इण्डियन एक्सप्रेस, द वीक को आईपीआई अवार्ड

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मीडिया पाठक और देश के प्रति जवाबदेह है। इस पर जोर देते हुए भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश व राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष एएस आनन्द ने पत्रकारों से अपील करते हुए कहा कि वे काम करते हुए लक्ष्मण रेखा के भीतर रहें। आनन्द पत्रकारिता 2009 के आईपीआई-इण्डिया पुरस्कार वितरण समारोह में बोल रहे थे।
 
यह पुरस्कार द इण्डियन एक्सप्रेस और द वीक की विदिशा घोषाल को संयुक्त रूप से मिला। द इण्डियन एक्सप्रेस को तीसरी बार यह पुरस्कार मिला है। इस पुरस्कार के तहत एक ट्राफी, प्रशस्ति पत्र और एक लाख रूपये दिये जाते है। मालेगांव और मोदासा में 2008 में हुए धमाकों पर इण्डियन एक्सप्रेस ने लगातार खोजपूर्ण रिर्पोट छापीं और इन धमाकों के पीछे एक अतिवादी संगठन का हाथ होने का खुलासा किया। घोषाल को महाराष्ट्र में कर्ज के बोझ से दबे किसानों की विधवाओं के शोषण पर लिखी रपटों के लिए पुरस्कृत किया गया।

केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने विजेताओं को सोमवार को पुरस्कृत किया । उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी ज्यादा मजबूत होती है जब मीडिया के जरिए वे लोग अपनी आवाज रखते हैं। जिनकी अपनी कोई आवाज नहीं होती। दोनों की खोजपरक खबरों ने अपनी भूमिका निभाई, इसलिए उन्हे पुरस्कृत किया गया।

इण्डियन एक्सप्रेस की मुंबई संवाददाता स्मिंता नायर ने अपनी रपट में उजागर किया था कि पुलिस जांच से यह पता लगा कि मोदासा और मालेगांव में हुए धमाकों के पीछे कट्टरवादी हिन्दू समूह थे। इस रपट के बाद एक्सप्रेस संवाददाताओं की एक टीम ने खोज खबरों का सिलसिला शुरू किया और आतंकवादी घटना का पूरा सच पेश किया।

द वीक की विदिशा घोषाल ने बताया कि विदर्भ की विधवाओं की गैरमौजूदगी का ब्यौरा मेरी खबर मूक भुक्तभोगी में है। उन्होंने कहा कि इस खबर के जरिए उन महिलाओं को अभिव्यक्ति का मौका मिला। द इण्डियन एक्सप्रेस के प्रधान संपादक शेखर गुप्ता ने इस मौके पर कहा कि ये खबरें फाइल छीनने या स्टिंग ऑपरेशन जैसी नहीं थीं और पत्रकारिता किसी के बैडरूम में कैमरा लगाना भी नहीं है। ये वे खोजपरक खबरें हैं जिनमें तथ्य जुटाए जाते हैं, छानबीन की जाती है और दूसरे का भी पक्ष रखा जाता है।

( साभार: जनसत्ता)

 

 

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