मैगजीन की अपनी एक क्वालिटी रीडरशिप और सर्कुलेशन है

magazine1.jpg
सुप्रिया अवस्थी
समाचार4मीडिया.कॉम
हिन्दी की समाचार पत्रिकाओं के बारे में जो खबर आ रही हैं, वो अच्छी नहीं हैं। सप्ताहिक पत्रिकाएं मासिक होने के रास्ते पर हैं। आगे क्या होगा? पता नहीं। कुछ के उपर प्रबंधन का दबाव है कि मैगजीन का सर्कूलेशन कम हो रहा है, इसे और जनप्रिय बनाने के प्रयास किए जाएं। एक जमाने में दैनिक अख़बार किसी विषय पर फौरी खबर देते थे, और पत्रिकाओं के हवाले से यह काम होता था कि उसके तमाम पक्षों का विश्लेषण विस्तृत तौर पर पेश करें। अब तो यह काम अख़बार ही करने लगे हैं। अख़बार अब कुछ भी ऐसा नहीं छोड़ रहे हैं, जिसको करके मैगजीन खुद को विशिष्ट साबित कर सकें।  आज फटाफट खबरों की दुनिया में पाठक और दर्शक भला सप्ताह भर का इंतजार कैसे कर सकता है। न्यूज की तेजी टीवी न्यूज चैनलों ने ले लिया और विस्तार अखबारों ने लिहाजा सप्ताहिक समाचार पत्रिकाओ के सामने पहचान का संकट आ गया है। आखिर समाचार पत्रिकाएं क्यों पिछड़ रही हैं? इसी मुद्दे पर संपादको से राय जानने की कोशिश की समाचार4मीडिया ने-
 
आउटलुक हिंदी के संपादक निलाभ मिश्र ने न्यूज मैंगजीन की रीडरशिप और सर्कुलेशन की गिरावट पर अपने विचार रखते हुए कहा कि एक तो अखबारों ने अपने तरह-तरह के सप्लीमेंट शुरु कर दिए है जिसके माध्यम से वे रोज ही हर खबर का विश्लेषण दे देते हैं। मैगजीन की मनोरंजन और बिग फाइट वाली खबरों पर टीवी ने अपना अधिकार कर लिया है। लेकिन अब भी जो शिक्षित और वैचारिक पाठक है वो आज भी किसी बड़ी खबर का विश्लेषण के लिए मैंगजीन ही पसंद करता है। इससे यह सिद्ध होता है कि मैगजीन की अपनी एक साक्षर और क्वालिटी रीडरशिप और सर्कुलेशन है।
 
प्रथम प्रवक्ता मैगजीन के संपादक और वरिष्ट पत्रकार राम बहादुर राय का इस बारे मे कहना था कि समाचार और विचार को पाठक के सामने परोसने का सबसे अच्छा माध्यम आज भी मैगजीन ही है। मीडिया आज से कुछ साल पहले 90 के दशक में यह जरूर समझा जाने लगा था कि समाचार मैगजीन की अब बिदाई हो गई है लेकिन ऐसा हुआ नहीं क्यों कि मैगजीन एक बार फिर नये क्लेवर और फ्लेवर के साथ उतरी। इसका मुख्य कारण यह भी रहा कि पत्रिकाओं कि तरह अखबार भी फीचर स्टोरिया करने लगे थे।
 
क्राइम से जुड़ा कारोबार टीवी पर फल-फूल रहा है, पत्रिकाओं की शक्ल में उसकी वैसी सफलता दोहराया जाना खासा मुश्किल काम है। हिन्दी की फीचर पत्रिकाओं की मृत्यु करीब दो दशक पहल ही हो चुकी थी। समाचार पत्रिकाओं का मामला ऐसा नहीं है। स्थापित मीडिया घरानों द्वारा निकाली जाने वाली समाचार पत्रिकाओं को पाठकों के सहारे चलाना होता है। ये चलाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। बहुत बुनियादी सवाल यह है कि समाचार के लिए कोई पत्रिकाओं को क्यों खरीदे।
 
किसी क्राइम रिपोर्ट की एक मैगजीन के लिए आवश्यता पर प्रकाश डालत हुए निलाभ मिश्र ने कहा कि ऐसा क्राइम जिसका सामाजिक पक्ष हो वह किसी भी मैंगजीन की रीडरशिप और सर्कुलेशन पर असर जरुर डालती है।
 
जब कोई मुद्दा, घटना या समाजिक सरोकार की खबर आती है तब किसी मैगजीन की रीडरशिप पर क्या फर्क पड़ता है इस पर रामबहादुर राय ने बताया कि जब किसी खबर को देखने या पढ़ने की रुचि कम हो जाती है तब पत्रिका ही एक मात्र ऐसा माध्यम है जो पाठकों के लिए खबर को रुचिकर बनाकर पाठको में पढने की रुचि को जागृत करता है।
 
पत्रिका दरअसल खत्म नहीं हो रही है, वह अखबारों में समाहित हो रही है, बल्कि हो गई है। कंटेंट की मांग खत्म नहीं हो रही है, उसकी पूर्ति अलग तरीके से हो रही है। यानि समाचार पत्रिकाओं में ऐसा खास क्या है, जिसे पाठक और कहीं और हासिल नहीं कर सकता और जिन पत्रिकाओं में पाठक ऐसा कुछ हासिल कर सकता हैं, उन पत्रिकाओं को खतरा नहीं है।
 
 
नोट: समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडिया पोर्टल एक्सचेंज4मीडिया का नया उपक्रम है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें samachar4media@exchange4media.com पर भेज सकते हैं या 09899147504/ 09911612942 पर संपर्क कर सकते हैं।
0
No votes yet
Your rating: None