मीडिया पर असली मुद्दा छुपाने का आरोप
रण विजय प्रताप सिंह
समाचार4मीडिया.कॉम
मीडिया द्वारा ‘फैसला सुनाने’ को लेकर अक्सर सवाल उठाया जाता रहा है। मीडिया अपने इस अंदाज को लेकर एक बार, फिर सवालों के घेरे में हैं, लेकिन इस बार सवाल देश के प्रतिष्ठित उधोगपति, रतन टाटा ने उठाया है। उन्होंने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में स्पेक्ट्रम घोटाले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि मीडिया अनधिकृत ऑडियो टेप के माध्यम से लोगों के चरित्र हनन में लगा हुआ है। मीडिया के माध्यम से लोगों पर मुकदमें चलाकर सजाएं सुनायी जा रही हैं। तथ्यहीन बातों के आधार पर, किसी को भी कटघरे मे खड़ा किया जा रहा है। जिस तरह लोगों पर आरोप लगाए जा रहें हैं, उससे लगता है कि भारत एक ‘बनाना रिपब्लिक’ (अराजक देश) हो गया है। उन्होंने इस बात पर दुख जताया कि वास्तविक मुद्दों को छिपाकर, गैरजरूरी बातों को मीडिया के जरिये उछाला जा रहा है। असली मुद्दा यह है कि स्पेक्ट्रम का ‘आउट ऑफ टर्न’ आवंटन कैसे हुआ है? बड़े खिलाड़ियों ने मुफ्त में मिले स्पेक्ट्रम की जमाखोरी कैसे की? मैं चाहता हूं कि सरकार निर्णय ले, ऑडिटर को बुलाए और जांच कराए, जिन लोगों ने कुछ भी गलत किया है, उन्हें दंडित किया जाय। उन्होंने कहा कि जब तक अदालत किसी व्यक्ति को दोषी करार नहीं देता, तब तक उसे निर्दोष माना जाना चाहिए।
लेकिन यहां सवाल उठता है कि क्या वास्तव में मीडिया उतावली हो गई है? आखिर आए दिन इस तरह के आरोप क्यों लगते हैं? लेकिन, इन सब के बीच सवाल यह भी है कि लोकतंत्र में मीडिया को शक के आधार पर शोर मचाने का अधिकार भी नहीं? और असली मुद्दा है क्या? कुछ ऐसे ही सवालों पर मीडिया जगत के लोगों की राय जानने की कोशिश की, समाचार4मीडिया ने।
वर्तिका नंदा, वरिष्ठ मीडिया समीक्षक
मीडिया को यह गलतफहमी हो गई है कि उससे बढ़कर कोई नहीं है। पत्रकारों को लगने लगा है कि वे बहुत प्रभावशाली हैं और इस बात का वहम दो तरह के पत्रकारों में ज्यादा देखने को मिल रहा है। पहला टॉप लेवल के पत्रकारों में और दूसरा नए पत्रकारों में। मीडिया का काम समाज को आइना दिखाना है। लेकिन किसी का नाम आने पर फैसला सुना देना सही नहीं है। हर आदमी को अपनी बात रखने का अधिकार है। उसे अपने आरोपों को बेबुनियाद साबित करने का मौका देना चाहिए। लेकिन किसी स्टोरी को दबाना भी गलत है। आरोपों की जांच जरूर होनी चाहिए और सच्चाई सबके सामने आनी चाहिए। आए दिन इस तरह के टेप आते रहते हैं, जाहिर तौर पर इस तरह के टेपों की सच्चाई की भी जॉच होनी चाहिए, क्योंकि आज के दौर में किसी की आवाज की नकल करके उसे नुकसान पहुंचाने की आशंका भी बढ़ गई है।
हालांकि मीडिया के उपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, लिहाजा उसे न्यायसंगत और निष्पक्षता के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। पत्रकारों को भी एक-दूसरे के उपर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से बचना चाहिए। सच को सामने लाकर स्थिति स्पष्ट करने का प्रयास करना चाहिए।
राजकिशोर, वरिष्ठ पत्रकार
बात चरित्रहनन की नहीं है। मीडिया सनसनी की तलाश में रहती है, उसे जहां सनसनी मिलती है, वहीं फोकस करती है और जहां सनसनी नहीं होती, वहां पैदा करने की कोशिश करती है। टाटा का बयान, एक तरह से सरकारी वक्तव्य की तरह है। दोष सिद्ध हो जाने तक किसी को गुनाहगार नहीं माना जा सकता, लेकिन कितने लोगों का दोष आजतक सिद्ध हुआ है। जो लोग सत्ता में हैं, उनका दोष सिद्ध होने तक इंतजार नहीं किया जा सकता। उनके बारे में शंका ही पर्याप्त है। दोष सिद्धि की प्रक्रिया बहुत जटिल है।
मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, जनमानस की आवाज भी है। और लोकतंत्र में किसी जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति के प्रति संदेह पैदा होना ही, मीडिया के शोर मचाने के लिए पर्याप्त वजह है। मीडिया शोर मचाएगी, तभी तो बात आगे जाएगी। लोकतंत्र में जनता को इस तरह की सूचना देना भी, तो मीडिया की जिम्मेदारी है। यह सभी जानते हैं कि भारत में राजनीतिक अपराध जल्द सिद्ध नहीं होते है।
जनता दोष सिद्ध होने तक इंतजार करने लगे, तो उसे एक-दो साल नही, बल्कि कई दशक तक इंतजार करना पड़ सकता है। मीडिया तो लोकतंत्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाती है। अगर मीडिया आग नहीं देख पाती है और धुआं देखकर आग का शोर मचाती है, तो यह कहां से गलत है? अब इस पर आगे की कार्रवाई करने और पता लगाने का काम, सरकार और सरकारी संस्थाओं का है। टाटा जैसे व्यक्ति से लोग अधिक उम्मीदें करते हैं। उन्होंने खुद स्वीकार किया है कि उड्यन क्षेत्र में प्रवेश के लिए उनसे करोड़ो रुपए की रिश्वत मांगी गई। अगर वे एक स्वतंत्र ‘राष्ट्रीय भ्रष्टाचार निरोधक जांच एजेंसी’ बनाने की मांग सरकार से करते तो उसका अलग महत्व होता, क्योंकि उनके कहने का अलग मायने होता है।
जहां तक असली मुद्दे की बात है, तो वह यह है कि प्रधानमंत्री के आदेश की अवहेलना कैसे होती है? कई मंत्रालयों की आपत्ति को नजरअंदाज कर कोई मंत्री एकतरफा फैसले कैसे ले सकता है? और सबसे बढ़कर जनता की समस्याएं, असली मुद्दा है। लेकिन इन मुद्दो की तरफ कोई इशारा करना नहीं चाहता।
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