‘बीबीसी हिंदी’ रेडियो की कमान कहीं और लगाव कहीं: आलोक कुमार

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सुप्रिया अवस्थी
समाचार4मीडिया.कॉम
‘बीबीसी’ हिंदी को चलाने के लिए जो पैसे आ रहे थे वो सरकारी बजट से आ रहे थे। अब जब सरकार ने पैसे देना बंद कर दिया तो ‘बीबीसी’ के पास कोई और रास्ता ही नहीं रह गया है क्योंकि ‘बीबीसी हिंदी’ को विज्ञापन से कोई आय प्राप्त नहीं हो रही थी। ‘बीबीसी हिंदी’ रेडियो की सेवा से लगभग 35 मीलियन लोग दिल से जुड़े हुए थे और इसमें कोई दो राय नहीं कि ‘बीबीसी’ के श्रोताओं को धक्का पहुंचा होगा। ब्रिटेन की माली हालात ठीक न होने के कारण यह फैसला लिया गया है।
 
1940 हिंदी रेडियो शुरू हुआ था इसके बाद जब शीतयुद्ध शुरू हुआ तब ‘वॉयस ऑफ अमेरिका’ और ‘बीबीसी हिंदी’ रेडियो सेवा ने भारतीयों को पश्चिमी देशों की विदेश नीति से अवगत कराने का माध्यम बनाने की कोशिश की। मैं ‘बीबीसी’ से चार वर्षो तक काम चुका हूं और मेरे लिए व्यक्तिगत रुप से यह खबर बहुत ही दुखदायक है।
 
अगर कोई यह कहे कि हिंदी मुनाफे की भाषा नहीं है तो यह बिल्कुल गलत होगा क्योंकि कोई भी कंपनी हिंदी को नकारकर मार्केट में कदम नहीं रखती है और इसका बहुत बड़ा मार्केट है। यह फैसला बदला नहीं जा सकता था जो फैसला लेना था वो लेने वाले लोग ले चुके हैं, लेकिन उन्हें करोड़ों श्रोताओं के हित में इस पर पुनर्विचार करना चाहिए। 31 मार्च 2011 ‘बीबीसी’ श्रोताओं के लिए बहुत बुरा दिन होगा क्योंकि हमारे दिल में अपनी पैठ बना चुके रेडियो का यह आखिरी प्रसारण होगा।

 

 

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