क्या ‘साइबर मीडिया’, ‘परंपरागत मीडिया’ की छवि को धूमिल कर रहा है?
समाचार4मीडिया.कॉम
मीडिया जो किसी परिचय का मोहताज नहीं है, आज उसका दायरा इतना बड़ा है कि उसे समुद्र की संज्ञा देना गलत नहीं होगा। लेकिन जब मीडिया का नाम लिया जाता है, तो सामने परंपरागत मीडिया (प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक) का नाम ही सामने आता है। वर्तमान में साइबर मीडिया या डिजिटल मीडिया ने सफलता के उन आयामों को छुआ है कि उसकी खुद की एक पहचान बन चुकी है। लेकिन क्या इस उभरते हुए माध्यम से परंपरागत मीडिया को लाभ हुआ है या इससे देश की मीडिया की छवि को धक्का लगा है, यह जानने के लिए ‘साइबर मीडिया’ से जुड़े कुछ दिग्गजों से समाचर4मीडिया ने बात की और जानी उनकी राय
‘अर्थकॉम.कॉम’ के एडिटर, अनिल सिंह ने कहा कि साइबर मीडिया के बढ़ने से ‘परंपरागत मीडिया’ को कितनी मजबूती मिली है, इसके लिए मैं बस यही कहना चाहूंगा कि पहले, ‘परंपरागत मीडिया’ एक टांग पर खड़ा था, लेकिन अब उसे दूसरी टांग का भी सहारा मिल गया है। प्रिंट भी अपना फोकस साइबर मीडिया पर कर रहा है, फिर वो चाहे ‘दैनिक जागरण’, ‘हिन्दुस्तान’, ‘नवभारत टाइम्स’ हो या ‘दैनिक भास्कर’। हर माध्यम की अपनी स्वतंत्र स्थिति है और वो सफलता के लिए किसी भी ओर पैर पसार सकता है।
‘साइबर मीडिया’ का विस्तार कितना हो रहा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस माध्यम में न जाने कितने स्वतंत्र लोग अपने भविष्य को तरासते हुए नयी बेवसाइट लॉन्च कर रहे हैं। इसका अत्यधिक विस्तार होने का मुख्य कारण यह भी है कि अख़बार को अपनी 10 हजार प्रतियां बढ़ाने के लिए कम से कम 60 हजार रूपए खर्च करने पड़ेंगे, जबकि साइबर को अपना विस्तार करने पर अतिरिक्त धन व्यय नहीं करना पड़ता है। प्रिंट के साथ टेलीविजन भी इस ओर अपना विस्तार कर रही है, वे भी अपनी ख़बरे और प्रमुख कार्यक्रम के वीडियो क्लीप्स अपनी वेबसाइट पर डाउनलोड कर रहे हैं।
‘साइबर मीडिया’ की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अभी यह सिर्फ अंग्रेजी में ज्यादा प्रचलित है, जबकि भारत में ‘साइबर मीडिया’ के विस्तार के लिए भारतीय भाषाओं में कंटेंट उपलब्ध कराना पड़ेगा। हांलाकि इस ओर अभी कार्य चल रहा है।
एक ताजा सर्वे के अनुसार, भारत में वर्तमान में ब्रॉडबैंड के एक करोड़ कनेक्शन है। जबकि ब्राडबैंड कंपनियों के अनुसार, उन्होंने दस वर्षों में ब्रॉडबैंड कनेक्शन का विस्तार पांच करोड़ और 2016 में दस करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। भारत का यह लक्ष्य अभी भी चीन से बहुत कम है, क्योंकि चीन में इस समय ब्रॉडबैंड कनेक्शन की संख्या पच्चीस करोड़ है।
‘तहलका’ के सीनियर एडिटर, संजय दुबे का इस बारे में कहना था कि ‘साइबर मीडिया’ पर किसी भी संस्था द्वारा रोक नहीं लगाया जा सकता है और इस पर अंकुश लगाना भी गलत होगा। ‘साइबर मीडिया’ के विस्तार से ‘परपंरागत मीडिया’ को बहुत मजबूती मिली है। ‘तहलका’ की भी बेवसाइट है और इस पर किसी स्टोरी को अपडेट करने से पाठक की ओर से अच्छी प्रतिक्रिया मिलती है और पाठकों की संख्या भी बढ़ती है। सबसे बड़ी बात यह है कि किसी भी स्टोरी के बारे में आपको पाठकों की टिप्पणी के रूप में तुरंत प्रतिक्रिया मिलने लगती है, फिर वह अच्छी हो या बुरी। हालांकि प्रिंट के बिजनेस की दृष्टि से थोड़ा धक्का जरूर लगा है, क्योंकि जो पाठक 100 रूपए के सब्सक्रिप्शन के जरिए पहले पत्रिका मंगाता था, अब वह इंटरनेट पर आराम से पत्रिका को पढ़ सकता है।
शुरुआत में लग रहा था कि ‘साइबर मीडिया’ से ‘परंपरागत मीडिया’ को आहत होना पड़ सकता है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। अभी भी भारत में इसको वो सफलता हासिल करने में काफी समय लगेगा। जहां तक साइबर मीडिया से मीडिया की छवि धूमिल होने का सवाल है, मुझे यह बिल्कुल नहीं लगा रहा है। उदाहरण के लिए, चाकू का इस्तेमाल आप कई तरह से कर सकते है, इससे आप फल ,सब्जियों के साथ इंसान भी काट सकते है और ब्रेड पर मक्खन भी लगा सकते हैं।
साइबर पत्रकार, पियूष पांडे ने ‘साइबर मीडिया’ को ‘परंपरागत मीडिया’ का रोड़ा न मानते हुए, बल्कि इसके तार इनकी सफलता से जोड़ते हुए कहा कि ‘साइबर मीडिया’, ‘परंपरागत मीडिया’ को वैश्विक स्तर पर ब्रॉडिंग का काम कर रहा है। पहले जो बहुत अच्छी स्टोरी होती थी, वो भारत में सीमित दायरे तक ही रह जाती थी, लेकिन अब स्टोरी लाखों पाठकों द्वारा पढ़ी या देखी जा सकती है। भारत में ‘साइबर मीडिया’ से ‘मीडिया संस्थानों’ को फिलहाल, किसी भी तरह की कोई भी आय प्राप्त नहीं हो पा रही है। हांलाकि, विदेशों में ‘साइबर मीडिया’ आय का अच्छा साधन है। वहां पर अख़बार और पत्रिकाओं के पाठकों की रीडरशिप और सर्कुलेशन में बहुत कमी आ रही है।
‘साइबर मीडिया’ से किसी भी मीडिया को कोई भी नुकसान नहीं है। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और साइबर मीडिया तीनों एक दूसरे के पूरक है और तीनों एक-दूसरे को आगे बढ़ाने का ही कार्य करते हैं। अगर इंटरनेट पर निगरानी रखने के लिए किसी भी तरह के संस्थान का निर्माण किया जाएगा, तो इसकी खूबसूरती खत्म हो जाएगी। साइबर मीडिया को सेंसर नहीं होना ही, तो इसकी खूबसूरती को बढ़ाता है सेंसर करने पर, यह भी परंपरागत मीडिया की श्रेणी में आ जाएगा। अगर कोई निगरानी करना भी चाहे, तो बड़ी साइटों पर ही निगरानी कर सकते हैं, लेकिन हजारों की संख्या में जो छोटी-छोटी वेबसाइट पर निगरानी करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी है। सरकार भी देश-विरोधी चीजों पर ही पाबंदी लगा सकते है। पर जो विदेश में बैठकर, वेबसाइट चला रहे हैं उन पर, लगाम कैसे लगायी जा सकती हैं।
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