भारतीय मीडिया का माइंडसेट पहचानना थोड़ा मुश्किल है - निक वाटर्स
समाचार4मीडिया.कॉम ब्यूरो
मुंबई में हुए एक्सचेंज4मीडिया कॉनक्लेव के पहले सत्र का विषय था- स्लीपिंग विद द एनमी : इज द एज ऑफ कोलैबोरेशन रियली हेयर। इस सत्र की अध्यक्षता की रिलायंस एडीए के संजय बहल ने की और चर्चा में भाग लिया माइंडशेयर एपैक के सीईओ आशुतोष श्रीवास्तव ने और एजिस मीडिया के सीईओ निक वाटर्स।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए संजय बहल ने कहा कि मीडिया में ड्रैमेटिक चेंज आ रहा है और आज हम ऐसे युग में पहुंच गए हैं, जहां मीडिया के बदलाव को सकारात्मक रूप में देखा जा रहा है। ऐसा नहीं कि मीडिया का यह बदलाव केवल इलेक्ट्रानिक मीडिया में ही हो रहा है, बल्कि इसे प्रिंट, रेडियो सिनेमा और डिजिटल हर जगह देखा जा रहा है।
अगर प्रिंट की बात करें, तो डेली न्यूज पेपर अब डेली मैगजीन का रूप लेते जा रहे हैं। लगभग दो-तिहाई सप्लीमेंट हर अखबारों के साथ बढ़ गए हैं। 20-22 पेज का अखबार आपको 3 से 4 रुपये में मिल रहा है। रेडियो की बात करें तो 150 शहरों में एफ.एम हैं। 100 से ज्यादा रेडियो चैनलों को लाइसेंस मिल चुका है और लगभग 100 चैनल लाइन में हैं।
सिनेमा के विस्तार को नंबर और उदाहरण से समझाने की जरूरत नहीं है। डिजटल मीडिया आज सभी मार्केटियर के लिए टूल बन चुका है। और सबसे ज्यादा ऐड वहीं पर लगाए जा रहे हैं। ऐसे में मीडिया के सभी अंगो के बीच तालमेल बहुत जरूरी है।
आशुतोष श्रीवास्तव ने अपनी बात रखते हुए कहा कि इंडस्ट्री में ऐसी बहस बहुत जरूरी है। पिछले कुछ सालों में सेवाओं की मांग बढ़ जाने के कारण विशेषज्ञता बढ़ गई है। और विशेषज्ञता बढ़ने से ही मीडिया एजेंसीज की मांग भी बढ़ी है। इसी प्रतिस्पर्धा के चलते यह सवाल उठने लगा है कि इसमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कौन है। क्रिएटिव एजेंसीज के आने से प्रतिस्पर्धा और भी बढ़ गई है। टकराव हर तरफ बढ़ रहा है। ऐसे में जो सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है वह है कॉस्ट फैक्टर। अगर सबसे सस्ता और बेहतर आपके पास है तो लोग आपके पास आएंगे नहीं तो कहीं और चले जाएंगे। यही न्यू मार्केटिंग रियलिटी है। इसके लिए सबसे जरूरी है कि आपके पास इफेक्टिव टारगेट हो, एडोप्टिंग मार्केटिंग हो और आउटपुट तथा इनपुट के बीच में लिंक हो।
निक वाटसन ने कहा कि भारतीय माइंडसेट की पहचान करना थोड़ा मुश्किल है। इसलिए हमें कोलैबोरेशन की जरूरत पड़ती है। इसलिए संबंध तो सभी से बनाने ही पड़ते है। दूसरे कई बार ऐसा होता है कि हमें इनहाउस के बजाए आउटसोर्स पर डिपेंड होना पड़ता है, इसलिए हमें एजेंसीज की ओऱ देखना पढ़ता है।
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