल वाली बिल्डिंग को पुलिस ने खाली करा लिया था। पुलिस के साथ हम कुछ मीडियकर्मी भी उसकी छत पर चढ़ गए। वहां खतरा बहुत अधिक था और हमें बताया गया कि हम फायरिंग रेंज में हैं। लेकिन किस्मत अच्छी थी कि आतंकियों ने बाहर निकल कर फायरिंग नहीं की और कोई ग्रेनेड भी नहीं फेंका। हम जिस मकान की छत पर थे, उसको नीचे से पूरा खाली करा लिया गया था। जब-जब विस्फोट होता था, मकान ऐसे हिलता था, जैसे गिरने ही वाला है। लगता था कि हम मुंबई में नहीं, इराक में रिपोर्टिंग कर रहें हैं।
मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह बताने की थी कि अंदर क्या हो रहा है और हम रिपोर्टर्स अंदर का मंजर जानने के लिए आतुर थे।
लेकिन अंदर क्या हो रहा है, उसके बारे में पुलिस को भी पता नहीं था। मुंबई पुलिस भी बाहर थी और मीडिया वही रिपोर्ट कर रही थी, जो वे कह रहे थे। सबसे बड़ी चुनौती थी कि सही और अंदर की सूचनाएं कैसे निकालें, कोई जानकारी देने वाला नहीं था। कमांडो कार्रवाई हो रही थी और कमांडो कार्रवाई में कुछ भी बता कर नहीं किया जाता। इस दौरान, कोई अंदर घुसने की भी कोशिश नहीं कर सकता था। सिर्फ कयास लगाए जा रहे थे, लेकिन संवेदनशील मामलों में आप कयास लगा कर ख़बर नहीं दिखा सकते। ऐसे में हमें जो सीधा-सीधा दिख रहा था, हम उसकी रिपोर्टिंग कर रहे थे। इस दौरान कभी डर नहीं लगा। लेकिन यह एक अलग तरह का अनुभव था, घबराहट जरूर होती थी।
26/11 के बाद मीडिया को कई सबक मिले। सबसे पहले, तो किसी संवेदनशील मामले को लाइव दिखाने से किस तरह का फायदा और नुकसान हो सकता है। मीडिया पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है, लिहाजा इन मामलों में रिपोर्टिंग में कैसे सावधानी बरते, यह भी समझ आया। 26/11 का हमला, मीडिया के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी, लेकिन भगवान न करे, मीडिया को उस तरह का दिन फिर देखना पड़े।
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