रेवेन्यू, सब्सक्रिप्सन और एडवरटाइजर्स के बीच जकड़ी न्यूज चैनल इंडस्ट्री
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डिजिटलाइजेशन की ग्रोथ को देखते हुए मीडिया का मानना है कि न्यूज चैनल इंडस्ट्री का भविष्य बहुत उज्जवल है, लेकिन कीमतों का खेल कंटेंट की वैरायटी पर भी बुरा असर डाल रहा है। कंटेंट इज ऑलवेज किगं लेकिन कंटेंट के दम पर विज्ञापनजगत से जो पैसा आ रहा है, वो पर्याप्त नहीं है, उसके लिए हमें कंटेंट को अच्छा और मजबूत बनाने की जरूरत है। हांलाकि रीजनल न्यूज चैनल मार्केट भले ही अपने शुरुआती दौर में है, लेकिन इसमें काफी संभावना है। इन सबके बावजूद भी न्यूज चैनल के भविष्य को अपने मुकाम तक पहुंचाने के इंडस्ट्री को अभी काफी बेहतर काम करने पड़ेगें।
जी न्यूज के सीईओ बरुण दास ने बताया कि वो न्यूज चैनल इंडस्ट्री के भविष्य को लेकर सकारात्मक नजरिया रखते है। उन्होंने कहा कि न्यूज चैनल एक बेहतरीन बिजनेस है और इसमें काफी पैसा बनाया जा सकता है। भविष्य में डिजिटलाइजेशन को देखते हुए न्यूज चैनलों के रेवेन्यू में इजाफा होगा और सब्सक्रिप्सन भी बढ़ेगा। आर्थिक मंदी से यह सबक मिला है कि न्यूज चैनल रेवेन्यू के लिए केवल विज्ञापनदाताओं पर निर्भर नही रह सकते।
मीडिया का एक बड़ा भाग यह भी मानता है कि आने वाला समय न्यूज चैनल के लिए काफी बेहतर होगा, लेकिन भारत में सबसे बड़ी परेशानी यही है कि यहां रेवेन्यू का 85 फीसदी हिस्सा एडवरटाइजर्स से आता है। इससे निजात पाने की कोशिश हो रही है लेकिन यह बेहद मुश्किल है।
एमसीसीएस के सीईओ अशोक वेंकटरमनी यह नहीं मानते कि भविष्य में न्यूज चैनलों के लिए सबकुछ अच्छा ही होने वाला है। उनका मानना है कि डिजिटलाइजेशन फिलहाल बहुत जल्दी नही होने जा रहा है लिहाजा न्यूज चैनलों के रेवेन्यू की समस्या अभी भी कायम रहेगी। अमेरिका जैसे देशों में न्यूज चैनलो के लिहाज से ग्राहक वैल्यू प्रोडक्ट को पसंद करता है लिहाजा वहां रेवेन्यू का 85 फीसदी हिस्सा सब्सक्रिप्सन से आता है। लेकिन भारत अभी भी अमेरिका की इस स्थिति से कोसों दूर है।
इंडस्ट्री में जो भी परिर्वतन हो रहें हैं वे बेहतरी के लिए हो रहे हैं। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इस दिशा में कुछ कोशिश की है, ट्राई(टेलिकॉम रेगूलेटरी ऑफ इंडिया) भी अपनी ओर से हर संभव कोशिश कर रहा है। बदलाव धीरे-धीरे ही सही लेकिन लगातार हो रहा है। मार्केट में चैनलों की संख्या बढ़ रही है लेकिन अंतत: सुधार होगा।
टीवी टुडे के सीईओ जी कृष्णन ने टीवी न्यूज इंडस्ट्री के बारे में बताया कि अगर इंडियन न्यूज इंडस्ट्री अपने पैरों पर खड़ी होने की ताकत हासिल कर ले तो उसे विज्ञापनदाताओं पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं रह जाएगी। मुझे सब्सक्रिप्शन के रूप में आमदनी का दूसरा स्रोत दिखाई दे रहा है। पहले जहां पूरी तरह यानी 100 फीसदी विज्ञापनदाताओं पर निर्भर थे अब यह कम होकर 86 फीसदी हो गई है। बाकी हिस्सा सब्सक्रिप्शन से आ रहा है। एक बार अगर न्यूज चैनलों को रेवेन्यू का दूसरा विकल्प मिल गया तो इससे विज्ञापनदाताओं से बेहतर एड रेट लेने में मदद मिलेगी। न्यूज चैनलों की स्थिरता के प्रश्न पर कृष्णन ने कहा कि बात केवल स्थिरता को बनाये रखने तक की नही है बल्कि इसे तेजी से बढ़ाने की भी है।
हालांकि मार्केट में कुछ गंभीर खिलाड़ी भी हैं लेकिन कुछ लापरवाह खिलाड़ी भी जिनका उद्देश्य केवल पैसा बनाना है। यह बेहद जरूरी है कि सब्सक्रिप्शन की रेट तय हो लेकिन यह सरकार के बजाय मार्केट द्रारा तय किया जाना चाहिए। जब चैनलों को यह लगेगा कि उनका टारगेट केवल दर्शक है एडवरटाइजर नहीं तो अपने आप कंटेंट में सुधार हो जाएगा।
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