जम्मू-कश्मीर में क्षेत्रीय मीडिया और सरकार की भूमिका
समाचार4मीडिया.कॉम ब्यूरो
समाचार, विचार और सूचना के लिए क्षेत्रीय मीडिया की भूमिका को क्षेत्र विशेष में कम करके नहीं आंका जा सकता है। हालांकि, जब खबरों को बिना रूकावट और गहराई से विश्लेषण करना हो, रिपोर्टिंग में लापरवाही से बचने के लिए जो किसी क्षेत्र की शांति को प्रभावित कर सकता हो, खासकर अगर खबर जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य से जुड़ी हो तो हमें अच्छे संतुलन की जरूरत है।
यह उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर में सरकार ने जुलाई 2010 के प्रथम सप्ताह में खबरों की लापरवाह तरीके से रिपोर्टिंग के लिए तीन समाचारपत्रों को प्रतिबंधित कर दिया था और उनकी कॉपियों को जब्त कर लिया था। हालांकि, राज्य में शांति स्थापित करने के लिए यह कदम जरूरी था, इसके परिणामस्वरूप कई जख्म ताजे हो गए और कई प्रश्न उठने लगे – जम्मू-कश्मीर सरकार के निशाने पर स्थानीय मीडिया ही क्यों ? श्रीनगर जिला के कर्फ्यूग्रस्त इलाके में स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के साथ भेदभाव क्यों ?
जम्मू-कश्मीर से प्रकाशित दैनिक उर्दू समाचारपत्र रौशनी के संपादक जहूर अहमद शोरा के अनुसार, “दिल्ली के पत्रकारों को सभी सुविधायें दी जाती हैं। वे कर्फ्यूग्रस्त इलाकों से खबरें दे रहे थे, जब क्षेत्र में कर्फ्यू लगा हुआ था। सरकार और सुरक्षा बलों को क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के साथ एक जैसा व्यवहार करना चाहिए। सरकार के खिलाफ क्षेत्रीय समाचारपत्र प्रकाशकों का गुस्सा बढ़ गया है। सिर्फ कुछ स्थानीय समाचारपत्र ही नहीं, घाटी के प्रेस संगठन भी अपनी बैठकों में सरकार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।”
एक आपातकालीन बैठक में, कश्मीर प्रेस संगठन के कार्यकारी सदस्यों ने सुरक्षों बलों के द्वारा, मीडिया से जुड़े लोगों और फोटोजर्नलिस्टों के प्रति कड़े व्यवहार पर ऐतराज जताया। कश्मीर प्रेस संगठन के प्रेसिडेंट गुलाम हसन कालू ने आरोप लगाते हुए कहा, “राज्य सरकार के अधिकारियों के द्वारा दिए कर्फ्यू पास को सुरक्षा बल फाड़ देते हैं। राष्ट्रीय मीडिया पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है वे जहां जाना चाहते हैं जाते हैं। हालांकि, क्षेत्रीय मीडिया को ऐसा करने की अनुमति नहीं है। ”
कश्मीर प्रेस गिल्ड के प्रेसिडेंट, बसीर अहमद बसीर ने कहा, “सरकार औऱ सुरक्षा बल सीधे तरीके से आपको नहीं रोकते हैं, वे ऐसी परिस्थितियां पैदा कर देते हैं कि आप कुछ कर नहीं पाते हो। वे स्थानीय मीडिया को उखाड़ फेंकना चाहते हैं क्योंकि सरकार को इससे परेशानी होती है और वे नहीं चाहते हैं कि सच्चाई बाहर आये, क्योंकि उन्हें पता है कि सिर्फ क्षेत्रीय मीडिया ही सच्चाई को लोगों के सामने ला सकती है।”
तीन समाचारपत्रों पर लापरवाही से रिपोर्टिंग के लिए प्रतिबंधित करने के सवाल पर कालू प्रश्न उठाते हैं, “जबकि उक्त समाचार को कई प्रकाशकों ने प्रकाशित किया था, सिर्फ तीन समाचारपत्रों को ही क्यों प्रतिबंधित किया गया ?”
दैनिक रौशनी के संपादक शोरा ने जोर देते हुए कहा, “समाचारपत्रों को पाठकों को गुमराह नहीं करना चाहिए, लेकिन सही रास्ता के लिए मार्ग प्रशस्त करना चाहिए। हमारी कोशिश होती है कि अलगाववादी तत्वों के द्वारा फैलाये गए समाचार को कम से कम स्थान दें। हमें ऐसे समाचारों की उपेक्षा करनी चाहिए या काफी रिसर्च के बाद इसे प्रकाशित करना चाहिए। ”
इस बीच, तीन समाचारपत्रों पर प्रतिबंध से उनके राजस्व पर विपरीत असर पड़ा है। दो प्रतिबंधित समाचारपत्र, उर्दू दैनिक ‘कश्मीर उज्मा’ और अंग्रेजी दैनिक, ‘ग्रेटर कश्मीर’ के प्रिंटर और प्रकाशक राशिद मखबूनी का कहना है, “हम तीन दिनों तक समाचारपत्र का प्रकाशन नहीं कर सके और इससे हमारा विज्ञापन राजस्व 100 प्रतिशत प्रभावित हुआ। शिक्षा, ऑटोमोबाइल और टेलीकॉम क्षेत्र के हमारे राष्ट्रीय विज्ञापनदाताओं ने पिछले 15 दिनों से अपने सभी विज्ञापन रद्द कर दिये हैं। यहां तक कि सकार की ओर से भी विज्ञापन बंद हो गए हैं। इस दु:खद स्थिति में हम कैसे कार्य कर सकते हैं?”
सरकार ने बाद में माफी मांग ली है और प्रतिबंध को उठा लिया है, लेकिल स्थानीय समाचारपत्र प्रकाशक इससे खुश नहीं हैं। कश्मीर प्रेस संगठन के कालू ने कहा, “सिर्फ माफी मांग लेने से काम नहीं चलने वाला है, अधिकारियों को इसके लिए व्यावहारिक रूप से कार्य करने की जरूरत है। इस तरह के गलत व्यवहार से राज्य में समाचारपत्र के बिजनेस पर प्रभाव पड़ता है। अब, क्षेत्रीय समाचारपत्रों के पास कोई व्यवसायिक विज्ञापन नहीं है।”
कश्मीर प्रेस गिल्ड के बशीर ने इसमें जोड़ते हुए कहा, “हालांकि, सबसे बड़ा मुद्दा हमारे पाठकों के अपेक्षाओं पर खड़े उतरना है क्योंकि हम ऐसे समय में उनके पास नहीं पहुच पाते हैं, जब उन्हें हमारी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। हम लोग उनके पास ऐसे समय नहीं पहुंच पाते हैं, जब उन्हें विश्वसनीय समाचार की जरूरत होती है।”
इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष रखते हुए श्रीनगर के उपायुक्त एमए काकरू ने कहा, “हम मीडिया पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाना चाहते हैं, लेकिन इस बात को स्पष्ट रूप से प्रभावी बनाना चाहते हैं कि मीडिया प्रजातांत्रिक ढ़ंग से कार्य कर सकें। हम इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और सभी संबंधित मीडिया को स्वतंत्र रूप से कार्य करने की अनुमति देते हैं। लेकिन हां, श्रीनगर में कर्फ्यू के दौरान, हम लोगों ने स्थिति को देखते हुए उन्हें रिपोर्टिंग के लिए कर्फ्यू पास दिया था, लेकिन हम लोगों ने उन्हें कार्य करने की अनुमति प्रदान की थी।”
संवेदनशील स्थिति में समझदारी से निपटने की जरूरत होती है, और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में मीडिया को महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की जरूरत है, जहां एक लापरवाही भरा टिप्पणी या रिपोर्ट जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में आग में घी डालने का काम करता है। दूसरी ओर, सरकार को भी मीडिया के सभी भागों (स्थानीय, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय) को स्वतंत्र रूप से कार्य करने की अनुमति देनी चाहिए - जिससे सच्चाई बाहर आ सके और मीडिया को भी अधिक रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए।
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