अंग्रेजी परस्त है सरकार की विज्ञापन नीति – इलना

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डीएवीपी और आरएनआई, समाचारपत्र और पत्रिकाओं के अस्तित्व में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब डीएवीपी और आरएनआई जैसे संगठन सही तरह से काम नहीं करते हैं, तो पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन का कार्य प्रभावित होता है, जिससे प्रकाशकों के सामने बहुत सारी परेशानियां खड़ी हो जाती हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह प्रकाशकों का एक साथ बैठकर इन समस्याओं पर गंभीरता से विचार न करना है। इसी का परिणाम है कि केंद्रीय मंत्रालय, डीएवीपी, आरएनआई औऱ दूसरे विभाग के भाषाई समाचारपत्रों की घोर उपेक्षा करते है। केंद्र ही नहीं, राज्य सरकारों का भी यही हाल है। समाचारपत्रों के प्रकाशकों को विज्ञापने के लिए इधर-उधर भटकना पड़ता है।
 
भारतीय भाषाई समाचारपत्र संगठन (इलना) देश भर में प्रकाशकों को एक साथ बैठाकर इन समस्याओं पर गंभीरता से विचार कर रहा है। इसी कड़ी में नागपुर और आगरा के बाद उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए 30 से अधिक प्रकाशकों ने भाग लिया।
 
इलना के राष्ट्रीय अध्यक्ष परेश नाथ की अगुआई में संपन्न हुई इस मीटिंग में डीएवीपी की एंपैनल प्रक्रिया में संशोधनों की आवश्यकता, डीएवीपी द्वारा गठित रेट स्ट्रक्चर कमेटी, विज्ञापन बिलों की प्रक्रिया और भुगतान, डीएवीपी और अन्य सरकारी विभागों के द्वारा विज्ञापनों का असामान्य वितरण, आरएनआई की भूमिका और पीआरबी एक्ट में बदलाव की कोशिशों पर विस्तार से चर्चा हुई।
 
इलना के सदस्यों ने माना कि सरकार और डीएवीपी की विज्ञापन नीतियां अंगरेजी अखबारों को फायदा पहुंचाने वाली हैं। इलना सदस्यों ने किसी को विज्ञापन देने का विरोध नहीं किया, बल्कि उनका यह कहना था कि सर्वशिक्षा और पोलियो निवारण जैसे सरकारी विज्ञापन उन भाषाई अखबारों को भी दिए जाएं, जो विज्ञापन के लिए पंजीकृत हैं। पेड न्यूज मसले पर सदस्यों की राय यह थी कि यह मसला एडिटर और रीडर के बीच छोड़ दिया जाना चाहिए।
 
भाषाई अखबारों के प्रकाशकों ने तय किया है कि वे स्थानीय नेताओं औऱ अफसरों पर दबाव बनाकर विज्ञापन की सरकारी नीतियों में बदलाव लाने की कोशिश करेंगे।
 
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